सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 234 · Raag Gauree · Guru Amar Daas Ji

1वही व्यक्ति निर्मल हैं जो गुरु के शब्द में मग्न रहते हैं। वह सतिगुरु के निर्देशानुसार अनुसरण करते हैं।॥ ७ ॥

2हे मेरे प्रभु-परमेश्वर ! एक तू ही दाता है, तू स्वयं ही प्राणियों को क्षमादान करके अपने साथ मिला लेता है।

3हे ईश्वर ! नानक ने तेरी शरण ली है। जैसे तुझे अच्छा लगता है, वैसे ही उसको तू मुक्ति प्रदान कर॥ ८॥ १॥ ९॥

4रागु गउड़ी पूरबी महला ४ करहले

5ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।

6हे मेरे ऊँट समान परदेसी मन ! तू किस तरह अपनी माता समान प्रभु से मिल सकता है ?

7जब पूर्ण सौभाग्य से गुरु मिल जाए तो ही प्रियतम (प्रभु) आलिंगन करके मिल सकता है॥ १॥

8हे मेरे स्वेच्छाचारी मन ! महापुरुष सतिगुरु का ध्यान करता रह॥ १॥ रहाउ॥

9हे मेरे विचारवान भटकते मन ! तू हरि राम के नाम का ध्यान कर।

10जिस स्थान पर कर्मो का लेखा-जोखा माँगा जाएगा, ईश्वर स्वयं तेरी मुक्ति करा देगा ॥ २॥

11हे मेरे स्वेच्छाचारी मन ! कभी तुम अत्यंत निर्मल होते थे लेकिन अब तुझे अहंकार की मैल आकर लग गई है।

12प्रियतम प्रभु तेरे हृदय गृह में तेरे सामने ही प्रत्यक्ष है। उससे जुदा होकर तुम चोटें खा रहे हो॥ ३॥

13हे मेरे प्यारे मन ! कोशिश कर और अपने हृदय में ईश्वर की भलीभाँति खोज कर।

14किसी भी उपाय से वह मिल नहीं सकता, गुरु जी तेरे हृदय में ही तुझे ईश्वर के दर्शन करवा देंगे॥ ४॥

15हे मेरे मन ! दिन-रात प्रभु के चरणों में वृति लगा।

16इस प्रकार प्रियतम के महल में जाकर अपना स्थान प्राप्त कर लोगे। लेकिन गुरु ही तुझे प्रियतम प्रभु से मिला सकता है॥ ५॥

17हे मेरे मन ! तुम मेरे मित्र हो, इसलिए तू पाखण्ड एवं लोभ को त्याग दे।

18क्योंकि पाखण्डी एवं लोभी की खूब पिटाई होती है, अपनी छड़ी से मृत्यु उनको दण्ड देती है॥ ६॥

19हे मेरे स्वेच्छाचारी मन ! तुम मेरे प्राण हो, तू पाखण्ड एवं दुविधा की मैल त्याग दे।

20हरि नाम रूपी अमृत का सरोवर पूर्ण गुरु ने भरा हुआ है। अत: सत्संग में मिलने से विकारों की मैल दूर हो जाती है॥ ७॥

21हे मेरे परदेसी मन ! एक गुरु की सीख सुन।

22माया का यह मोह अत्याधिक फैला हुआ है। अन्त में प्राणी के साथ कुछ भी नहीं जाता॥ ८ ॥

23हे स्वेच्छाचारी मन ! हे मेरे साजन ! ईश्वर के नाम को अपनी यात्रा खर्च के तौर पर प्राप्त करके शोभा पा।

24ईश्वर के दरबार में तुझे मान-सम्मान की पोशाक पहनाई जाएगी और ईश्वर स्वयं तुझे अपने आलिंगन लगाएगा ॥९॥

25हे मेरे स्वेच्छाचारी मन ! जो गुरु का आदेश मानता है, वह गुरु जी के उपदेश से प्रभु की सेवा करता है।

26हे नानक ! गुरु के समक्ष प्रार्थना कर, वह तुझे ईश्वर के साथ मिला देंगे॥ १०॥ १॥

27गउड़ी महला ४ ॥

28हे मेरे विचारशील मन ! विचार करके ध्यानपूर्वक देख।

29वनों में रहने वाले वनवासी वनों में भटकते थक गए हैं। गुरु की शिक्षा द्वारा प्रभु-पति को अपने हृदय में ही देख॥ १॥

30हे मेरे स्वेच्छाचारी मन ! गुरु गोबिन्द को स्मरण कर ॥ १॥ रहाउ॥

31हे मेरे विचारवान मन ! स्वेच्छाचारी (मोह-माया के) भारी जाल में फँसे हुए हैं।

32गुरमुख प्राणी मोह-माया के बन्धनों से मुक्त है चूंकि वह हरि-परमेश्वर का नाम-ही याद करता रहता है।॥ २॥

33हे प्यारे मन ! सत्संग में सतिगुरु को खोज।

34संतों की संगति में रहकर भगवान के नाम का ध्यान करता रह, क्योंकि भगवान का नाम ही तेरे साथ (परलोक में) जाएगा ॥ ३॥

35हे भटकते मन ! जिस व्यक्ति पर भगवान अपनी एक कृपा-दृष्टि कर देता है, वह भाग्यशाली हो जाता है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं