सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 232 · Raag Gauree · Guru Amar Daas Ji

1वे सृजनहार प्रभु के नाम को स्मरण नहीं करते।

2इसलिए वह बार-बार जीवन मृत्यु के चक्र में फँसकर जन्म लेते और मरते हैं।॥ २॥

3अज्ञानी गुरु द्वारा दुविधा निवृत्त नहीं होती।

4संसार के मूल सृष्टिकर्ता को त्याग कर प्राणी द्वैतवाद से जुड़े हुए हैं।

5माया के विष में मग्न हुआ जीव माया के विष में ही समा जाता है॥ ३॥

6माया को मूल सहारा जानकर प्राणी भटकते फिरते हैं।

7माया के मोह में उन्होंने पूज्य परमेश्वर को विस्मृत कर दिया है।

8ईश्वर जिस प्राणी पर कृपा-दृष्टि करता है, वह परमगति प्राप्त कर लेता है॥ ४ ॥

9जिसके हृदय में सत्य विद्यमान है, वह बाहर भी सत्य ही बांटता है।

10सत्य छिपा नहीं रहता चाहे मनुष्य इसको छिपा कर ही रखे।

11ज्ञानी सहज ही सत्य का ज्ञान प्राप्त कर लेता है॥ ५॥

12गुरुमुख सत्य में वृति लगाकर रखता है।

13ऐसा व्यक्ति अहंकार एवं माया का मोह ईश्वर के नाम से जला देता है।

14मेरा सत्यस्वरूप परमेश्वर उसको अपने मिलाप में मिला लेता है॥ ६॥

15नाम की देन देने वाला सतिगुरु अपना शब्द ही सुनाता है।

16वह माया के पीछे भागते मन पर विराम लगाकर उसे नियंत्रित करता है।

17पूर्ण गुरु से प्राणी ज्ञान प्राप्त करता है॥ ७॥

18सृजनहार प्रभु स्वयं सृष्टि की रचना करता है और स्वयं ही इसका विनाश भी करता है।

19उस प्रभु के बिना दूसरा कोई नहीं।

20हे नानक ! कोई गुरमुख ही इस तथ्य को समझता है॥ ८॥ ६॥

21गउड़ी महला ३ ॥

22परमेश्वर का अमूल्य नाम गुरमुख ही प्राप्त करता है।

23वह नाम की सेवा करता रहता है और नाम में सहज ही समा जाता है।

24वह नित्य ही अपनी जिव्हा से अमृतमयी नाम का गुणानुवाद करता है।

25जिस पर भगवान अपनी कृपा करता है, वही व्यक्ति हरि रस प्राप्त करता है॥१॥

26हे जिज्ञासु ! अपने मन में रात-दिन सृष्टि के स्वामी जगदीश का जाप करो।

27गुरु के माध्यम से तुझे परम पद अवस्था प्राप्त होगी॥ १॥ रहाउ॥

28उस गुरमुख के मन में प्रसन्नता प्रकट हो जाती है।

29जो व्यक्ति गुणों के भण्डार सत्यस्वरूप परमेश्वर का भजन करते है,

30वह सदा अपने ईश्वर के सेवकों के सेवकों का सेवक बना रहता है।

31वह अपने गृह एवं परिवार में हमेशा निर्लिप्त रहता है॥ २॥

32कोई विरला गुरमुख ही जीवन में मोह-माया के बन्धनों से मुक्त होता है।

33केवल यही नाम पदार्थ को प्राप्त करता है।

34वह माया के त्रिगुणों को मिटा कर पवित्र हो जाता है।

35वह सहज ही उस सत्यस्वरूप परमेश्वर में लीन हो जाता है॥ ३ ॥

36उसका अपने परिवार से मोह एवं प्रेम नहीं रहता।

37जिस व्यक्ति के हृदय में सत्य का निवास हो जाता है,

38गुरमुख का मन भगवान की भक्ति में लग जाता है और वह स्थिर रहता है।

39जो प्रभु के हुक्म को पहचानता है, वह सत्य को समझ लेता है॥ ४॥

40हे प्रभु ! तू स्रष्टा हैं, मैं किसी दूसरे को नहीं जानता।

41हे नाथ ! मैं तेरी ही सेवा करता हूँ और तेरे द्वारा ही मैं शोभा पाता हूँ।

42यदि वह प्रभु दया करे तो मैं उसका यश गायन करता हूँ।

43समूचे जगत् में (प्रभु के) नाम रत्न का ही प्रकाश है॥ ५॥

44गुरुमुख को वाणी बहुत मीठी लगती है।

45उसका हृदय प्रफुल्लित हो जाता है और रात-दिन उसकी वृति इस पर केन्द्रित हुई रहती है।

46गुरु की कृपा से सत्य नाम सहज ही मिल जाता है।

47पूर्ण किस्मत से प्राणी को सतिगुरु मिलता है॥ ६॥

48अहंकार, मोह, दुर्बुद्धि एवं दुख नाश हो जाते हैं,

49जब गुणों के सागर प्रभु का नाम हृदय में बसता है

50जब प्रभु के चरण हृदय में बस जाते है,

51ईश्वर का भजन एवं उसका यश गायन करने से गुरमुख की बुद्धि जाग जाती है।॥७॥

52जिसे प्रभु नाम प्रदान करता है, केवल वही पुरुष ही इसको पाता है।

53जो गुरु के माध्यम से अपने अहंकार को त्याग देते हैं, उनको प्रभु अपने साथ मिला लेता है।

54अपने हृदय में वह सत्य नाम को बसा लेते हैं।

55हे नानक ! वे सहज ही सत्य में समा जाते हैं॥ ८ ॥ ७ ॥

56गउड़ी महला ३ ॥

57जिस व्यक्ति ने ईश्वर के भय में सहज स्वभाव ही मन को संवार लिया है,

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं