सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 244 · Raag Gauree · Guru Amar Daas Ji

1यदि तू प्रभु के गुणों को स्मरण करेगी तो तू अपने पति की प्रिया हो जाओगी और तेरा प्रेम नाम के साथ हो जाएगा।

2हे नानक ! जिस जीवात्मा के गले में राम के नाम की माला विद्यमान है, वह अपने पति-प्रभु की प्रियतमा है॥ २॥

3अपने प्रियतम पति के बिना जीवात्मा बिल्कुल अकेली है।

4कारगर (इष्ट फलप्रद) गुरु के शब्द के बिना वह द्वैतवाद के प्रेम कारण ठगी गई है।

5शब्द के बिना उसको विषम सागर से कौन पार कर सकता है? माया के मोह ने उसको कुमार्गगामी कर दिया है।

6जब झूठ ने उसको नष्ट कर दिया तो पति-प्रभु ने उसको त्याग दिया। फिर जीवात्मा प्रभु का महल प्राप्त नहीं करती।

7लेकिन जो जीवात्मा गुरु के शब्द में अनुरक्त है, वह प्रभु के प्रेम में मतवाली हो जाती है और दिन-रात उस में लीन रहती है।

8हे नानक ! जो जीवात्मा उसके प्रेम में सदा अनुरक्त रहती है, पूज्य परमेश्वर उस कामिनी (जीवात्मा) को अपने साथ मिला लेता हैI॥ ३॥

9यदि ईश्वर अपने साथ मिलाए तो ही हम उसको मिल सकते हैं। ईश्वर के बिना कौन हमें उससे मिला सकता है ?

10अपने प्रियतम गुरु के बिना हमारी दुविधा कौन दूर कर सकता है ? गुरु के द्वारा दुविधा निवृत्त हो जाती है।

11हे मेरी माता ! यह है विधि ईश्वर से मिलने की और इस तरह दुल्हन (जीवात्मा) सुख प्राप्त करती है।

12गुरु-की सेवा के अलावा घनघोर अन्धकार है। गुरु के (मार्गदर्शन) बिना मार्ग नहीं मिलता।

13जो जीवात्मां प्रभु रंग में लीन है, वह गुरु के शब्द का चिन्तन करती है।

14हे नानक ! प्रियतम गुरु से प्रेम पाकर जीवात्मा ने प्रभु को अपने पति के तौर पर पा लिया है॥ ४ ॥ १॥

15गउड़ी महला ३ ॥

16हे मेरी माता ! प्रभु-पति के बिना मैं बहुत लज्जाजनक-सी हूँ। मैं अपने स्वामी के बिना किस तरह जीवित रह सकती हूँ?

17अपने पति के बिना मुझे नींद नहीं आती और कोई वस्त्र मेरे शरीर को शोभा नहीं देता।

18जब मैं अपने पति-प्रभु को अच्छी लगती हूँ तो मेरे शरीर पर वस्त्र बहुत शोभा देते हैं, गुरु के उपदेश से मेरा चित उससे एक ताल में हो गया है।

19यदि वह सतिगुरु की श्रद्धा से सेवा करे तो सदा सुहागिन हो जाती है और गुरु जी के अंक में लीन हो जाती है।

20यदि वह गुरु के शब्द द्वारा अपने प्रियतम से मिल जाए तो वह उसको प्रेम करता है। इस संसार में केवल नाम ही एक लाभदायक काम है।

21हे नानक ! जब जीवात्मा प्रभु की गुणस्तुति करती है तो वह अपने प्रभु-पति को अच्छी लगने लग जाती है॥ १॥

22अपने प्रियतम के साथ पत्नी (जीवात्मा) उसके प्रेम का आनन्द प्राप्त करती है।

23वह दिन-रात उसके प्रेम में अनुरक्त हुई, गुरु के शब्द का चिन्तन करती है।

24वह गुरु के शब्द का ध्यान करती है, तथा अपने अहंत्व को मिटा देती है और यूं अपने प्रियतम प्रभु से मिल जाती है।

25जो जीवात्मा मधुर सत्यनाम के प्रेम में सदैव ही अनुरक्त है, वह अपने पति-प्रभु की प्रियतमा हो जाती है।

26अपने गुरु की संगति में रहने से हम नाम अमृत को ग्रहण कर लेते हैं और अपनी दुविधा का नाश करते हैं।

27हे नानक ! ईश्वर को अपने पति के तौर पर प्राप्त करके दुल्हन को तमाम दुःख भूल गए हैं।॥ २॥

28माया के मोह एवं लगाव के कारण पत्नी (जीवात्मा) अपने प्रियतम पति को भूल गई है।

29झुठी पत्नी (जीवात्मा) झूठ,से जुड़ी हुई है। कपटी नारी कपट ने छल ली है।

30जो जीवात्मा असत्य त्याग देती है और गुरु के उपदेश पर अनुसरण करती है, वह अपने जीवन को जुए में नहीं हारती।

31जो जीवात्मा गुरु के शब्द का चिन्तन करती है, वह अपनी अन्तरात्मा से अहंत्व को दूर कर के सत्य में लीन हो जाती है।

32(हे जीवात्मा !) प्रभु के नाम को अपने ह्रदय मे बसा, तू ऐसा हार-श्रृंगार कर।

33हे नानक ! जिस दुल्हन का सहारा सत्य-नाम है, वह सहज ही स्वामी में लीन हो जाती है। ३॥

34हे मेरे प्रियतम ! मुझे दर्शन दीजिए। तेरे बिना मैं बहुत ही बेइज्जत हूँ।

35मेरे नयनों में नींद नहीं आती और भोजन व जल मुझे अच्छे नहीं लगते

36भोजन व जल मुझे अच्छे नहीं लगते और मैं उसके विरह के शोक से मर रही हूँ। अपने प्रियतम पति के बिना सुख किस तरह मिल सकता है?

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं