सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 228 · Raag Gauree · Guru Nanak Dev Ji

1एक ईश्वर को मैंने पा लिया है और अब मैं किसी दूसरे को नहीं ढूंढता॥ ७॥

2गुरु जी ने मुझे अदृश्य प्रभु के सत्य मन्दिर में दर्शन करवा दिए हैं।

3प्रभु का यह मन्दिर अटल है। यह मोहिनी का प्रतिबिम्ब नहीं।

4सच्चाई द्वारा संतोष आ जाता है और दुविधा दूर हो जाती है॥ ८ ॥

5जिसके ह्रदय में सत्यस्वरूप परमात्मा निवास करता है,

6उनकी संगति में प्राणी धर्मात्मा बन जाता है।

7हे नानक ! सत्य नाम (विकारों की) मलिनता स्वच्छ कर देता है॥ ९॥ १५ ॥

8गउड़ी महला १ ॥

9जिस व्यक्ति का हृदय राम के नाम में मग्न रहता है,

10उसके दर्शन प्रात:काल उठते ही करने चाहिए॥ १॥

11हे भाई ! यदि तुम राम का भजन-सिमरन नहीं करते तो यह तुम्हारा दुर्भाग्य है।

12युग-युगों से हमारा प्रभु राम हमें नियामतें देता आ रहा है॥ १॥ रहाउ॥

13जो व्यक्ति गुरु की मति द्वारा राम का नाम जपता रहता है, वही व्यक्ति पूर्ण बन जाता है।

14ऐसे पूर्ण व्यक्ति के हृदय में अनहद मधुर बाजे बजते रहते हैं।॥ २॥

15जो व्यक्ति राम एवं राम की भक्ति से प्रेम करते हैं,

16उनको ईश्वर कृपा करके भवसागर से बचा लेता है॥ ३॥

17जिन लोगों के हृदय में हरि-परमेश्वर वास करता है,

18उनके दर्शन करने से आत्मिक सुख प्राप्त होता है॥ ४॥

19समस्त जीवों के अन्तर में एक ईश्वर मौजूद है।

20अहंकारी पुरुष अंततः योनियों में भटकता रहता है॥ ५॥

21जिसे सतिगुरु मिल जाता है, उसे ज्ञान हो जाता है।

22ऐसा प्राणी अपना अहंत्व निवृत्त करके गुरु के शब्द में लीन होकर ईश्वर को प्राप्त कर लेता है॥ ६॥

23आत्मा के परमात्मा से मिलन बारे इन्सान किस तरह जान सकता है।

24गुरु की संगति एवं मन के संतोष द्वारा जीवात्मा प्रभु के मिलन में मिल जाता है॥ ७॥

25हे प्रभु! हम जीव गुणविहीन एवं पापी हैं, और हमें कृपा करके गुणवान बना दो।

26हे नानक ! जब प्रभु दया के घर में आ जाता है तो जीव भवसागर से पार हो जाता है।॥ ८ ॥ १६॥

27सोलह असटपदीआ गुआरेरी गउड़ी कीआ ॥

28गउड़ी बैरागणि महला १

29ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।

30जैसे एक ग्वाला अपनी गायों की देखभाल करता है, वैसे ही प्रभु प्राणियों का दिन-रात पोषण एवं रक्षा करता है और उनके हृदय में आत्मिक सुख स्थापित करता है॥ १॥

31हे दीनदयालु ईश्वर ! इहलोक एवं परलोक में मेरी रक्षा कीजिए।

32हे प्रभु ! मैं तेरी शरण में आया हूँ। इसलिए मुझ पर कृपा-दृष्टि कीजिए॥ १॥ रहाउ ॥

33हे रक्षक प्रभु! जहाँ कहीं भी मैं देखता हूँ, वहाँ तुम सर्वव्यापक हो। मेरी रक्षा कीजिए।

34हे ईश्वर ! तू देन देने वाला दाता है, तू ही भोगनेवाला है और तू ही मेरे प्राणों का आधार है॥ २॥

35ज्ञान को सोचने विचारने के बिना प्राणी अपने कर्मो अनुसार नीचे गिरता अथया उच्य हो जाता है।

36सृष्टि के स्वामी जगदीश की उपमा के बिना (मोह-माया का) अंधकार दूर नहीं होता ॥ ३॥

37लालच एवं अभिमान में फँसकर मैंने जगत् का विनाश होते देखा है।

38गुरु की सेवा द्वारा परमेश्वर एवं मोक्ष का सच्चा द्वार प्राप्त होता है। ४॥

39अनन्त परमेश्वर का आत्मस्वरूप प्राणी के अपने हृदय गृह में विद्यमान है और वह परमेश्वर अपरम्पार है।

40प्रभु नाम के बिना कुछ भी स्थिर नहीं। ईश्वर के बोध द्वारा आत्मिक सुख प्राप्त होता है।॥ ५॥

41हे भाई ! इस जगत् में तुम क्या लेकर आए थे और जब तुझे मृत्यु का फँदा फँसा लगा तो क्या लेकर जाओगे ?

42रस्सी के साथ बंधे हुए कुएँ के डोल की भाँति कभी तुम आकाश में होते हो और कभी पाताल में होते हो।॥ ६॥

43यदि गुरु के उपदेश से प्राणी प्रभु नाम को विस्मृत न करे तो वह सहज ही शोभा पा लेता है।

44मनुष्य के अन्तर्मन में ही प्रभु नाम का खजाना है, परन्तु यह (खजाना) अपने अहंकार को दूर करने से ही मिलता है॥ ७॥

45यदि ईश्वर अपनी कृपा-दृष्टि करे तो प्राणी गुणवान बनकर परमात्मा की गोद में जाकर लीन होता है।

46हे नानक ! यह मिलन टूटता नहीं और सच्चा लाभ प्राप्त कर लेता है॥ ८॥ १॥ १७॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं