गुरु ग्रंथ साहिब 22 · Siree Raag · Guru Nanak Dev Ji
1गुरमुख जीव हरि-नाम रुपी जल डाल कर चहु- अग्नि (हिंसा, मोह, क्रोध, लोभ) बुझा देता है
2उसका ह्रदय कमल की भांति खिल उठता है, क्योंकि उनके हृदय में नाम-अमृत भरा हुआ है।
3गुरु जी कथन करते हैं कि हे जीव ! तू सतगुरु को अपना मित्र बना, जिनकी कृपा से तुम परलोक मैं सुख प्राप्त करोगे ॥ ४ ॥ २०॥
4श्रीरागु महला १ ॥
5हे प्रिय जीव ! हरि–नाम का जाप करो तथा गुरु उपदेश द्वारा प्रभु का नाम-सुमिरन करो।
6मन को सत्य की कसौटी पर कस कर परमात्मा की यथार्थ तुला पर तोला जाता है।
7उस मन की कीमत कही नहीं डाली जा सकती, क्योंकि वह माणिक्य की भाँति शुद्ध है और वह मूल्य से अमूल्य है॥ १॥
8हे भाई ! हरि रूपी हीरा गुरु के हृदय में ही देखा जा सकता है।
9उस हीरे को सत्संगति में तथा दिन-रात प्रभु के यशोगान से प्राप्त किया जाता है॥ १॥ रहाउ॥
10हे जिज्ञासु ! श्रद्धा रूपी पूँजी लेकर गुरु के ज्ञान-प्रकाश में सत्य सौदा करो।
11जैसे जल डालने से अग्नि बुझ जाती है, वैसे तृष्णाग्नि गुरु-भक्ति रूपी जल से दासों की दास बन जाती है।
12इससे जीव यमों के दण्ड से बच जाता है और स्वयं भी भवसागर से पार हो जाता है तथा अन्य को भी पार होने में सहायता करता है॥ २॥
13गुरु के उन्मुख जीवों को असत्य अच्छा नहीं लगता, वे प्रायः सत्य परमात्मा में लिप्त रहते हैं और सत्य ही उनको भाता है।
14शक्ति उपासक (शाक्त) गुरु से विमुख जीव को सत्य नहीं भाता, असत्य की नीव भी असत्य ही होती है।
15पूर्ण गुरु से मिल कर जो सत्य नाम में रम रहे हैं, वे गुरमुख सत्य होकर सत्य स्वरूप परमात्मा में अभेद हो रहे हैं।॥ ३॥
16मन में माणिक्य, लाल, हीरे, रत्न के तुल्य हरि-नाम पदार्थ विद्यमान है।
17वह गहन-गम्भीर प्रभु प्रत्येक हृदय में वास करता है, उसका नाम-धन ही सच्चा सौदा है।
18नानक जी कहते हैं कि हीरे की भाँति अमूल्य हरि यदि कृपा करे तो गुरु द्वारा ही नाम रूपी सच्चा सौदा प्राप्त किया जा सकता है॥४॥२१॥
19श्रीरागु महला १ ॥
20देश-देशान्तर का भ्रमण करने से भी भ्रमाग्नि शांत नहीं होती, चाहे कोई कितना भी भ्रमण क्यों न कर ले।
21अंतर्मन से मैल दूर नहीं होती, ऐसे जीवन को धिक्कार है, ऐसे भेष को भी धिक्कार है।
22सतिगुरु के उपदेश बिना किसी भी प्रकार से प्रभु की भक्ति नहीं हो सकती ॥ १॥
23हे प्रिय मन ! गुरु के मुँह से निकलने वाले उपदेश द्वारा नाम जल लेकर तृष्णाग्नि को बुझा ले।
24यदि गुरु-उपदेश मन में बस जाए तो अहंकार व तृष्णग्नि जैसे सभी विकार नष्ट हो जाते हैं। १॥ रहाउ ॥
25परमात्मा के नाम में लिवलीन होकर यह मन अमूल्य माणिक्य बन जाता है, और प्रतिष्ठित होता है।
26लेकिन परमात्मा का नाम सत्संगति करने से ही प्राप्त होता है, गुरु की शरण पड़ने से ही परमात्मा के चरणों में सुरति लगती है।
27अहंकार दूर होने से सुख प्राप्त होता है। तब जीवात्मा परमात्मा में उसी प्रकार विलीन हो जाती है, जैसे जल में जल मिल जाता है॥ २॥
28जिस ने हरि-हरि नाम का सुमिरन नहीं किया, वह अपने अवगुणों के फलस्वरूप आवागमन के चक्र में ही पड़ा रहता है।
29जिस ने सतिगुरु महापुरुषों के साथ भेंट नहीं की, वे भवसागर में स्वयं भी दुखों के साथ खपता है और अन्य जीवों को भी खपाता है।
30यह अमूल्य रत्नों के समान मानव जन्म यूं ही कौड़ी के बदले व्यर्थ चला जाता है॥ ३॥
31जिन को सतिगुरु जी प्रसन्न होकर मिले हैं, वे पुरुष पूर्ण ज्ञानी हैं।
32गुरु से मिल कर ही भवसागर पार किया जा सकता है तथा परलोक में सम्मान प्राप्त होता है।
33नानक जी कथन करते हैं कि उनके मुख उज्ज्वल होते हैं जिन के मुख से नाम-ध्वनि उत्पन्न हो रही हो और जो गुरु के उपदेश का प्रतीक हैं॥४॥२२॥
34श्रीरागु महला १ ॥
35हे जीव रूपी व्यापारियो ! नाम रूपी व्यापार करो और सौदा सम्भाल कर रख लो।
36गुरु-उपदेशानुसार ऐसी वस्तु का क्रय करो जो सदा तुम्हारे साथ रहे।
37आगे परलोक में परमात्मा रूपी सौदागर बहुत सूझवान बैठा है, वह तुम्हारी वस्तु की सम्भाल कर लेगा। अर्थात्-तुम्हारे सौदे को वह जांच-परख कर ही ग्रहण करेगा ॥१॥
38हे भाई ! एकाग्रचित होकर राम-नाम जपो।
39इस संसार में जो श्वास रूपी पूंजी लेकर आए हो, इससे हरि यश का सौदा खरीद कर ले चलो, जिसे देख कर पति-परमात्मा प्रसंन होगा ॥ १॥ रहाउ॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं