सिख धर्म
वापस

गुरु ग्रंथ साहिब 226 · Raag Gauree · Guru Nanak Dev Ji

1स्वेच्छाचारी इन्सान का मन पराई नारी की लालसा करता है।

2उसकी गर्दन पर मृत्यु का फँदा होता है और वह सांसारिक विवादों में फंसा रहता है।

3गुरमुख की ईश्वर की गुणस्तुति करने से मुक्ति हो जाती है॥ ५॥

4जिस प्रकार एक आचरणहीन नारी, जो अपना तन पराए पुरुष को अर्पित कर देती हैं

5और भोगविलास अथवा धन की खातिर जिसका मन दूसरे के वश में हो जाता है,

6उसे अपने पति बिना संतोष नहीं होता। द्वैत भाव वाला मनुष्य वैसा ही है॥ ६॥

7प्राणी ग्रंथों का अध्ययन करता है, स्मृतियों का पाठ करता है और वेदों, पुराणों एवं दूसरी रचनाओं का अध्ययन करता उसे सुनता है।

8परन्तु नाम-रस के साथ अनुरक्त हुए बिना मन बहुत डोलता है॥ ७ ॥

9जैसे चात्रिक का वर्षा की बूंदों के साथ प्रेम एवं उल्लास है,

10जैसे मछली जल में प्रसन्न होती है,

11वैसे ही नानक हरि रस का पान करके तृप्त हो गया है॥ ८॥ ११॥

12गउड़ी महला १ ॥

13जो व्यक्ति हठ करके मरता है, वह स्वीकार नहीं होता,

14चाहे वह धार्मिक वेशभूषा पहन ले अथवा अपने शरीर पर अधिकतर विभूति लगा ले।

15प्रभु नाम को विस्मृत करके वह अंततः पश्चाताप करता है॥ १॥

16हे भाई ! तू पारब्रह्म प्रभु की आराधना कर और अपने मन में आत्मिक सुख प्राप्त कर।

17प्रभु के नाम को विस्मृत करके तू मृत्यु का कष्ट सहन करेगा ॥ १॥ रहाउ॥

18चन्दन, अगर, कपूर, इत्र इत्यादि सुगन्धियां एवं

19सांसारिक पदार्थों की मस्ती मनुष्य को परम पद से बहुत दूर ले जाती है।

20प्रभु नाम को विस्मृत करके वह तमाम झूठों का झूठा अर्थात् व्यर्थ हो जाता है॥ २॥

21नेजे, बैंड बाजे, राजसिंघासन एवं दूसरों से नमस्कारें

22लालसा को बढ़ाते हैं और प्राणी कामवासना में लीन हो जाता है।

23भगवान के दर से मॉगे बिना उसकी भक्ति एवं नाम प्राप्त नहीं होते ॥ ३॥

24वाद-विवाद एवं अहंकार के कारण प्रभु से मिलन नहीं होता।

25अपने मन को प्रभु के समक्ष अर्पित करने से मनुष्य सुखदायक नाम को प्राप्त कर लेता है।

26अज्ञानता द्वारा प्राणी दूसरे की चाहत में उलझ जाता है, जो उसे बहुत दुखी कर देती है॥ ४ ॥

27जैसे मूल्य बिना दुकान से सौदा प्राप्त नहीं किया जा सकता।

28जैसे जहाज के बिना सागर की यात्रा नहीं की जा सकती।

29वैसे ही गुरु की सेवा बिना आत्मिक पूंजी की दृष्टि से नुक्सान ही नुक्सान होता है॥ ५ ॥

30(हे भाई !) वह गुरु धन्य, धन्य है, जो सही जीवन मार्ग दिखाता है।

31वह गुरु धन्य, धन्य है, जो मुझे शब्द सुनाता है।

32(हे भाई !) धन्य, धन्य है उसको जो मुझे ईश्वर के मिलन में मिलाता है॥ ६॥

33धन्य, धन्य है उसको जिसका यह अमूल्य जीवन है।

34गुरु के शब्द से नाम अमृत का जाप एवं पान कर।

35हे प्रभु ! नाम की शोभा तेरी इच्छा द्वारा प्रदान होती है।॥ ७॥

36हे मेरी माता ! प्रभु नाम के बिना मैं किस तरह जीवित रह सकता हूँ।

37हे प्रभु ! रात-दिन मैं नाम-स्मरण करता हूँ और तेरी शरणागत रहता हूँ।

38हे नानक ! प्रभु नाम में मग्न होने से मनुष्य मान-सम्मान प्राप्त कर लेता है॥ ८ ॥ १२ ॥

39गउड़ी महला १ ॥

40अहंकार में प्रवृत्त होने से मनुष्य ईश्वर को नहीं जानता, चाहे वह कोई धार्मिक वेष धारण कर ले।

41कोई विरला पुरुष ही है, जिसका मन गुरु के आश्रय द्वारा प्रभु की भक्ति करने से तृप्त हुआ है॥ १॥

42अहंत्व (मैं, मेरी) की करनी से सत्य (ईश्वर) प्राप्त नहीं होता।

43जब मनुष्य का अहंकार निवृत्त हो जाता है तो उसे परम पद प्राप्त हो जाता है। १॥ रहाउ॥

44राजा (अपनी शक्ति का) बहुत अहंकार करते हैं और इसलिए दूसरे राज्यों पर आक्रमण करते हैं।

45अहंकारवश वे बर्बाद हो जाते हैं और परिणामस्वरूप जन्म-मरण के चक्र में पड़कर पुनः (संसार में) उत्पन्न होते हैं।॥ २॥

46गुरु के शब्द का चिन्तन करने से (मनुष्य का) अहंकार निवृत्त हो जाता है।

47ऐसा व्यक्ति अपने चंचल मन पर अंकुश लगाता है और पाँच (कामादिक) विकारों का संहार करता है॥ ३॥

48जिस व्यक्ति के हृदय में सत्य नाम विद्यमान है, वह सहज घर में पहुँच जाता है।

49प्रभु पातशाह को समझकर वह परमगति प्राप्त कर लेता है॥ ४॥

50गुरु जी उसकी दुविधा दूर कर देते हैं, जिसके कर्म शुभ (सच्चे) हैं।

51वह निर्भय ईश्वर के चरणों में अपनी वृति लगाता है॥ ५ ॥

52जो (मैं, मैं) अभिमान एवं घमण्ड करता हुआ प्राण त्याग देता है, वह क्या कर्म करता है ?

53लेकिन जो पूर्ण गुरु से मिलता है, वह अपने तमाम वाद-विवाद मिटा लेता है॥ ६॥

54जो कुछ भी है, वह वास्तव में कुछ भी नहीं।

55गुरमुख ज्ञान प्राप्त करके ईश्वर की गुणस्तुति करते रहते हैं॥ ७॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं