सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 235 · Raag Gauree · Guru Raam Daas Ji

1यदि ईश्वर तुझे स्वयं मुक्त करे, तुम मुक्त हो जाओगे। सतिगुरु के चरणों की तू उपासना कर॥ ४॥

2हे मेरे प्रिय मन ! देहि में मौजूद ज्योति को ध्यानपूर्वक रख।

3गुरु जी ने नाम के नौ भण्डार दिखा दिए हैं। दयालु ईश्वर ने यह देन प्रदान कर दी है॥ ५॥

4हे मेरे चंचल मन ! अपनी विकराल चतुराई को त्याग दे।

5प्रभु-परमेश्वर के नाम का तू भजन कर। अंतिम समय ईश्वर का नाम तेरा कल्याण करेगा ॥ ६॥

6हे मेरे स्वेच्छाचारी मन ! यदि तू ज्ञान रुपी रत्न की सँभाल कर ले तो तू बड़ा सौभाग्यशाली होगा।

7अपने हाथ में मृत्यु का वध करने वाली गुरु के ज्ञान की तलवार पकड़ कर तू यमदूत का संहार कर दे ॥ ७ ॥

8हे स्वेच्छाचारी मन ! तेरे भीतर नाम का भण्डार है, तू इसे ढूंढता हुआ दुविधा में बाहर भटकता फिरता है।

9महापुरुष गुरु जी जब तुझे मिलेंगे तो मित्र प्रभु को अपने साथ ही पा लोगे॥ ८ ॥

10हे मेरे भटकते मन ! तू सांसारिक ऐश्वर्य-वैभव में लीन है। प्रभु के प्रेम को तू सदैव धारण कर।

11गुरु की सेवा करने और नाम-स्मरण द्वारा प्रभु का रंग फीका नहीं होता ॥९॥

12हे मेरे भटकते मन ! हम पक्षी हैं, प्रभु-परमेश्वर एक अमर वृक्ष है।

13हे नानक ! गुरु के माध्यम से भाग्यशाली ही नाम रूपी वृक्ष को प्राप्त करते हैं और नाम का चिंतन करते रहते हैं।॥ १०॥ २ ॥

14रागु गउड़ी गुआरेरी महला ५ असटपदीआ

15ੴ सतिनामु करता पुरखु गुर प्रसादि ॥

16जब इन्सान अपने मन में घमण्ड करता है

17तो वह पागल व पराया होकर भटकता रहता है।

18परन्तु जब यह सब की चरण-धूलि हो जाता है

19तो वह राम के प्रत्येक हृदय में दर्शन कर लेता है॥ १॥

20विनम्रता का फल प्राकृतिक तौर पर सुहावना है।

21यह देन मेरे सतिगुरु ने मुझे दान की है॥ १॥ रहाउ ॥

22जब तक मनुष्य दूसरों को बुरा समझता है तो

23सभी उसको (बेईमानी के) जाल में फँसाते हैं।

24जब वह भेदभाव के अर्थों में ख्याल करने से हट जाता है

25तो उससे कोई भी शत्रुता नहीं करता ॥२॥

26जब वह मेरी अपनी का स्वार्थ रखता है तो

27उस पर भारी विपदा टूट पड़ती है।

28लेकिन जब वह अपने प्रभु को पहचान लेता है

29तो इसे कोई भी जलन नहीं होती। ३॥

30जब मनुष्य अपने आपको सांसारिक मोह में उलझा लेता है,

31तो वह जन्म-मरण के चक्र में पड़ा रहता है और सदा मृत्यु की दृष्टि में होता है।

32जब समस्त दुविधाएँ उससे निवृत्त हो जाती हैं तो

33इसमें पारब्रह्म प्रभु के बीच कोई अन्तर नहीं रहता॥ ४॥

34जब से मनुष्य ने कुछ भेदभाव नियत किया है,

35तब से वह दुःख, दण्ड एवं विपदा सहन करता है।

36जब से यह केवल एक ईश्वर को जानने लग जाता है,

37तब से उसको सर्वस्व का ज्ञान हो जाता है। ५॥

38जब वह धन-दौलत हेतु भाग-दौड़ करता है तो

39वह संतुष्ट नहीं होता और न ही उसकी प्यास बुझती है।

40जब वह इससे भाग जाता है तो

41लक्ष्मी उठकर उसके पीछे लग जाती है। ६॥

42जब मनुष्य को कृपा करके सतिगुरु जी मिल जाते हैं

43तो मनुष्य के मन-मन्दिर में ज्ञान का दीपक प्रज्वलित हो जाता है।

44जब मनुष्य विजय एवं पराजय की अनुभूति कर लेता है तो

45वह इस घर के मूल्य को जान लेता है॥ ७॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं