सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 224 · Raag Gauree · Guru Nanak Dev Ji

1प्राणी निर्भय प्रभु का नाम स्मरण करके पवित्र एवं निडर हो जाता है।

2प्रभु निराश्रितों को आश्रयवान बना देता है। मैं उस पर कुर्बान जाता हूँ।

3उसकी गुणस्तुति करने से मनुष्य इस संसार में पुनः जन्म नहीं लेता॥ ५॥

4जो भीतर एवं बाहर एक ईश्वर को पहचानता है

5और जो गुरुके शब्द द्वारा अपने आपको समझता है,

6प्रभु के दरबार में उस पर सत्यनाम का चिन्ह विद्यमान होता है॥ ६॥

7जो शब्द पर मरता है, उसका निवास सदा ही आत्मस्वरूप में रहता है।

8उसकी तृष्णा मिट जाती है और वह जीवन-मृत्यु के चक्र में नहीं पड़ता।

9गुरु के शब्द द्वारा उसका ह्रदय कमल प्रफुल्लित हो जाता है॥ ७ ॥

10जो कोई भी दिखाई देता है, वह आशा, निराशा,

11कामचेष्टा, क्रोध, माया की भूख का प्यासा है।

12हे नानक ! कोई विरला जगत् का त्यागी ही प्रभु को मिलता है॥ ८ ॥ ७॥

13गउड़ी महला १ ॥

14ऐसे सेवक को मिलने से सुख प्राप्त होता है एवं

15दुख दूर हो जाता है, जिसने सत्य स्वरूप ईश्वर को पा लियां है ॥ १॥

16उसके दर्शन करने से मेरी बुद्धि पूर्ण हो गई है।

17उसकी चरण-धूलि अठसठ तीर्थों का स्नान है॥ १॥ रहाउ॥

18एक ईश्वर में सुरति लगाने से मेरे नेत्र संतुष्ट हो गए हैं।

19हरि रस से मेरी जिव्हा शुद्ध हो गई है॥ २॥

20मेरी करनी सत्य है और मेरे हृदय में प्रभु की सेवा विद्यमान है।

21अलक्ष्य तथा अकल्पनीय प्रभु से मेरा मन संतुष्ट हो गया है। ३॥

22जहाँ कहीं भी मैं देखता हूँ, वहीं मैं सत्य स्वरूप ईश्वर के दर्शन करता हूँ।

23प्रभु की सूझ के बिना मिथ्या संसार विवाद करता है॥ ४ ॥

24जब गुरु उपदेश प्रदान करते हैं तो सूझ प्राप्त हो जाती है।

25कोई विरला गुरमुख ही प्रभु को पहचानता है॥ ५ ॥

26हे रखवाले प्रभु ! कृपा करके हमारी रक्षा करो।

27प्रभु की सूझ बिना प्राणी पशु एवं प्रेत वृति हो रहे हैं।॥ ६॥

28गुरु जी ने कहा है, ईश्वर बिना दूसरा कोई नहीं।

29बताइये दूसरा किस को देखें और किस की पूजा करू॥ ७॥

30संतजनों हेतु ईश्वर ने तीन लोक स्थापित किए हैं।

31जो अपने आत्म-स्वरूप को समझता है, वह वास्तविकता को समझ लेता है॥ ८ ॥

32जिसके हृदय में सत्य निवास करता है, ईश्वर का प्रेम उसके हृदय में ही रहता है।

33नानक प्रार्थना करता है - मैं भी उसका दास हूँ॥ ६॥ ८ ॥

34गउड़ी महला १ ॥

35ब्रह्मा ने अभिमान किया (कि मैं महान हूँ. फिर कमलनाभि से कैसे पैदा हो सकता हूँ) उसने भगवान की महिमा को नहीं समझा।

36जब उसका घमंड तोड़ने के लिए उस पर वेदों के चुराए जाने की विपदा पड़ी तो उसने पश्चाताप किया।

37जब उसने ईश्वर को स्मरण किया तो उसे आस्था हुई कि ईश्वर ही महान है। १॥

38दुनिया में अहंकार का विकार बहुत बुरा है।

39जिसे गुरु जी मिल जाते हैं, वह उसका अहंकार दूर कर देते हैं॥ १॥ रहाउ॥

40राजा बलि को धन-दौलत का बहुत अभिमान था।

41उसने बहुत सारे यज्ञ किए, अहंकारवश बड़ा घमंडी हो गया।

42अपने गुरु शुक्राचार्य से पूछे बिना ही उसने विष्णु अवतार भगवान वामन को दान देना स्वीकार कर लिया था। जिसके कारण उसको पाताल में जाना पड़ा ॥ २॥

43राजा हरिश्चन्द्र ने बहुत दान किया और बड़ा यश प्राप्त किया।

44लेकिन गुरु के बिना उसको ईश्वर के अन्त का पता न लगा।

45प्रभु स्वयं ही गुमराह करता है और स्वयं ही ज्ञान प्रदान करता है॥ ३॥

46दुर्बुद्धि हिरण्यकशिपु बड़ा अत्याचारी शासक था।

47नारायण स्वयं ही अहंकारियों का अहंकार नाश करने वाला है।

48कृपा के घर नारायण ने नृसिंह अवतार धारण करके अपने भक्त प्रहलाद का उद्धार किया था॥ ४॥

49मूर्ख एवं चेतना रहित रावण ने प्रभु को विस्मृत कर दिया।

50उसकी सोने की लंका लुट गई और उसका सिर भी कट गया।

51अहंकारवश गुरु की शरण लिए बिना रावण का विनाश हुआ था॥ ५ ॥

52हजार भुजाओं वाले सहस्रबाहु का परशुराम ने वध किया, मधु तथा कैटभ का विष्णु ने वध किया, महिषासुर का माता दुर्गा के हाथों वध हुआ,

53हिरण्यकशिपु का नृसिंह भगवान ने नाखुनों से वध किया।

54ये समस्त दानव-राक्षस प्रभु की भक्ति से विहीन होने के कारण मारे गए॥ ६ ॥

55जरासंध तथा कालयवन प्रभु द्वारा नष्ट किए गए।

56रक्तबीज (माता दुर्गा के हाथों) मारा गया तथा कालनेमि भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र से मारा गया

57ईश्वर ने राक्षसों का वध करके ऋषि-मुनियों की रक्षा की।॥ ७ ॥

58ईश्वर स्वयं ही गुरु रूप होकर अपने नाम की आराधना करता है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं