सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 239 · Raag Gauree · Guru Arjan Dev Ji

1जिसके साथ प्रभु प्राणी को लगाता है, उसके साथ वह लग जाता है।

2हे नानक ! प्रभु का सेवक केवल वही व्यक्ति बनता है जो भाग्यशाली है॥ ८ ॥ ६॥

3गउड़ी महला ५ ॥

4भगवान के सिमरन के बिना जैसे मनुष्य का जीवन सर्प जैसा है।

5वैसे ही (भगवान से टूटा हुआ) शाक्त इन्सान नाम को भुलाकर जीवन बिताता है॥ १ ॥

6जो व्यक्ति एक पल भर के लिए भी भगवान के सिमरन में समय बिताता है,

7ऐसा व्यक्ति समझो लाखों, करोड़ों दिनों सदा के लिए स्थिर हो जाता है। १॥ रहाउ॥

8भगवान के सिमरन बिना अन्य सांसारिक कर्म करने धिक्कार योग्य हैं।

9जिस तरह कौए की चोंच विष्टा में होती है, वैसे ही स्वेच्छाचारी का निवास विष्टा में होता है॥ २॥

10भगवान के सिमरन बिना मनुष्य के कर्म कुते जैसे हो जाते हैं।

11शाक्त इन्सान वेश्या के पुत्र की भाँति बदनाम हो जाते हैं। ३॥

12भगवान के सिमरन बिना प्राणी सींगों वाले मेंढे(भेड़) की तरह है।

13शाक्त इन्सान झूठ व्यक्त करता है और जिस कारण दुनिया में उसका मुँह काला किया जाता है॥ ४॥

14भगवान के सिमरन के बिना शाक्त इन्सान गधे की भाँति

15अष्ट स्थानों पर भटकता रहता है॥५॥

16भगवान के सिमरन बिना इन्सान पागल कुते की तरह भौंकता रहता है।

17शाक्त इन्सान लोभ में फंसकर बन्धनों में ही पड़ा रहता है॥ ६॥

18भगवान के सिमरन बिना मनुष्य आत्मघाती है।

19भगवान से टूटा हुआ इन्सान नीच है और उसकी कोई कुल अथवा जाति नहीं होती ॥ ७ ॥

20जिस व्यक्ति पर ईश्वर कृपालु हो जाता है, उसको वह संतों की संगति में मिला देता है।

21हे नानक ! गुरु जी ने समूचे संसार का कल्याण कर दिया है॥ ८ ॥ ७॥

22गउड़ी महला ५ ॥

23गुरु के वचन से मुझे परमगति मिल गई है।

24पूर्ण गुरु ने मेरा मान-सम्मान रख लिया है॥ १॥

25गुरु के वचन से मैंने भगवान के नाम का ध्यान किया है।

26गुरु की कृपा से मुझे आत्मिक सुख का निवास प्राप्त हो गया है॥ १॥ रहाउ॥

27मैं गुरु का वचन ही सुनता और अपनी जिव्हा से उच्चरित करता रहता हूँ।

28गुरु की कृपा से मेरी वाणी अमृत समान मधुर हो गई है॥ २॥

29गुरु के वचन से मेरा अहंकार दूर हो गया है।

30गुरु की कृपा से मेरा दुनिया में बड़ा प्रताप हो गया है॥ ३॥

31गुरु के वचन से मेरा भ्रम मिट गया है।

32गुरु के वचन से मैंने सर्वव्यापक परमात्मा के दर्शन कर लिए हैं।॥ ४॥

33गुरु के वचन से मुझे राजयोग प्राप्त हुआ है।

34गुरु की संगति करने से बहुत सारे लोग भवसागर से पार हो गए हैं।॥५॥

35गुरु के वचन से मेरे तमाम कार्य सफल हो गए हैं।

36गुरु के वचन से मुझे नाम का भण्डार मिल गया है॥ ६॥

37जिस किसी व्यक्ति ने भी मेरे गुरु पर आस्था धारण की है,

38उसकी मृत्यु का बन्धन कट गया है॥ ७॥

39गुरु के वचन से ही मेरे भाग्य जाग गए हैं।

40हे नानक ! गुरु को मिलने से ही भगवान प्राप्त हो गया है॥ ८ ॥ ८ ॥

41गउड़ी महला ५ ॥

42उस गुरु को मैं श्वास-श्वास से याद करता रहता हूँ।

43गुरु मेरे प्राणों का आधार है, यह सतिगुरु ही मेरी जीवन-पूंजी हैं॥ १॥ रहाउ॥

44मैं गुरु के दर्शन करके ही जीवित रहता हूँ।

45मैं गुरु के चरण घो-धोकर उस चरणामृत का पान करता हूँ॥ १ ॥

46मैं गुरु की चरणधूलि में प्रतिदिन स्नान करता हूँ।

47यूं मैंने जन्म-जन्मांतरों के अहंकार की मैल को धो दिया है॥ २॥

48उस गुरु को मैं पंखा करता हूँ।

49अपना हाथ देकर गुरु ने मुझे मोह-माया की महा अग्नि से बचा लिया है॥ ३॥

50मैं उस गुरु के घर के लिए जल ढोता हूँ,

51जिन से मैंने ज्ञान का मार्ग समझा है॥ ४॥

52उस गुरु के घर के लिए मैं सदा ही चक्की पीसता हूँ,

53जिसकी दया से मेरे तमाम शत्रु मित्र बन गए हैं।॥ ५॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं