सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 222 · Raag Gauree · Guru Nanak Dev Ji

1उस सत्यनाम को हृदय में बसाने से उनका तन-मन पवित्र हो जाता है।

2हे नानक ! तू नित्य परमेश्वर का भजन करता रह॥ ८॥ २॥

3गउड़ी गुआरेरी महला १ ॥

4मनुष्य का मन कामादिक विकारों के वश में होने के कारण मरता नहीं। इसलिए जीवन का मनोरथ सम्पूर्ण नहीं होता।

5मन दुष्कर्मों, मंदबुद्धि एवं द्वैतभाव के वश में है।

6गुरु से ज्ञान प्राप्त करके मन तृप्त हो जाता है और ईश्वर से एकरूप हो जाता है।॥ १॥

7निर्गुण राम गुणों के वश में है।

8जो व्यक्ति अपने अहंकार को मिटा देता है, वह प्रभु का चिन्तन करता है॥ १॥ रहाउ ॥

9भटका हुआ मन अधिकतर विकारों का ध्यान करता है।

10जब तक मन कुमार्ग चलता रहता है, तब तक पापों का बोझ उसके सिर पर पड़ता है।

11जब मन की संतुष्टि हो जाती है, तो वह केवल एक ईश्वर को अनुभव करता है॥ २॥

12भटका हुआ मन पापों के गृह में प्रवेश करता है।

13कामग्रस्त मन उचित स्थान पर नहीं रहता।

14हे नश्वर प्राणी ! प्रेमपूर्वक अपनी जिव्हा से प्रभु के नाम का भजन कर ॥ ३॥

15हाथी, घोड़े, सोना, पुत्र एवं पत्नी

16प्राप्त करने की अधिकतर चिन्ता में प्राणी (जीवन) खेल हार जाता है और कूच कर जाता है।

17शतरंज की खेल में उसका मोहरा चलता नहीं ॥ ४॥

18जैसे-जैसे मनुष्य धन संग्रह करता है। उससे विकार उत्पन्न हो जाता है

19और हर्ष एवं शोक उसके द्वार पर खड़े रहते हैं।

20ह्रदय में परमात्मा का जाप करने से सहज ही सुख प्राप्त हो जाता है।॥ ५॥

21जब प्रभु दया के घर में आता है, तब वह मनुष्य को गुरु से मिलाकर अपने साथ मिला लेता है।

22ऐसा मनुष्य गुरु की शरण में रहकर गुणों का संग्रह करता है और गुरु के उपदेश द्वारा अपने अवगुणों को जला देता है

23और गुरु के समक्ष होकर नाम-धन प्राप्त कर लेता है॥ ६ ॥

24प्रभु के नाम बिना समस्त दुख निवास करते हैं।

25मूर्ख स्वेच्छाचारी व्यक्ति के मन का निवास माया में ही होता है।

26पूर्व जन्म के शुभ कर्मों के कारण भाग्य की बदौलत मनुष्य गुरु से ज्ञान प्राप्त कर लेता है॥ ७ ॥

27चंचल मन अस्थिर पदार्थों के पीछे बार-बार भागता है।

28सत्यस्वरूप एवं पवित्र प्रभु मलिनता को पसन्द नहीं करता।

29हे नानक ! गुरमुख ईश्वर की महिमा गायन करता रहता है॥ ८ ॥ ३॥

30गउड़ी गुआरेरी महला १ ॥

31अहंकार करने से सुख प्राप्त नहीं होता।

32मन की बुद्धि झूठी है। लेकिन वह प्रभु ही सत्य है।

33जो व्यक्ति द्वैत भाव से प्रेम करते हैं, वह सभी बर्बाद हो जाते हैं।

34विधाता द्वारा जो प्राणी के भाग्य में लिखा होता है, उसी के अनुसार वह कर्म करता है। १॥

35मैंने संसार को जुए का खेल खेलते देखा है

36जो प्रभु के नाम को विस्मृत करके सर्वसुखों की याचना करता रहता है॥ १॥ रहाउ॥

37यदि अदृश्य प्रभु देख लिया जाए केवल तभी वह वर्णन किया जा सकता है।

38बिना देखे उसका वर्णन निरर्थक है।

39गुरु के समक्ष रहने वाले को प्रभु सहज ही दिखाई देता है।

40हे प्राणी ! अपनी वृति एक ईश्वर की सेवा एवं प्रेम के साथ लगा॥ २॥

41सुख माँगने से मनुष्य का दुख बढ़ता है।

42चूंकी इन्सान अपने गले में विकारों की माला पहन लेता है।

43झूठे मोह में ग्रस्त हुए इन्सान को एक परमेश्वर के नाम बिना मुक्ति नहीं मिलती।

44परमात्मा खुद ही सृष्टि-रचना करके इस खेल को देखता रहता है। ३॥

45ईश्वर का नाम तृष्णाग्नि को बुझा देता है।

46तब द्वैत-भाव एवं सन्देह सहज ही मिट जाते हैं।

47गुरु के उपदेश से नाम हृदय में वास करता है।

48सच्ची वाणी द्वारा मनुष्य प्रभु का यशोगान करता है॥ ४॥

49सत्यस्वरूप प्रभु उसके मन में निवास करता है, जो गुरु के समक्ष रहकर उसके लिए प्रेम धारण करता है।

50नाम के बिना मनुष्य अपने आत्मस्वरूप को प्राप्त नहीं करता।

51प्रियतम पातशाह प्रेम परायण हुआ है।

52यदि प्रभु दया करे तो मनुष्य उसके नाम को समझ लेता है॥ ५॥

53माया का मोह तमाम बन्धन ही है।

54स्वेच्छाचारी जीव मलिन, कुत्सित एवं भयानक है।

55सतिगुरु की सेवा से विपदा मिट जाती है।

56प्रभु के नाम अमृत से मनुष्य सदैव सुख में रहता है॥ ६॥

57गुरमुख व्यक्ति प्रभु को समझ लेता है, वह अपनी वृति एक ईश्वर में ही लगाता है।

58वह सदैव ही अपने आत्म-स्वरूप में रहता है और सत्य में ही समाया रहता है।

59उसका आवागमन (जन्म-मरण का चक्र) मिट जाता है।

60किन्तु यह ज्ञान उसे पूर्ण गुरु से ही मिलता है॥ ७॥

61जिस भगवान की महिमा का कथन नहीं किया जासकता, मैं तो उसकी ही महिमा करता हूँ।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं