सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 23 · Siree Raag · Guru Nanak Dev Ji

1जिनके पास सत्य नाम की पूँजी नहीं है, उनको आत्मिक सुख कैसे प्राप्त हो सकता है।

2पाप रूपी अनिष्टकारी पदार्थ क्रय कर लेने से मन व तन भी दूषित हो जाता है।

3ऐसे जीव की दशा जाल में फँसे मृग के समान होती है, यह नित्य प्रति गहन दुखों को सहता हुआ रोता है॥ २॥

4जिस प्रकार खोटा सिक्का खजाने में नहीं पड़ता, वैसे ही मिथ्या जीव को परमात्मा का साक्षात्कार नहीं होता।

5मिथ्या जीव की न कोई जाति है न उसकी कोई प्रतिष्ठा होती है, पाप कर्म करने वाले जीव को आत्मिक जीवन में कभी सफलता नहीं मिलती।

6मिथ्या पुरुषों के कर्म भी मिथ्या ही होते हैं, इसलिए वे आवागमन में ही अपनी प्रतिष्ठा गंवा लेते हैं।॥ ३॥

7गुरु नानक जी कथन करते हैं कि हमें गुरु उपदेश द्वारा प्रभु का यशोगान करने हेतु मन को समझाना चाहिए।

8जो प्रभु-प्रेम में रंगे होते हैं उनको न पापों का भार तथा न ही कोई भ्रम होता है।

9ऐसे जीवों को हरि के नाम-सुमेिरन का बहुत लाभ मिलता है तथा उनके मन में निर्भय परमात्मा का वास होता है॥ ४ ॥ २३ ॥

10श्रीरागु महला १ घरु २ ॥

11मानव जीवन में धन व यौवन तो फूल की भाँति चार दिनों के अतिथि हैं, जो चले जाएँगे।

12यह पद्मनी के पतों के समान गिर कर गल-सड़ कर नष्ट हो जाने वाले हैं।॥ १॥

13अतः हे जीव ! जब तक यौवन में नवोल्लास है, तब तक नाम-सुगिरन का आनन्द प्राप्त कर ले।

14तुम्हारे यौवनावस्था के दिन कम रह गए हैं, क्योंकि तुम्हारा शरीर रूपी चोला अब वृद्ध हो गया है॥ १॥ रहाउ॥

15मेरे प्रिय मित्र भी (वृद्धावस्था उपरांत) श्मशान में जाकर गहरी निद्रा में सो गए हैं अर्थात्-मृत्यु को प्राप्त हो गए हैं।

16मैं भी दुविधा में यहाँ जाकर धीमे स्वर में रोऊं॥ २॥

17हे सुन्दर जीव रूपी नारी! तुम अपने कानों से ध्यानपूर्वक यह बात क्यों नहीं सुन रही कि तुझे भी परलोक रूपी ससुराल में आना है।

18मायके रूपी इस लोक में तुम्हारा सदा के दिए वास नहीं हो सकता॥ ३॥

19नानक जी कहते हैं कि जो जीवात्मा निश्चित होकर इस लोक में आज्ञान निद्रा में लीन है, उसे दिन के प्रकाश में ही सेंध लग रही है।

20यह जीव रूप स्त्री सद्गुणों की गठरी गंवा कर अवगुणों को एकत्रित करके चल पड़ी है॥ ४॥ २४॥

21श्रीरागु महला १ घरु दूजा २ ॥

22वह परिपूर्ण परमात्मा स्वयं ही रसिया है, स्वयं ही रस रूप है तथा स्वयं ही रमण करने वाला है।

23स्वयं स्त्री रूप हो रहा है, स्वयं ही सेज और स्वयं ही पति रूप में व्याप्त है ॥१॥

24समस्त रूपों में मेरा स्वामी परिपूर्ण होकर रमण कर रहा है॥ १॥ रहाउ॥

25वह स्वयं ही मछुआ है, स्वयं मछली रूप में है, स्वयं जल है और स्वयं ही जाल रूप हो रहा है।

26स्वयं ही जाल के आगे बंधा हुआ लोहे का मनका है तथा स्वयं ही उस जाल में लगा हुआ माँस का टुकड़ा (लालु) है; अर्थात्- सर्वस्व स्वयं वह परमेश्वर ही है॥ २॥

27सतिगुरु जी कथन करते हैं कि हे सखी ! मेरा प्रियतम प्रभु स्वयं ही अनेक तरह के आनन्द वाला हो रहा है।

28वह नित्य ही सुहागिनों (प्रभु-प्रेमियों) को प्रीत करता है, हम द्वैत-भावी जीवों का हाल बहुत बुरा है॥ ३॥

29गुरु नानक जी कथन करते हैं कि हे जीव ! तुम यही विनती करो कि हे परम पिता ! तुम ही स्वयं सरोवर हो, उस पर रहने वाले हंस भी तुम ही हो।

30तुम स्वयं ही कमल हो, कुमुदिनी भी तुम हो, इन सब को देख कर तुम स्वयं ही प्रसंन होने वाले हो! ।। ४॥ २५॥

31श्रीरागु महला १ घरु ३ ॥

32इस तन रूपी भूमि में सद्कर्मो का बीजारोपण करके प्रभु-चिन्तन रूपी जल से इसकी सिंचाई करो।

33मन को कृषक बना कर हृदय में हरि-प्रभु को उगाओ, अर्थात् हृदय में प्रभु को धारण करो तथा इस तरह निर्वाण-पद रूपी फसल प्राप्त कर लोगे ॥ १॥

34हे विमूढ़ जीव ! माया का अभिमान क्यों करता है।

35माता, पिता, पुत्र व स्त्री आदि समस्त सगे-सम्बन्धी अंत समय में तेरे सहायक नहीं होंगे II रहाउ II

36जिस प्रकार नदीन (खरपतवार) खेती में उग जाते हैं और कृषक उन्हें उखाड़ फेंकता है, इसी प्रकार हे मानव ! विषय-विकार रूपी नदीनों को हृदय में पनप रही खेती में से उखाड़ कर फॅक दो और इन विकारों को त्याग कर मन की एकाग्रता से प्रभु को स्मरण करो।

37जप, तप, संयम जब शरीर रूपी भूमि के रक्षक हो जाते हैं तो हृदय में कमल खिलता है और उस में से ब्रह्मानंद रूपी शहद टपक पड़ता है॥ २ ॥

38जब मनुष्य पाँच स्थूल तत्त्व, पाँच सूक्ष्म तत्त्व, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच प्राण तथा मन व बुद्धि के निवास स्थान वश में करे, तीनों अवस्थाओं-बाल्यावस्था, युवावस्था व जरावस्था में काल को स्मरण रखें।

39दस दिशाओं तथा समस्त वनस्पतियों में अपरम्पार परमेश्वर को जाने तो हे नानक ! ऐसा एकमेय अद्वितीय प्रभु उसको भवसागर से पार उतार लेगा ॥ ३॥ २६॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं