सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 220 · Raag Gauree · Guru Tegh Bahaadur Ji

1मनुष्य वेद-पुराण एवं संतों-महांपुरुषों के उपदेश को सुनता रहता है, परन्तु फिर भी वह एक क्षण भर के लिए भी प्रभु का गुणानुवाद नहीं करता॥ १॥ रहाउ॥

2दुर्लभ मानव देहि प्राप्त करके वह जीवन को व्यर्थ ही गंवा रहा है।

3यह दुनिया मोह-माया का संकट से भरा हुआ वन है तो भी मनुष्य उससे ही रुचि उत्पन्न करता है॥ १॥

4प्रभु हृदय के भीतर व बाहर सदैव ही प्राणी के साथ रहता है। परन्तु प्राणी प्रभु में वृति नहीं लगाता।

5हे नानक ! उस व्यक्ति को ही मुक्ति मिली समझो, जिसके हृदय में राम वास कर रहा है॥ २ ॥ ६ ॥

6गउड़ी महला ९ ॥

7हे संतजनो ! राम की शरण में आने से ही सुख उपलब्ध होता है।

8वेदों एवं पुराणों के अध्ययन का लाभ यही है कि प्राणी भगवान के नाम का सिमरन करता रहे॥ १॥ रहाउ॥

9लालच, मोह, माया,ममता, विषयो की सेवा एवं फिर हर्ष एवं शोक जिसे स्पर्श नहीं करते, वह पुरुष प्रभु का स्वरुप है॥ १॥

10जिस व्यक्ति को स्वर्ग-नरक, अमृत एवं विष एक जैसे प्रतीत होते हैं और जिस इन्सान को सोना एवं तांबा ये सभी एक समान प्रतीत होते हैं।

11जिसके हृदय में प्रशंसा व निन्दा एक समान हैं, जिसके हृदय में लोभ तथा मोह कोई प्रभावित नहीं करते॥ २॥

12जिसे कोई सुख अथवा दुख बन्धन में बांध नहीं सकता। आप उसको ज्ञानी समझो।

13हे नानक ! उस प्राणी को मोक्ष मिला समझो, जो प्राणी इस जीवन-आचरण वाला है॥ ३ ॥ ७ ॥

14गउड़ी महला ९ ॥

15हे मेरे मन ! तू क्यों बावला हो रहा है?

16तू क्यों नहीं समझता कि तेरी जीवन-अवधि दिन-रात कम होती जा रही है। लोभ के साथ तू तुच्छ हो गया है॥ १॥ रहाउ॥

17(हे मन !) वह तन एवं घर की सुन्दर नारी जिन्हें तुम अपना समझते हो,

18इनमें तेरा कुछ नहीं , देख और ध्यानपूर्वक सोच-विचार कर ॥ १॥

19तुम ने अपना अनमोल मनुष्य जीवन गंवा लिया है और सृष्टि के स्वामी गोबिन्द की गति को नहीं जाना।

20एक क्षण भर के लिए भी तू प्रभु के चरणों में नहीं समाया। तेरी अवस्था व्यर्थ ही बीत गई है॥ २॥

21हे नानक ! वही व्यक्ति सुखी है, जो राम नाम का यश गायन करता रहता है।

22दूसरे तमाम लोग माया ने मुग्ध किए हुए हैं और वह निर्भय-पद को प्राप्त नहीं होते॥ ३॥ ८ ॥

23गउड़ी महला ९ ॥

24हे चेतनाहीन प्राणी ! तू पापों से भय कर,

25उस दीनदयाल एवं समस्त भय नाश करने वाले प्रभु की शरण ले॥ १॥ रहाउ॥

26अपने ह्रदय में उस प्रभु के नाम को बसा कर रख, जिसकी महिमा वेद एवं पुराण भी गायन करते हैं।

27ईश्वर का नाम इस संसार में पवित्र-पावन है। इसका भजन सिमरन करने से तू अपने तमाम पाप निवृत कर ले॥ १॥

28हे प्राणी ! मानव देहि दोबारा तुझे प्राप्त नहीं होनी। इसलिए अपनी मुक्ति हेतु कुछ उपाय कर ले।

29नानक कहते हैं, हे जीव ! करुणानिधि परमेश्वर का भजन गायन कर के भवसागर से पार हो जा॥ २॥ ६॥ २५१॥

30रागु गउड़ी असटपदीआ महला १ गउड़ी गुआरेरी

31ੴ सतिनामु करता पुरखु गुर प्रसादि ॥

32नवनिधि एवं (अठारह) सिद्धियाँ पवित्र नाम के चिंतन में हैं।

33माया के विष का नाश करके मनुष्य परमात्मा को सर्वव्यापक देखता है।

34पवित्र प्रभु में वास करने से मैंने तीनों गुणों से मुक्ति प्राप्त कर ली है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं