सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 190 · Raag Gauree · Guru Arjan Dev Ji

1चरणों से मैं ठाकुर के मार्ग का अनुसरण करता हूँ॥ १॥

2जीवन का वह समय बड़ा शुभ है, जिसमें भगवान का सिमरन करने का अवसर मिलता है।

3भगवान का नाम-सिमरन करने से भयानक सागर से पार हुआ जा सकता है॥ १॥ रहाउ॥

4हे भाई ! अपने नेत्रों से संतों के दर्शन कर।

5अविनाशी प्रभु को अपने हृदय में धारण कर ले॥ २॥

6संतों के पास जाकर ईश्वर का भजन सुन

7और इस प्रकार तेरा जन्म-मरण का भय दूर हो जाएगा ॥ ३॥

8हे भाई ! ठाकुर जी के सुन्दर चरणों को अपने हृदय में बसाकर रख।

9हे नानक ! इस तरह अपने अमूल्य मानव शरीर का कल्याण कर ले॥ ४॥ ५१॥ १२०॥

10गउड़ी महला ५ ॥

11जिस व्यक्ति पर ईश्वर अपनी कृपा धारण करता है,

12वह अपनी रसना से भगवान के नाम का जाप करता है॥ १॥

13हरि को विस्मृत करके सन्देह एवं दुख प्राणी को लग जाते हैं।

14लेकिन नाम-सिमरन करने से भ्रम एवं भय भाग जाते हैं।॥ १॥ रहाउ ॥

15जो व्यक्ति ईश्वर का भजन सुनता है और ईश्वर का भजन गाता है,

16उस व्यक्ति के निकट कोई भी मुसीबत नहीं आती ॥ २॥

17ईश्वर का सेवक उसकी सेवा करता हुआ सुन्दर लगता है।

18उसे माया की अग्नि स्पर्श नहीं करती ॥ ३ ॥

19हे नानक ! दया के घर ईश्वर का नाम जिस व्यक्ति के हृदय एवं मुख में वास कर जाता है,

20उस व्यक्ति ने दूसरे समस्त जंजाल त्याग दिए हैं॥ ४॥ ५२॥ १२१॥

21गउड़ी महला ५ ॥

22हे भाई ! अपनी बुद्धिमता एवं अधिक चतुरता को त्याग कर

23पूर्ण गुरु की शरण ले॥ १॥

24ऐसा व्यक्ति भगवान का गुणानुवाद करता हुआ सुखी हो जाता है और उसके तमाम दुख नाश हो जाते हैं,

25जिस व्यक्ति की पूर्ण गुरु से भेंट हो जाती है, वह गुरु की कृपा से भगवान में ही सुरति लगाता है। ॥ १॥ रहाउ॥

26गुरु ने मुझे ईश्वर के नाम का मंत्र प्रदान किया है,

27जिससे मेरी चिन्ताएँ मिट गई हैं और व्याकुलता दूर हो गई है॥ २॥

28कृपा के घर गुरु को मिलने से आनन्द प्राप्त हो गया है।

29अपनी कृपा धारण करके गुरु ने यमदूतों का फँदा काट दिया है॥ ३॥

30हे नानक ! मैंने पूर्ण गुरु को पा लिया है,

31इसलिए माया मुझे पुनः पीड़ित नहीं करेगी॥ ४॥ ५३॥ १२२॥

32गउड़ी महला ५ ॥

33पूर्ण गुरु ने स्वयं मेरी रक्षा की है।

34लेकिन स्वेच्छाचारी पर मुसीबतों का पहाड़ उमड़ पड़ा है॥ १॥

35हे मेरे मित्र ! गुरु को हमेशा स्मरण कर।

36प्रभु के दरबार में तेरा मुख उज्ज्वल होगा ॥ १॥ रहाउ॥

37हे मित्र ! तू गुरु के चरण अपने ह्रदय में बसा,

38तेरा दुःख, शत्रु एवं आपदा नष्ट हो जाएँगे॥ २॥

39गुरु का शब्द ही तेरा साथी एवं सहायक है।

40हे भाई ! सभी लोग तुझ पर दयालु होंगे॥ ३॥

41हे नानक ! जब पूर्ण गुरु ने अपनी कृपा-दृष्टि की,

42तो मेरा जीवन परिपूर्ण हो गया ॥ ४॥ ५४॥ १२३॥

43गउड़ी महला ५ ॥

44मनुष्य अधिकतर स्वादिष्ट पदार्थ पशु की भाँति सेवन करता है

45और सांसारिक मोह की रस्सी से वह चोर की भाँति जकड़ा रहता है।॥ १॥

46हे भाई ! जो व्यक्ति संतों की संगति से विहीन रहता है, उसका शरीर मृतक है।

47ऐसा व्यक्ति योनियों में फंसकर आवागमन करता रहता है और दुख से नष्ट हो जाता है।॥ १॥ रहाउ ॥

48मनुष्य मोहवश विभिन्न प्रकार की सुन्दर पोशाकें धारण करता है,

49परन्तु निर्धनों के लिए वह ऐसा होता है जैसे फसल में पशुओं को डराने के लिए बनावटी रक्षक खड़ा किया होता है॥ २॥

50दूसरे पशुओं इत्यादि के शरीर काम आ जाते हैं।

51लेकिन जो व्यक्ति भगवान के नाम का जाप नहीं करता, उसका दुनिया में आगमन निष्फल हो जाता है॥ ३॥

52हे नानक ! भगवान जिस व्यक्ति पर दयालु हो जाता है,

53वह संतों की संगति में शामिल होकर गोपाल का भजन करता रहता है॥ ४ ॥ ५५ ॥ १२४ ॥

54गउड़ी महला ५ ॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं