गुरु ग्रंथ साहिब 20 · Siree Raag · Guru Nanak Dev Ji
1जिस सत्य स्वरूप के भय में पांचों भौतिक तत्व (सम्पूर्ण मानव शरीर) अनुरक्त हैं उस सत्य स्वरूप परमात्मा की परम ज्योति मन में निवास करती है।
2सतिगुरु जी कथन करते हैं कि उस मानव जीव को समस्त अवगुण विस्मृत हो गए हैं और उसकी प्रतिष्ठा की रक्षा स्वयं गुरु करते हैं। ॥४॥१५॥
3श्रीरागु महला १ ॥
4गुरु नानक देव जी कथन करते हैं गुरु-उपदेश का मनन करने से ही सत्य नाम रूपी नौका में सवार होकर जीव भवसागर को पार कर सकता है।
5लेकिन अनेक जीव अभिमान करते हुए जन्म ले रहे हैं और मृत्यु को प्राप्त कर रहे हैं।
6हठी इन्सान मन की बुद्धि के कारण संसार-सागर के विकारों में डूबा रहता है, लेकिन गुरु के बताए सत्य मार्ग पर चल कर इस संसार सागर को पार किया जा सकता है॥ १॥
7गुरु के आश्रय बिना कैसे यह भवसागर पार किया जा सकता है और कैसे आत्मिक-आनंद प्राप्त किया जा सकता है।
8इसलिए उस परमात्मा में ऐसा निश्चय रख कर विनती करो कि जैसे आप को अच्छा लगता है, वैसे ही मेरी रक्षा करो, आप के अतिरिक्त मेरा अन्य कोई आश्रय नहीं है।॥ १॥ रहाउ॥
9सृष्टि के आश्चर्यजनक दृश्य का वर्णन करते हुए गुरु जी कथन करते हैं कि हे मानव ! जब संसार के आगे (श्मशान भूमि में) मैं देखता हूँ तो दावानल प्रज्वलित है, और पीछे (संसार में) देखता हूँ तो अंकुर स्फुटित हो रहे हैं अर्थात् नए जीव पैदा हो रहे हैं।
10जिस सृष्टिकर्ता के आदेश से यह सांसारिक जीव पैदा हो रहे हैं और जिस संहारक शक्ति की आज्ञा से नष्ट हो रहे हैं, वह परिपूर्ण सत्य परमेश्वर कण-कण में व्याप्त हैं।
11वह स्वयं गुरु से मिलाप करवाता है और गुरु से मिलकर जीव सत्य स्वरूप के समक्ष होता है॥ २॥
12हे प्रभु ! कृपा करो, मैं श्वास-श्वास आप को स्मरण करूँ, कभी भी न भुलाऊं।
13हे साहिब ! जब-जब तुम मेरे मन में वास करोगे, तब-तब मैं आत्मिक आनंद देने वाला नाम रूपी अमृत पीता रहूँगा।
14हे परमात्मा ! मेरा यह तन और मन तुम्हारा ही दिया हुआ है, तुम मेरे स्वामी हो, इसलिए कृपा करके मेरे अंतर्मन से अहंकार दूर करके मुझे अपने में लिवलीन कर लो॥ ३॥
15जिस परमात्मा ने इस सृष्टि का निर्माण किया है, उसने इसे तीन लोकों का आकार दिया है।
16इस रहस्यमयी ज्ञान को गुरमुख जीव ही जानते है, मायाधारी मनमुख विमूढ़ जीव अंधकार में रहते हैं।
17श्रेष्ठ गुरु की शिक्षा प्राप्त जीव ही सर्वव्यापक ज्योति को निरंतर जान सकता है II४॥
18जिन गुरमुख जीवों ने उस परमात्मा को जान लिया है, वे धन्य हैं।
19जो परमात्मा के सत्य नाम में लिप्त होकर उसी सत्य में अभेद हो गए हैं।
20श्री गुरु नानक जी कथन करते हैं कि वे नाम द्वारा संतुष्ट हो गए हैं और उन्होंने अपने प्राण व शरीर उस परमेश्वर को ही अर्पित कर दिए हैं।॥ ५॥ १६॥
21श्रीरागु महला १ ॥
22हे प्रिय मित्र मन ! सुनो, यह समय (मानव जन्म) परमात्मा से मिलने का है।
23जब तक यह यौवनावस्था के श्वास चल रहे हैं, तब तक ही यह शरीर नाम सुमिरन करने के योग्य है। अर्थात्-वृद्धावस्था में निर्बलता सुमिरन नहीं करने देती।
24शुभ गुणों के बिना यह तन किसी काम का नहीं है, अंत में इसने नष्ट होकर राख का ढेर बन जाना है॥ १॥
25हे मेरे प्रिय मन ! तुम नाम-स्मरण का लाम उठा कर सत्य स्वरूप के घर जाओ।
26गुरु के उन्मुख होकर नाम-स्मरण कर, इससे अहंकार की अग्नि बुझ जाएगी॥ १॥ रहाउ॥
27अनेकानेक कथा-कहानियाँ सुन-सुन कर बौद्धिक उधेड़-बुन में लगे रहते हैं, और अनेकानेक लिख-लिख कर, पढ़-पढ़ कर तथा सोच-विचार कर पदों का संग्रह करते हैं वह स्वयं एक बोझ के समान हैं।
28उनकी तृष्णा में दिन-रात वृद्धि होती रहती है और अहंकार के रोग में ग्रस्त होकर कई तरह के विकार उत्पन्न हो जाते हैं।
29वह प्रभु निश्चित तथा अपरिमेय है, उसके बारे में ज्ञान गुरु की शिक्षा द्वारा ही होता है॥ २॥
30हम लाखों तरह की चतुराई कर लें और लाखों ही लोगों के साथ प्रीत कर लें।
31(तो भी) संतों की संगति किए बिना तृप्ति नहीं होती तथा नाम सुमिरन के बिना सांसारिक दुख एवं संताप बने रहते हैं।
32हे जीव ! गुरु उपदेश द्वारा स्वयं को पहचान कर हरि सिमरन करके इन विकारों से छुटकारा पाया जा सकता है॥ ३॥
33जिसने अपना तन-मन गुरु के पास बेच दिया है, अंतः करण और सिर भी अर्पित कर दिया है।
34उसने जिस प्रभु को तीनों लोकों में ढूंढा था, उसे गुरु उपदेश द्वारा खोज कर प्रसंनता प्राप्त की है।
35गुरु नानक देव जी कथन करते हैं कि सतिगुरु ने अपने साथ मिला कर उस प्रभु से मिलाप करवा दिया है॥ ४॥ १७॥
36श्रीरागु महला १ ॥
37गुरु के उन्मुख जीवों को न मरने की चिन्ता होती है और न ही जीने की आशा।
38वह निश्चय करके कहते हैं कि हे प्रभु ! तुम समस्त प्राणियों की प्रतिपालना करने वाले हो, प्रत्येक के श्वास-ग्रास का लेखा तुम्हारे पास है।
39गुरमुखों के हृदय मैं तुम वास करते हो, जैसे आपको अच्छा लगता है, वैसे तुम निर्णय लेते हो॥ १॥
40हे जीव ! अकाल पुरुष का चिंतन करते हुए मन में निश्चय धारण करो।
41जब गुरु द्वारा गुरमुख को ज्ञान प्राप्त हुआ तो अंतर्मन में लगी तृष्णा रूपी आग की जलन समाप्त हो गई॥ १॥ रहाउ॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं