गुरु ग्रंथ साहिब 225 · Raag Gauree · Guru Nanak Dev Ji
1ईश्वर ने द्वैतभाव के कारण मोह-माया में फँसे राक्षसों का विनाश कर दिया।
2उनकी सच्ची सेवा-भक्ति के कारण प्रभु ने गुरु के समक्ष आई पवित्र आत्माओं का कल्याण कर दिया ॥ ८॥
3अहंकार में डूबकर दुर्योधन ने अपनी प्रतिष्ठा गंवा दी।
4अहंकारवश उसने सर्वव्यापक प्रभु करतार को स्मरण न किया।
5जो ईश्वर के सेवक को दुख देता है, वह स्वयं पीड़ा में दुखी होता है॥ ६॥
6राजा जन्मेजय ने अपने गुरु के शब्द को न समझा।
7भ्रम में कुमार्गगामी होकर वह सुख किस तरह पा सकता था।
8ईश्वर को थोड़ी देर के लिए भूलकर मनुष्य बाद में पश्चाताप करता है॥ १० ॥
9मथुरा का राजा कंस, केशी एवं चांडूर के तुल्य कोई नहीं था।
10परन्तु अहंकारवश ईश्वर को समझे बिना उन्होंने अपनी प्रतिष्ठा गंवा दी।
11सृष्टिकर्ता जगदीश के अलावा कोई भी प्राणी को बचा नहीं सकता॥ ११॥
12गुरु के बिना अहंत्व मिटाया नहीं जा सकता।
13गुरु की शिक्षा द्वारा धर्म, धैर्य एवं परमेश्वर का नाम प्राप्त होते हैं।
14हे नानक ! ईश्वर की महिमा गायन करने से ही नाम प्राप्त होता है।॥ १२॥ ९॥
15गउड़ी महला १ ॥
16यद्यपि मैं चन्दन का इत्र अपनी देहि पर लगा तूं,
17अपनी देहि पर रेशम एवं रेशमी वस्त्र पहन लू तो भी
18ईश्वर के नाम बिना कहाँ सुख प्राप्त कर सकता हूँ? ॥ १॥
19मैं क्या पहनूं और कौन-सी परिधान में अपने आपको प्रकट करूँ ?
20सृष्टि के स्वामी जगदीश के बिना में कैसे सुख प्राप्त कर सकता हूँ॥ १॥ रहाउ ॥
21यदि मैं कानों में कुण्डल पहन तूं और गले में मोतियों की माला हो।
22मेरे पास चाहे लाल पलंग पोश एवं पुष्प गुलाल बिखेरा हो।
23फिर भी जगत् के रचयिता जगदीश के सिवाय मुझे कहाँ सुख प्राप्त हो सकता है॥ २॥
24मेरे पास चाहे सुन्दर नयनों वाली रूपवती नारी हो,
25वह सोलह प्रकार का हार-श्रृंगार लगाए और अपने आपको परम मनमोहिनी बना ले।
26फिर भी परमात्मा के भजन के बिना नित्य दुख ही मिलता है॥ ३॥
27अपने घर द्वार के मन्दिर में मनुष्य के पास चाहे सुखदायक पलंग हो,
28उस पर माली रात-दिन फूल बिखेरता रहे किन्तु
29फिर भी प्रभु के नाम सिमरन बिना उसका शरीर दुखी ही होगा ॥ ४॥
30यदि मेरे पास कुशल घोड़े, बढ़िया हाथी, नेजे, बाजे,
31सेना, द्वारपाल, सरकारी कर्मचारी हों, यह सारा आडम्बर हो,
32फिर भी जगत् के स्वामी जगदीश के भजन बिना ये सब आडम्बर व्यर्थ हैं॥ ५॥
33यदि मैं अपने आपको करामाती सिद्ध कहलवाऊँ एवं ऋद्धियों-सिद्धियों को अपने पास बुला लूं,
34अपने सीस के लिए मैं चाहे राजसी मुकुट एवं शाही छत्र झुला लैं,
35फिर भी जगदीश के भजन बिना मैं कहाँ सत्य प्राप्त कर सकता हूँ॥ ६॥
36यदि मैं अपने आपको सरदार, शहंशाह एवं राजा बनकर कहलवाऊँ,
37अहंकार में सरकारी कर्मियों को डांट झिड़क भी सकूं, परन्तु यह सब कुछ झूठा आडम्बर है।
38गुरु के शब्द बिना कोई भी कार्य सफल नहीं होता ॥ ७॥
39अहंकार एवं अहंत्व को मैंने गुरु के शब्द से भुला दिया है।
40गुरु की शिक्षा से मुरारी प्रभु को अपने हृदय में मैंने जान लिया है।
41नानक वन्दना करता है- हे प्रभु ! मैं तुम्हारी ही शरण में हूँ॥ ८॥ १०॥
42गउड़ी महला १ ॥
43हे भाई ! जो व्यक्ति एक ईश्वर की सेवा-भक्ति करता है, वह ईश्वर के सिवाय किसी दूसरे को नहीं जानता।
44वह कड़वे सांसारिक (कामादिक) विकारों को त्याग देता है।
45ईश्वर के प्रेम एवं सत्य द्वारा वह सत्यस्वरूप प्रभु में मिल जाता है॥ १॥
46ऐसा व्यक्ति ही राम का भक्त होता है,
47जो अपनी मलिनता को धो देता है और प्रभु की गुणस्तुति करके प्रभु में ही मिल जाता है॥ १॥ रहाउ॥
48सारी दुनिया का हृदय कंवल विपरीत है।
49दुर्बुद्धि की अग्नि संसार को जला रही है।
50वही प्राणी बच जाता है, जो गुरु के शब्द का ध्यान करता है ॥ २ ॥
51भँवरा, परवाना, हाथी, मछली एवं मृग
52अपने किए कर्मो का फल प्राप्त करते हैं और फिर मर जाते हैं।
53तृष्णा में लीन होकर वे वास्तविकता को नहीं देखते ॥ ३॥
54कामिनी (नारी) का प्रेमी भोग-विलास का ध्यान करता है।
55क्रोध सभी विकारियों को नष्ट कर देता है।
56प्रभु-नाम को विस्मृत करके मनुष्य अपनी प्रतिष्ठा एवं बुद्धि गंवा देता है॥ ४॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं