गुरु ग्रंथ साहिब 230 · Raag Gauree · Guru Amar Daas Ji
1गुरमुख के मन से अहंकार निकल जाता है ।
2गुरमुख के मन को विकारों की मैल नहीं लगती।
3गुरमुख के मन में भगवान का नाम आकर बस जाता है॥ २॥
4गुरमुख का प्रत्येक कर्म-धर्म सत्य ही होता है।
5गुरमुख अहंकार एवं द्वेष को जला देता है।
6गुरमुख भगवान के नाम में मग्न रहकर ही सुखी होता है॥ ३॥
7अपने मन को जागृत कर और परमेश्वर का बोध कर।
8अन्यथा जितना भी चाहे तू लोगों को उपदेश देता रह, कोई भी तेरी बात नहीं सुनेगा।
9गुरु के माध्यम से जीवन-मार्ग को समझो जिससे तुझे सदैव सुख प्राप्त होगा ॥ ४॥
10स्वेच्छाचारी जीव बड़ा पाखंडी और चतुर होता है।
11जो कुछ भी कर्म वह करता है, वह (प्रभु के दरबार में) स्वीकार नहीं होता।
12वह जीवन-मृत्यु के बन्धन में पड़कर संसार में जन्मता-मरता रहता है और उसे सुख का कोई भी स्थान नहीं मिलता ॥ ५॥
13स्वेच्छाचारी अपना प्रत्येक कर्म बड़े अहंकार में करता है।
14बगले की भाँति वह सदैव ही ध्यान लगाकर बैठता है।
15जब यमदूत उसे पकड़ता है तो वह बड़ा पश्चाताप करता है॥ ६॥
16इसलिए (संसार में) सतिगुरु की सेवा बिना मुक्ति नहीं मिलती।
17गुरु की दया से वह प्रभु को मिल जाता है।
18चारों ही युगों (सतियुग, त्रैता, द्वापर, कलियुग) में गुरु नाम देने वाले दाता हैं।॥ ७॥
19ईश्वर का नाम गुरमुख की जाति, सम्मान एवं शोभा है।
20समुद्र की कन्या माया को उन्होंने पीट-पीट कर मार दिया है।
21हे नानक ! नाम के बिना समस्त चतुराई झूठी है॥ ८ ॥ २॥
22गउड़ी मः ३ ॥
23हे भाई ! आप लोग इस युग के धर्म (परमेश्वर नाम) का चिन्तन करो।
24क्योंकि पूर्ण गुरु ने मुझे सारी सूझ बता दी है।
25इस लोक एवं परलोक में ईश्वर का नाम ही प्राणी का सहारा है॥ १॥
26(हे भाई !) राम के नाम का भजन करो और अपने हृदय में उसके गुणों का विचार करो।
27गुरु की कृपा से अपनी विकारों की मैल को साफ कर लो ॥१॥ रहाउ॥
28वाद-विवाद एवं विरोध से प्रभु प्राप्त नहीं होता।
29मोह-माया की लगन से मन-तन फीके हो जाते हैं।
30इसलिए गुरु के शब्द द्वारा सत्य परमेश्वर में वृत्ति लगा ॥ २॥
31अहंकार के कारण सारा जगत् मैला हो गया है।
32प्रतिदिन तीर्थों का स्नान करने से अहंकार दूर नहीं होता।
33गुरु के मिलन बिना काल (मृत्यु) मनुष्य को बड़ा तंग करता है॥ ३॥
34वही मनुष्य सत्यवादी है जो अपने अहंकार को मिटा देता है
35और गुरु के शब्द द्वारा पाँच विकारों का संहार कर देता है।
36ऐसा मनुष्य स्वयं भी बच जाता है और अपने समूचे वंश का भी उद्धार कर लेता है॥ ४॥
37कलाकार (प्रभु) ने माया का मोह प्राणियों हेतु एक खेल रचा है।
38ज्ञानहीन स्वेच्छाचारी जीव मोह-माया से लिपटे रहते हैं।
39लेकिन गुरमुख इससे निर्लिप्त रहकर ईश्वर से वृति लगाते हैं॥ ५॥
40कपटी इन्सान अनेकों वेष धारण करता है।
41उसके भीतर तृष्णा विद्यमान है और वह अभिमानी होकर विचरता है।
42कपटी इन्सान अपने आपको समझता नहीं और जीवन की बाजी हार जाता है॥ ६॥
43धार्मिक वेष धारण करके कई लोग चतुरता करते हैं।
44माया के मोह एवं दुविधा ने उनको बहुत कुमार्गगामी किया हुआ है।
45गुरु की सेवा-भक्ति के बिना वह बहुत कष्ट सहन करते हैं।॥ ७ ॥
46जो व्यक्ति ईश्वर के नाम में मग्न रहते हैं, वे सदैव ही (मोह माया से) निर्लिप्त रहते हैं।
47चाहे वे गृहस्थी हैं, वह अपने हृदय में सत्य के साथ वृति लगाते हैं।
48हे नानक ! वे व्यक्ति बड़े भाग्यशाली हैं, जो सतिगुरु की सेवा करते हैं। ॥८॥ ३॥
49गउड़ी महला ३ ॥
50ब्रह्मा वेदों के अध्ययन का रचयिता है।
51सांसारिक मोह एवं तृष्णा में फँसे हुए देवते उसी से उत्पन्न हुए है।
52वे तीन गुणों में भटकते रहे और उन्हें ईश्वर के चरणों में स्थान न मिला ॥ १॥
53हमें ईश्वर ने (मोह-माया से) बचा लिया है और सतिगुरु जी से मिला दिया है।
54रात-दिन भगवान की भक्ति एवं ईश्वर का नाम गुरु जी ने सुदृढ़ कर दिया है॥ १॥ रहाउ॥
55ब्रह्मा की रचित वाणी लोगों को (माया के) तीन गुणों के जंजाल में फँसा देती है।
56उसका अध्ययन करके पण्डित वाद-विवाद करते हैं और यमदूत उनके सिर पर प्रहार करता है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं