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गुरु ग्रंथ साहिब 231 · Raag Gauree · Guru Amar Daas Ji

1वह वास्तविकता को नहीं समझते और घास-फूस की गठरी सिर पर बांधते हैं।॥ २॥

2अज्ञानी स्वेच्छाचारी जीव कुमार्ग ही पड़ा रहता है।

3वह ईश्वर के नाम को विस्मृत कर देता है और (मोह-माया के) अनेकों कर्म दृढ़ करता है।

4ऐसे स्वेच्छाचारी द्वैतवाद के कारण भयानक संसार सागर में डूब जाते हैं।॥ ३॥

5धन-दौलत का अभिलाषी अपने आपको पण्डित कहलवाता है।

6पापों में अनुरक्त हुआ वे बड़े कष्ट सहन करता है।

7यमदूत की रस्सी उसकी गर्दन के निकट है और मृत्यु हमेशा ही उसको पीड़ित करती है॥ ४॥

8लेकिन गुरमुख के निकट यमदूत नहीं आता।

9ईश्वर का नाम उनके अहंकार एवं द्वैतवाद को जला देता है।

10गुरमुख नाम में मग्न होकर प्रभु की महिमा करता रहता है॥ ५॥

11माया प्रभु के भक्तों की सेविका है और उनकी भरपूर सेवा करती है।

12यदि मनुष्य भक्तों के चरण-स्पर्श करता है तो उसे प्रभु का स्वरुप मिल जाता है।

13ऐसा व्यक्ति सदैव ही पवित्र है और सहज ही सत्य में समा जाता है॥ ६ ॥

14जो व्यक्ति हरि कथा सुनता है, वह इस संसार में धनवान दिखाई देता है।

15सभी उसको प्रणाम करते हैं और लोग दिन-रात उसकी पूजा-अर्चना करते हैं।

16वह अपने हृदय में सहज ही सत्य परमेश्वर का यश गायन करते हैं।॥ ७ ॥

17पूर्ण सतिगुरु जी ने अपना उपदेश सुनाया है,

18जिससे (माया के) तीन गुणों का प्रभाव लुप्त हो गया है और मनुष्य का मन आत्मिक अवस्था से जुड़ गया है।

19हे नानक ! अपना अहंकार निवृत्त करके वह ब्रह्म में मिल गया है॥ ८ ॥ ४॥

20गउड़ी महला ३ ॥

21पण्डित ब्रह्मा के रचित वेदों का अध्ययन करता है और वाद-विवाद वर्णन करता है।

22उसकी अंतरात्मा में क्रोध विद्यमान है, जिससे वह अपने आपको नहीं समझता।

23यदि वह गुरु के शब्द का बखान करे तभी उसे परमात्मा प्राप्त हो सकता है॥ १॥

24हे भाई ! गुरु की सेवा करो, तब तुझे मृत्यु अपना ग्रास नहीं बनाएगी।

25क्योंकि माया-मोह की लगन ने स्वेच्छाचारियों को निगल लिया है॥ १॥ रहाउ॥

26गुरु के आश्रय में आने से पापी पुरुष भी पवित्र-पावन हो गए हैं।

27गुरु के शब्द से आत्मा परमात्मा से जुड़ जाती है।

28गुरु के शब्द से मनुष्य सुधर जाता है और मेरे प्रभु को पा लेता है॥ २॥

29ईश्वर उनको अपने साथ मिला लेता है, जिन्हें सतिगुरु जी मिलाना चाहते हैं।

30वे मेरे सत्यस्वरूप ईश्वर के हृदय को अच्छे लगने लगते हैं।

31वह सहज ही प्रभु की गुणस्तुति करते हैं॥ ३॥

32गुरु के बिना प्राणी दुविधा में भूले हुए हैं।

33ज्ञानहीन स्वेच्छाचारी पुरुष सदैव ही (मोह-माया का) विष सेवन करते हैं।

34वे यमदूत का दण्ड सहन करते हैं और सदैव ही दुखी होते हैं।॥ ४॥

35लेकिन यदि मनुष्य परमेश्वर की शरण प्राप्त कर ले तो यमदूत उसे दुखी नहीं करता।

36अपने अहंत्व को निवृत्त करने से मनुष्य की वृति प्रभु के साथ लग जाती है।

37वह सदैव ही अपनी वृति ईश्वर नाम के साथ लगाकर रखता है॥ ५॥

38जो पुरुष सतिगुरु की सेवा करते हैं, वही पुरुष पवित्र एवं पावन हैं।

39अपने मन को गुरु के मन के साथ जोड़ने से वे सारे जगत् पर विजय पा लेते हैं।

40हे मेरे मित्र ! इस विधि से तुझे भी आनन्द प्राप्त होगा।॥ ६॥

41जो व्यक्ति सतिगुरु की निष्ठापूर्वक सेवा करता है, वह फल प्राप्त कर लेता है।

42उसके ह्रदय में नाम विद्यमान है और उसके भीतर से अहंकार दूर हो जाता है।

43उसके लिए अनहद वाणी का शब्द गूंजता रहता है॥ ७॥

44हे मेरे भाई ! कौन-कौन सा व्यक्ति सतिगुरु की शरण में नहीं सुधरा ?

45प्रभु की भक्ति द्वारा वह उसके दरबार में शोभा पाते हैं

46हे नानक ! राम के नाम से बड़ी प्रशंसा मिलती है ॥८॥५॥

47गउड़ी महला ३ ॥

48जो व्यक्ति त्रिगुणात्मक माया का बखान करता है, उसका भ्रम दूर नहीं होता।

49उसके मोह-माया के बंधन समाप्त नहीं होते और उसे मुक्ति नहीं मिलती।

50इस युग में मुक्ति देने वाला सतिगुरु ही है॥ १॥

51गुरमुख प्राणी का भ्रम दूर हो जाता है।

52परमेश्वर के साथ वृति लगाने से सहज ध्वनि उत्पन्न हो जाती है॥ १॥ रहाउ॥

53जो व्यक्ति त्रिगुणात्मक (माया) में वास करते हैं, वे मृत्यु की प्रजा हैं।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं