सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 237 · Raag Gauree · Guru Arjan Dev Ji

1सहज ही उसके शरीर की दुविधा नाश हो जाती है।

2जिसके पास सहज है, प्रसन्नता उसके हृदय में उदय हो जाती है।

3उसको परमानन्द प्रभु मिल जाता है।॥ ५ ॥

4सहज ही वह नाम-अमृत का पान करता है।

5सहज ही वह आवश्यकतामंद प्राणियों को दान देता है।

6प्रभु की कथा में उसकी आत्मा स्वाद प्राप्त करती है।

7उसके साथ अनश्वर परमात्मा वास करता है॥ ६॥

8सहज ही उसको आसन अच्छा लगने लग जाता है।

9सहज ही उसके हृदय में अनहद शब्द गूंजने लगता है।

10भीतर के आत्मिक आनन्द की मधुर ध्वनि सहज ही उसको शोभायमान कर देती है।

11उसके हृदय-घर में पारब्रह्म प्रभु निवास करता है॥ ७॥

12जिसके भाग्य में प्रभु को मिलने का विधान लिखा हुआ है,

13वह सहज ही सच्चे धर्म वाले गुरु जी से मिल जाता है।

14केवल वही ईश्वर की अनुभूति करता है, जिसे सहज की देन प्राप्त हुई है।

15दास नानक उस पर कुर्बान जाता है॥ ८ ॥ ३॥

16गउड़ी महला ५ ॥

17संर्वप्रथम मनुष्य गर्भ (की पीड़ा) निवास से मुक्ति पाकर बाहर आता है।

18तदुपरांत वह अपने आपको पुत्र, पत्नी एवं परिवार के मोह में फंसा लेता है।

19अनेक प्रकार के भोजन एवं अनेक प्रकार के वस्त्र, निश्चित ही चले जाएँगे रे; हे विनीत मनुष्य ! ॥ १ ॥

20कौन-सा निवास है जो कदाचित नाश नहीं होता।

21वह कौन-सी वाणी है, जिससे मंदबुद्धि दूर हो जाती है॥ १ll रहाउ॥

22इन्द्रलोक में मृत्यु निश्चित एवं अनिवार्य है।

23ब्रह्मा का लोक भी स्थिर नहीं रहना।

24शिवलोक का भी नाश हो जाएगा।

25तीन गुणों वाली माया एवं दानव लुप्त हो जाएँगे॥ २॥

26पहाड़, वृक्ष, धरती, आकाश और सितारे,

27सूर्य, चन्द्रमा, पवन, अग्नि,

28दिन, रात, उपवास एवं उनके भेद,

29शास्त्र, स्मृतियां एवं वेद समस्त नाश हो जाएँगे।॥ ३॥

30तीर्थ स्थान, देवते, मन्दिर एवं ग्रंथ,

31माला, तिलक, चिन्तनशील, पवित्र, एवं हवन करने वाले,

32धोती, दण्डवत-नमस्कार, अन्नदान व भोग-विलास,

33ये तमाम पदार्थ एवं सारा संसार ही कूच कर जाएगा ॥ ४ ॥

34जाति, वर्ण, मुसलमान एवं हिंदू,

35पशु, पक्षी, अनेक योनियों के प्राणी,

36सारा जगत् एवं रचना जो दृष्टिगोचर होता है,

37ये तमाम नष्ट हो जाएँगे ॥ ५ ॥

38प्रभु की प्रशंसा, उसकी भक्ति एवं यथार्थ ज्ञान द्वारा

39मनुष्य सदैव सुख एवं अटल सच्चा निवास पा लेता है।

40वहाँ सत्संग में वह प्रेमपूर्वक ईश्वर की गुणस्तुति करता है।

41वहाँ वह सदैव भयरहित नगर में रहता है॥ ६ ॥

42वहाँ कोई भय, दुविधा, शोक एवं चिन्ता नहीं।

43वहाँ जीवन में आना जाना और पुनः मरना नहीं होता

44वहाँ हमेशा प्रसन्नता एवं सहज कीर्त्तन के मंच हैं।

45प्रभु के भक्त वहाँ रहते हैं और ईश्वर का यश गायन करना उनका आधार है॥ ७ ॥

46सर्वोपरि परमेश्वर का कोई अन्त एवं सीमा नहीं।

47सृष्टि में कोई भी ऐसा प्राणी नहीं जो उसके गुणों का अन्त पाने का विचार कर सके।

48हे नानक ! जिस पर प्रभु कृपा धारण करता है,

49वह संतों की संगति द्वारा भवसागर से पार हो जाता है और अटल निवास को प्राप्त कर लेता है॥ ८॥ ४ ॥

50गउड़ी महला ५ ॥

51वही व्यक्ति शूरवीर है, जो इस अहंत्व का नाश कर देता है।

52जो व्यक्ति इस अहंत्व को मार देता है, वही पूर्ण है।

53जो व्यक्ति इस अहंत्व को समाप्त कर देता है, वही यश प्राप्त कर लेता है।

54जो इस अहंत्व को मार देता है, वह दुखों से मुक्ति प्राप्त कर लेता है॥ १॥

55कोई विरला ही ऐसा पुरुष है, जो अपने द्वैतवाद को मारकर दूर फैंकता है।

56इस अहंत्व को खत्म करके वह राजयोग प्राप्त करता है॥ १॥ रहाउ ॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं