गुरु ग्रंथ साहिब 1 · Jap · Guru Nanak Dev Ji
1ੴ- इस शब्द का शुद्ध उच्चारण है - 'एक ओंकार'। इसके उच्चारण में इसके तीन अंश किए जाते हैं। इन तीनों के भावार्थ भी अलग-अलग ही हैं। १ - एक (अद्वितीय)। ऑ- वही। ओंकार (~) निरंकार ; अर्थात्-ब्रह्म, करतार, ईश्वर, परमात्मा, भगवान, वाहिगुरु । १ ऑ- निरंकार वही एक है। सति नामु - उसका नाम सत्य है। करता - वह सृष्टि व उसके जीवों की रचना करने वाला है। पुरखु - वह यह सब कुछ करने में परिपूर्ण (शक्तिवान) है। निरभउ - उसमें किसी तरह का भय व्याप्त नहीं। अर्थात् - अन्य देव-दैत्यों तथा सांसारिक जीवों की भाँति उसमें द्वेष अथवा जन्म-मरण का भय नहीं है ; वह इन सबसे परे हैं। निरवैरु- वह बैर (द्वेष/दुश्मनी) से रहित है। अकाल- वह काल (मृत्यु) से परे है; अर्थात्-वह अविनाशी है। मूरति - वह अविनाशी होने के कारण उसका अस्तित्व सदैव रहता है। अजूनी - वह कोई योनि धारण नहीं करता, क्योंकि वह आवागमन के चक्कर से रहित है। सैभं - वह स्वयं से प्रकाशमान हुआ है। गुर - अंधकार (अज्ञान) में प्रकाश (ज्ञान) करने वाला (गुरु)। प्रसादि- कृपा की बख्शिश। अर्थात्-गुरु की कृपा से यह सब उपलब्ध हो सकता है।
2जाप करो। (इसे गुरु की वाणी का शीर्षक भी माना गया है।)
3निरंकार (अकाल पुरुष) सृष्टि की रचना से पहले सत्य था, युगों के प्रारम्भ में भी सत्य (स्वरूप) था।
4अब वर्तमान में भी उसी का अस्तित्व है, श्री गुरु नानक देव जी का कथन है भविष्य में भी उसी सत्यस्वरूप निरंकार का अस्तित्व होगा II १ II
5यदि कोई लाख बार शौच (स्नानादि) करता रहे तो भी इस शरीर के बाहरी स्नान से मन की पवित्रता नहीं हो सकती। मन की पवित्रता के बिना परमेश्वर (वाहिगुरु) के प्रति विचार भी नहीं किया जा सकता।
6यदि कोई एकाग्रचित्त समाधि लगाकर मुँह से चुप्पी धारण कर ले तो भी मन की शांति (चुप) प्राप्त नहीं हो सकती; जब तक कि मन से झूठे विकार नहीं निकल जाते।
7बेशक कोई जगत् की समस्त पुरियों के पदार्थों को ग्रहण कर ले तो भी पेट से भूखे रह कर (व्रत आदि करके) इस मन की तृष्णा रूपी भूख को नहीं मिटा सकता।
8चाहे किसी के पास हज़ारों-लाखों चतुराई भरे विचार हों लेकिन ये सब अहंयुक्त होने के कारण परमेश्वर तक पहुँचने में कभी सहायक नहीं होते।
9अब प्रश्न पैदा होता है कि फिर परमात्मा के समक्ष सत्य का प्रकाश पुंज कैसे बना जा सकता है, हमारे और निरंकार के बीच मिथ्या की जो दीवार है वह कैसे टूट सकती है ?
10सत्य रूप होने का मार्ग बताते हुए श्री गुरु नानक देव जी कथन करते हैं - यह सृष्टि के प्रारंभ से ही लिखा चला आ रहा है कि ईश्वर के आदेश अधीन चलने से ही सांसारिक प्राणी यह सब कर सकता है II १ II
11(सृष्टि की रचना में) समस्त शरीर (निरंकार के) आदेश द्वारा ही रचे गए हैं, किन्तु उसके आदेश को मुँह से शब्द निकाल कर ब्यान नहीं किया जा सकता।
12परमेश्वर के आदेश से (इस धरा पर) अनेकानेक योनियों में जीवों का सृजन होता है, उसी के आदेश से ही मान-सम्मान (अथवा ऊँच - नीच का पद) प्राप्त होता है।
13परमेश्वर (वाहिगुरु) के आदेश से ही जीव श्रेष्ठ अथवा निम्न जीवन प्राप्त करता है, उसके द्वारा ही लिखे गए आदेश से जीव सुख और दुख की अनुभूति करता है।
14परमात्मा के आदेश से ही कई जीवों को कृपा मिलती है, कई उसके आदेश से आवागमन के चक्र में फँसे रहते हैं।
15उस सर्वोच्च शक्ति परमेश्वर के अधीन ही सब-कुछ रहता है, उससे बाहर संसार का कोई कार्य नहीं है।
16हे नानक ! यदि जीव उस अकाल पुरुष के आदेश को प्रसन्नचित्त होकर जान ले तो कोई भी आहंकारमयी 'मैं' के वश में नहीं रहेगा। यही अहंतत्व सांसारिक वैभव में लिप्त प्राणी को निरंकार के निकट नहीं होने देता॥ २ II
17(परमेश्वर की कृपा से ही) जिस किसी के पास आत्मिक शक्ति है, वही उस (सर्वशक्तिमान) की ताकत का यश गायन कर सकता है।
18कोई उसके द्वारा प्रदत बख्शिशों को (उसकी) कृपादृष्टि मानकर ही उसकी कीर्ति का गुणगान कर रहा है।
19कोई जीव उसके अकथनीय गुणों व महिमा को गा रहा है।
20कोई उसके विषम विचारों (ज्ञान) का गान विद्या द्वारा कर रहा है।
21कोई उसका गुणगान रचयिता व संहारक ईश्वर का रूप जानकर करता है।
22कोई उसका बखान इस प्रकार करता है कि वह परम सत्ता जीवन देकर फिर वापिस ले लेती है।
23कोई जीव उस निरंकार को स्वयं से दूर जानकर उसका यश गाता है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं