सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 236 · Raag Gauree · Guru Arjan Dev Ji

1एक परमेश्वर सब कुछ करता और जीवों से करवाता है।

2वह स्वयं ही बुद्धि, विचार एवं विवेक है।

3वह कहीं दूर नहीं अपितु सबके निकट एवं पास ही है।

4हे नानक ! सत्यस्वरूप परमेश्वर की प्रेमपूर्वकं प्रशंसा कर ॥ ८ ॥ १॥

5गउड़ी महला ५ ॥

6गुरु की श्रद्धापूर्वक सेवा करने से ही मनुष्य नाम के साथ लग जाता है।

7जिसके मस्तक पर भाग्यरेखाएँ विद्यमान हों केवल वहीं व्यक्ति नाम को प्राप्त करता है।

8वह प्रभु उसके हृदय में निवास करता है।

9(प्रभु के निवास से) मनुष्य का मन एवं तन शीतल तथा स्थिर हो जाते हैं।॥ १॥

10हे मेरे मन ! ईश्वर का ऐसा भजन गायन कर,

11जो लोक तथा परलोक में तेरे काम आएगा ॥ १॥ रहाउ ॥

12जिसकी महिमा-स्तुति करने से भय एवं विपदा दूर हो जाते हैं

13और भटकता हुआ मन स्थिर हो जाता है।

14जिसकी महिमा-स्तुति करने से पीड़ा दोबारा नहीं आती।

15जिसकी महिमा-स्तुति करने से यह अहंकार भाग जाता है॥ २॥

16जिसकी महिमा-स्तुति करने से पाँच विकार (काम, क्रोध, मोह, लोभ, अहंकार) वश में आ जाते हैं।

17जिसकी महिमा-स्तुति करने से हरि-रस हृदय में संचित हो जाता है।

18जिसकी महिमा-स्तुति करने से यह तृष्णा मिट जाती है।

19जिसकी महिमा-स्तुति करने से प्रभु के दरबार में मनुष्य स्वीकार हो जाता है॥ ३॥

20जिसकी महिमा-स्तुति करने से करोड़ों पाप नष्ट हो जाते हैं।

21जिसकी महिमा-स्तुति करने से मनुष्य हरि का संत बन जाता है।

22जिसकी महिमा-स्तुति करने से मन शीतल हो जाता है।

23जिसकी महिमा-स्तुति करने से तमाम (मोह-माया की) मैल साफ हो जाती है॥ ४ ॥

24जिसकी महिमा-स्तुति करने से हरि रत्न प्राप्त हो जाता है।

25मनुष्य दोबारा प्रभु को नहीं छोड़ता और उसके साथ घुलमिल जाता है।

26जिसकी महिमा-स्तुति करने से अधिकतर स्वर्ग में निवास पा लेते हैं।

27जिसका भजन करने से मनुष्य सहज ही आत्मिक सुख में निवास करता है। ५॥

28जिसकी महिमा-स्तुति करने से यह अग्नि प्रभावित नहीं करती।

29जिसका भजन करने से यह मृत्यु दृष्टि नहीं करती।

30जिसकी महिमा-स्तुति करने से तेरा मस्तक निर्मल हो जाएगा।

31जिसकी महिमा-स्तुति करने से तमाम दुःख- क्लेश दूर हो जाता है॥ ६॥

32जिसकी महिमा-स्तुति करने से मनुष्य पर कोई विपदा पेश नहीं आती।

33जिसकी महिमा-स्तुति करने से मनुष्य अनहद ध्वनि श्रवण करता है।

34जिसकी महिमा-स्तुति करने से प्राणी का जीवन पवित्र हो जाता है।

35जिसकी महिमा-स्तुति करने से हृदय कमल सीधा (सरल) हो जाता है॥ ७ ॥

36गुरु जी ने अपनी शुभ दृष्टि उन सब पर की है,

37जिनके हृदय में ईश्वर ने अपना नाम (मंत्र) प्रदान किया है।

38वह प्रभु के अखंड कीर्तन को अपना आहार व सुन्दर भोजन मानते हैं

39हे नानक ! जिनके पूर्ण सतिगुरु जी मार्गदर्शक हैं। ॥ ८ ॥ २॥

40गउड़ी महला ५ ॥

41जो व्यक्ति गुरु के शब्द को अपने हृदय में धारण कर लेता है,

42वह पाँच विकारों-काम, क्रोध, लोभ, मोह एवं अहंकार से अपना संबंध तोड़ लेता है

43और दसों इन्द्रियों (पाँच ज्ञान व पाँच कर्म) को अपने वश में कर लेता है।

44उसके हृदय में ज्ञान का प्रकाश हो जाता है॥ १॥

45केवल उसे ही ऐसा आत्मबल प्राप्त होता है,

46जिस इन्सान पर प्रभु की दया एवं कृपा होती है॥ १॥ रहाउ ॥

47ऐसे इन्सान के लिए मित्र एवं शत्रु एक समान हैं।

48जो कुछ वह बोलता है, वह ज्ञान ही कहता है।

49जो कुछ वह सुनता है, वह प्रभु का नाम ही सुनता रहता है।

50जो कुछ वह दृष्टिगोचर करता है, उस सब में ईश्वर की अनुभूति है॥ २॥

51वह सुख में जागता है और सुख में ही सोता है।

52जो कुछ प्राकृतिक होना है, वह उसके होने पर प्रसन्न रहता है।

53सहज ही वह वैराग्यवान होता है और सहज ही मुस्कराता है।

54सुख में ही वह खामोश रहता है और सुख में ही प्रभु के नाम का जाप करता है॥ ३॥

55सहज ही वह भोजन करता है और सहज ही वह प्रभु से प्रेम करता है।

56उसका अज्ञानता का पर्दा सहज ही सब निवृत्त हो जाता है।

57वह सहज ही संतों की संगति में मिल जाता है।

58सहज ही उसे पारब्रह्म प्रभु प्रत्यक्ष रूप से मिल जाता है। ४ ॥

59आत्मिक स्थिरता में वह घर में रहता है और आत्मिक स्थिरता में ही वह निर्लिप्त रहता है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं