सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 19 · Siree Raag · Guru Nanak Dev Ji

1जैसे पति से विमुख हुई स्त्री को उस के घर में समीपता प्राप्त नहीं होती, वैसे ही निरंकार की विमुखता के कारण अभागिन स्त्री की भाँति परलोक में भी झूठ में लिप्त जीव को अपमानित होना पड़ता है।॥१॥ रहाउ ॥

2निरंकार स्वयं समझदार,सत्य व बड़ा किसान है जो जीवों के कर्मों को नहीं भूलता।

3पहले तो वह अंत:करण रूपी बुद्धि को शोध कर फिर उसमें सत्य नाम रूपी बीज को बोता है।

4उस नाम रूपी एक बीज से नौ निधियों की उत्पत्ति होती है, फिर जीव के मस्तिष्क पर प्रभु की कृपा का चिन्ह अंकित होता है॥२॥

5किन्तु जो मनमुख जीव वेद-शास्त्रों आदि से गुरु की महिमा जानकर भी अनभिज्ञ हेता है, अर्थात् गुरु-उपदेश को ग्रहण नहीं करता उसके कर्म उत्तम कैसे हो सकते हैं।

6अज्ञानी पुरुषों ने अज्ञान के अंधेरे कारण ही वाहिगुरु के नाम को विस्मृत कर दिया है।

7फिर उसका इस संसार से आवागमन समाप्त नहीं होता और वह पुनः-पुनः जन्म-मरण के चक्र में फँस कर (मुक्ति प्राप्ति हेतु) कमजोर होता रहता है अर्थात्-परमात्मा से विमुख होकर कर्म करने वाला जीव इहलोक व परलोक में अपमानित होकर दुखों को भोगता है॥ ३॥

8जैसे कोई स्त्री चंदन केसर को मोल मंगवा लेती है और सिंदूर से माँग भर लेती है।

9इत्र,कपूर व चंदन आदि से कपड़ों को अति सुगंधित कर ले।

10इतना सब कुछ कर लेने पर भी यदि स्त्री अपने पति को प्रिय न लगी तो श्रृंगार के किए गए वे सभी आडम्बर मिथ्या हैं, व्यर्थ हैं। अर्थात् जीवात्मा बेशक जप, तप, यज्ञ, उपासना व संन्यासादि के भेष धारण कर ले किंतु जब तक निरंकार से वह विमुख है ये सब निष्फल हैं॥ ४॥

11मनमुख जीव के समस्त रसों का भोगना व्यर्थ है और जप-तपादि का श्रृंगार करना निरर्थक है।

12क्योंकि जब तक गुरु-उपदेश को ग्रहण नहीं करता, तब तक वह गुरु के सम्मुख सत्संगति में शोभायमान नहीं होगा।

13सतिगुरु जी कहते हैं कि उस सौभाग्यवती रूप गुरमुख का जीवन कृतार्थ है जिसका पति-परमात्मा के साथ प्रेम है॥ ५॥ १३ ॥

14श्रीरागु महला १ ॥

15जब पुर्यष्टक सहित चेतन सत्ता शरीर में निकल जाती है तब रिक्त देह भयानक हो जाती है।

16चेतन सत्ता रूपी अग्नि जो पहले प्रज्वलित हो रही थी, वह जब बुझ गई तो शरीर में से प्राण रूपी धुआं नहीं निकला।

17पिता-पुत्रादि पांचों सम्बन्धी दुख में रुदन कर रहे हैं, अर्थात् पांचों ज्ञानेन्द्रियाँ वियोग में विलख रही हैं, क्योंकि यह मानव जन्म द्वैत-भाव में ही नाश हो गया ॥ १॥

18हे मूढ़ जीव ! शुभ गुणों को सम्भालते हुए वाहिगुरु नाम का सिमरन करो।

19जो देहाभिमान स्त्री-पुत्रादि का ममत्व तथा माया का मोह है, इस के कारण सम्पूर्ण सृष्टि ठगी हुई है ॥१॥ रहाउ ॥

20जिन्होंने अन्य सांसारिक विकारों में संलग्न होकर वाहिगुरु नाम को भुला दिया है।

21उनके अंतःकरण में तृष्णाग्नि जल रही है और वे द्वैत-भाव में लग कर जल मरे हैं

22जिनकी गुरु ने रक्षा की, वे बच निकले तथा अन्य सभी को दुनियावी कार्यो रूपी ठगों ने ठग लिया है ॥२॥

23अब तो स्त्रियों में जो प्रीत लगी थी वह नष्ट हो गई, सगे-सम्बन्धियों से जो स्नेह था वह भी समाप्त हो गया तथा शत्रु-भाव भी खत्म हो गया है।

24सांसारिक क्रिया-कलापों से थक गया, अहंत्व, ममत्व व क्रोध नष्ट हो गए।

25अकाल पुरुष की कृपा द्वारा गुरु उपदेश की प्राप्ति होती है और (उस उपदेश द्वारा ही) चित्तवृतियों का दमन करके निरंकार के सत्य नाम को प्राप्त किया जा सकता है। ॥३॥

26हे मानव ! गुरु-उपदेश द्वारा अंतर्मन से नाम सिमरन रूपी सत्कर्म करके सत्य स्वरूप निरंकार की प्राप्ति सम्भव है।

27फिर तो वह मानव न जन्म लेता है और न मृत्यु को प्राप्त होता है तथा न आता है व न जाता है, अर्थात् वह सांसारिक बंधन व आवागमन के चक्र से मुक्त हो जाता है।

28सतिगुरु जी कथन करते हैं केि अकाल पुरुष के द्वार पर वह मुखिया होता है और आगे परलोक में भी उसको प्रतिष्ठा प्राप्त होती है ॥४॥१४॥

29श्रीरागु महल १ ॥

30हे मानव जीव ! यह जो शरीर प्राप्त हुआ था वह चिन्ता में जल कर राख हो गया और माया में लिप्त मन (मण्डूर) लोहे की जंग के समान नेिरर्थक हो गया है।

31जो पाप कर्म किए गए वे उलट कर उन पर ही लागू हो जाते हैं और झूठ उनके समक्ष तुरही बजाता है।

32गुरु-उपदेश के बिना जीव भटकता रहता है तथा द्वैत-भाव ने पूर्ण समूह को नरकों में धकेल दिया है ॥१॥

33हे मन ! तू गुरु-उपदेश में चित्त लगा कर इस भवसागर को पार कर।

34जिन जीवों ने गुरु द्वारा नाम-ज्ञान को प्राप्त नहीं किया, वे बार-बार आवागमन में ही व्यस्त रहते हैं ॥१॥ रहाउ ॥

35जिस अंतर्मन में सत्य-नाम विद्यमान हो, वही पवित्र कहा जाता है।

36शरीर सत्य स्वरूप निरंकार के भय में रत है और रसना सत्य-नाम का स्वाद चख रही है।

37उस जीव पर जब परमेश्वर की कृपा-दृष्टि हो गई तब उसे नरकों की अग्नि का ताप नहीं सहना पड़ता ॥२॥

38(अब सतगुरु जी पुनः सृष्टि की रचना का चित्रण करते हैं।) सत्य स्वरूप निरंकार से पवन हुआ, पवन से जल की उत्पति हुई।

39फिर सृजनहार परमात्मा ने जलादि तत्वों से तीनो लोकों (सम्पूर्ण सृष्टि) की रचना की, फिर इस रचना के कण-कण में उसने जीव रूप में अपनी ज्योति विद्यमान की।

40गुरु उपदेश में तदाकार होने से जिसका मन निर्मल होता है, वह फिर कभी द्वैत के कारण दूषित नहीं होता, इसी से वह प्रतिष्ठित होता है। ॥ ३।

41जब यह मन सत्य द्वारा संतुष्ट हो जाता है तब उस पर निरंकार की कृपा होती है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं