सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 241 · Raag Gauree · Guru Arjan Dev Ji

1हे मन को मुग्ध करने वाले अनूप प्रभु! हे मोहन ! तू समस्त जीवों को सहारा देने वाला है।

2मैं झुक-झुक कर गुरु के चरण स्पर्श करता हूँ। हे मेरे सतिगुरु ! मुझे ईश्वर के दर्शन कराओ॥ ३॥

3मैंने अनेक मित्र बनाए हैं, लेकिन मैं केवल एक पर ही कुर्बान जाता हूँ।

4किसी में भी तमाम गुण विद्यमान नहीं। लेकिन भगवान गुणों का परिपूर्ण भण्डार है॥ ४॥

5हे नानक ! चारों ही दिशाओं में प्रभु के नाम का यश होता है। उसका यश करने वाले प्रसन्नता से सुशोभित होते हैं।

6(हे प्रभु!) मैंने तेरा ही सहारा देखा है और मैं (नानक) तुझ पर कुर्बान जाता हूँ॥ ५॥

7अपनी भुजा आगे बढ़ाकर गुरु ने मुझे सांसारिक मोह के कुएँ में से बाहर निकाल लिया है।

8मैंने अनमोल मनुष्य जीवन विजय कर लिया है, जिसे मैं दुबारा नहीं हारुंगा॥ ६॥

9मैंने सर्व भण्डार ईश्वर को पा लिया है, जिसकी कथा वर्णन से बाहर है।

10ईश्वर के दरबार में शोभायमान होकर मैं प्रसन्नतापूर्वक अपनी भुजा लहराऊँगा ॥ ७ ॥

11नानक को अनन्त एवं अमूल्य रत्न मिल गया है कि

12गुरु की सेवा द्वारा भयानक संसार सागर पार किया जाता है। मैं सबको ऊँचा बोलकर यही बताता हूँ॥ ८ ॥१२॥

13गउड़ी महला ५

14ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।

15हे जीव ! अपने मन को नारायण प्रभु के प्रेम में रंग ले।

16अपनी जिव्हा से ईश्वर के नाम का जाप करता रह और केवल उसे ही मांग ॥ १॥ रहाउ॥

17अपना अहंकार त्यागकर गुरु के ज्ञान का चिन्तन करता रह।

18आदि से जिस मनुष्य के भाग्य में लिखा होता है, केवल वही संतों की संगति में मिलता है। १॥

19जो कुछ भी दृष्टिगोचर होता है, वह मनुष्य के साथ नहीं जाता।

20भगवान से टूटा हुआ मूर्ख मनुष्य गल-सड़ कर मर जाता है॥ २॥

21मुग्ध करने वाले मोहन का नाम सदा के लिए मौजूद है।

22करोड़ों में कोई विरला ही गुरु के माध्यम से नाम को प्राप्त करता है॥ ३॥

23हे जीव ! संतजनों को नमन करते रहो।

24इस तरह तुझे नौ भण्डार एवं अनन्त सुख प्राप्त हो जाएगा॥ ४॥

25अपने नयनों से संतजनों के दर्शन करो।

26अपने हृदय में नाम-भण्डार का यश गायन करो॥ ५॥

27हे जीव ! कामवासना, क्रोध, लालच एवं सांसारिक मोह को त्याग दे।

28इस तरह जन्म-मरन दोनों के चक्र से मुक्ति प्राप्त हो जाएगी।॥६ ॥

29तेरे हृदय घर से दुख का अन्धेरा निवृत हो जाएगा

30जब तेरे हृदय में गुरु ने ज्ञान दृढ़ कर दिया और प्रभु ज्योत प्रज्वलित कर दी ॥ ७॥

31हे नानक ! जिन्होंने भगवान की सेवा-भक्ति की है, वे भवसागर से पार हो गए हैं।

32गुरु के माध्यम से जगत् ही पार हो जाता है॥ ८॥ १॥ १३॥

33महला ५ गउड़ी ॥

34हरि-परमेश्वर का सिमरन एवं गुरु को याद करते हुए मेरे भ्रम दूर हो गए हैं।

35मेरे मन ने सभी सुख प्राप्त कर लिए हैं।॥ १॥ रहाउ॥

36(कामादिक विकारों से) मेरे सुलगते एवं दग्ध मन पर गुरु जी ने (वाणी का) जल छिड़क दिया है। गुरु जी चन्दन की भाँति शीतल हैं॥ १॥

37गुरु के ज्ञान की ज्योति से मेरा अज्ञानता का अँधेरा मिट गया है॥ २॥

38(विकारों का) यह अग्नि सागर बहुत गहरा है, नाम की नैया पर सवार होकर सन्तजनों ने मेरा कल्याण कर दिया है॥ ३॥

39हमारे पास शुभ कर्म, धर्म तथा पवित्रता नहीं। लेकिन फिर भी परमेश्वर ने भुजा से पकड़ कर मुझे अपना बना लिया है॥ ४॥

40भगवान का नाम भय को नाश करने वाला, दुःख नाश करने वाला और भक्तवत्सल है॥ ५ ॥

41परमेश्वर अनाथों का नाथ, दीनदयालु, सर्वशक्तिमान एवं संतजनों का सहारा है॥ ६॥

42हे प्रभु पातशाह ! मुझ गुणविहीन की यही प्रार्थना है कि मुझे अपने दर्शन दीजिए॥ ७॥

43हे ठाकुर जी ! नानक तेरी शरण में है और तेरा सेवक (नानक) तेरे द्वार पर आया है॥ ८ ॥ २॥ १४ ॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं