सिख धर्म
वापस

गुरु ग्रंथ साहिब 210 · Raag Gauree

1रागु गउड़ी पूरबी महला ५

2ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।

3हमें अपने मन से प्रभु-परमेश्वर को कभी भी विस्मृत नहीं करना चाहिए।

4चूंकि वह ईश्वर ही लोक एवं परलोक में प्राणियों का सुखदाता है और तमाम शरीरों का पालन-पोषण करता है॥ १॥ रहाउ॥

5यदि मनुष्य की रसना भगवान के नाम का जाप करे तो वह एक क्षण में ही महाकष्ट निवृत कर देता है।

6प्रभु की शरण में शीतलता, शांति एवं सुख विद्यमान हैं और वह जलती अग्नि बुझा देता है॥ १॥

7प्रभु मनुष्य को गर्भ के नरककुण्ड से बचाता है और उसको भवसागर से पार कर देता है।

8प्रभु के सुन्दर चरणों की मन में आराधना करने से वह मृत्यु का भय दूर कर देता है॥ २ ॥

9पारब्रह्म परमेश्वर सर्वव्यापक है, वह सर्वोपरि, अगम्य एवं अनन्त है।

10सुखों के सागर प्रभु की महिमा-स्तुति एवं ध्यान करने से प्राणी अपना जन्म व्यर्थ नहीं गंवा कर जाता॥ ३॥

11हे निर्गुण के उदारचित दाता ! मेरा मन भोग-विलास, क्रोध, लालच एवं सांसारिक मोह में लीन है।

12हे प्रभु ! कृपा करके अपने नाम का दान दीजिए। नानक तो सदैव ही तुझ पर कुर्बान जाता है ॥ ४॥ १॥ १३८ ॥

13रागु गउड़ी चेती महला ५

14ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।

15भगवान की भक्ति के बिना कोई सुख उपलब्ध नहीं होता।

16साधसंगत में रहकर एक क्षण भर के लिए भी प्रभु का चिन्तन करके मनुष्य जीवन का यह अनमोल रत्न जीत ले॥ १॥ रहाउ॥

17हे प्राणी ! पुत्र, सम्पति, पत्नी का प्रेम,और हर्षोल्लास भरे मनोरंजन एवं भोग को त्याग बहुत सारे ऐसे लोग हैं जो चले गए हैं।॥ १॥

18अपने कुशल घोड़े, हाथी एवं शासन के आनन्द को त्याग कर

19मूर्ख मनुष्य नग्न ही अन्त में दुनिया से चला जाता है॥ २॥

20जिस शरीर पर इत्र तथा चन्दन लगाकर मनुष्य अभिमान करता था,

21वह शरीर (अन्त में) पार्थिव (मिट्टी) हो जाता है॥ ३॥

22हे नानक ! दुनिया के मोह में मुग्ध हुआ मनुष्य ईश्वर को दूर समझता है।

23परन्तु ईश्वर सदा ही प्राणी के आसपास रहता है ॥ ४ ॥ १ ॥ १३९ ॥

24गउड़ी महला ५ ॥

25हे प्राणी ! तू ईश्वर-नाम के आधार से संसार सागर से पार हो जाएगा।

26संशय की लहरों से भरे हुए जगत् सागर से पार होने के लिए गुरु जी जहाज हैं॥ १॥ रहाउ ॥

27कलियुग में गहरा अंधकार है।

28गुरु के दिए हुए ज्ञान का दीपक उजाला कर देता है॥ १॥

29मोह-माया का विष अधिक मात्रा में फैला हुआ है।

30ईश्वर की निरन्तर आराधना करने से महापुरुष बच जाते हैं।॥ २॥

31माया में मुग्ध हुआ मनुष्य (इस विष की मार से) सोया हुआ है।

32लेकिन गुरु को मिलने से दुविधा एवं भय दूर हो जाते हैं॥३ ॥

33है नानक ! जिस व्यक्ति ने एक ईश्वर का ध्यान किया है।

34उत्त व्यक्ति को ही भगवान कण-कण में मौजूद दिखाई दिया है॥ ४॥ २॥ १४०॥

35गउड़ी महला ५ ॥

36हे ईश्वर ! एक तू ही हमारा सहारा है।

37गुरु की शरण में मैं तेरी ही सेवा करता रहता हूँ॥ १॥ रहाउ॥

38हे प्रभु ! अनेक युक्तियों द्वारा मैं तुझे प्राप्त न कर सका।

39गुरु ने कृपा करके मुझे तेरी सेवा-भक्ति में लगा दिया है।॥ १ ॥

40मैंने पाँच दुष्टों (कामादिय विकारों) का नाश कर दिया है।

41गुरु की कृपा से मैंने बुराई की सेना को पराजित कर दिया है॥ २॥

42मुझे एक नाम प्रभु के दान के तौर पर प्राप्त हुआ है।

43अब मेरा निवास सहज सुख एवं आनंद में है॥ ३॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं