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गुरु ग्रंथ साहिब 18 · Siree Raag · Guru Nanak Dev Ji

1हे निरंकार ! कितनी ही तेरी शक्तियां हैं और तेरा दिया हुआ दान भी कितना महान् है (यह सब अकथनीय है) ।

2कितने ही असंख्य सूक्ष्म व स्थूल जीव-जंतु हैं जो तेरा निशदिन स्तुतिगान कर रहे हैं।

3असंख्य ही तेरे गौरश्यामादि रूप-रंग हैं तथा कितनी ही ब्राह्मण-क्षत्रियादि उच्च जातियाँ व शूद्रादि निम्न जातियों रची हुई है॥ ३॥

4फिर तो हे सखियो ! जब सद्पुरुषों की सत्संगति प्राप्त होती है तो हृदय में सुगुणों की उत्पत्ति होती है और सत्य नाम सुमिरन में श्रद्धा करके जीव सत्यस्वरूप अकाल पुरुष में समा जाता है।

5(पुनः क्या होता है इसका विचार सतिगुरु जी ने कथन किया है) जब मानव-मन प्रभु चरणों में लीन होता है तब पति-परमेश्वर प्रकट होता है, किन्तु यह सब गुरु-उपदेश द्वारा हृदय में परमात्मा का भय धारण करने से ही सम्भव है।

6सतिगुरु जी कहते हैं कि वह सत्य स्वरूप निरंकार (बादशाह) ऐसी गुणवती ज्ञानी रूप सुहागिन सखियों को स्वयं ही अपने स्वरूप में अभेद कर लेता है ॥४॥१०॥

7श्रीरागु महला १ ॥

8भला हुआ, जो मेरी बुद्धि अवगुणों से रिक्त हो गई है और मेरे हृदय-घर से अहंत्व व ममत्व विकारों का नाश हो गया है।

9(जब इन विकारों से हृदय व बुद्धि रिक्त हो गई तो) सतिगुरु का भरोसा प्राप्त हुआ और विकारों में लिप्त रूपी दूत ऐन्द्रिक दूत मेरे दास बन गए।

10उस निश्चिन्त परमात्मा में निश्चय करते हुए व्यर्थ की कल्पना का त्याग कर दिया है॥ १॥

11हे मानव मन ! सत्य नाम हृदय में धारण करने से ही यमादि का भय क्षीण होता है।

12परमेश्वर का भय माने बिना निर्भय कैसे हुआ जा सकता है परमेश्वर का भय पाने हेतु गुरु के मुख से किया गया उपदेश मनन करना पड़ता है॥ १॥ रहाउll

13फिर तो हे भाई ! उस निरंकार का यश कितना कथन किया जाए, क्योंकि उसके यशोगान की तो कोई सीमा ही नहीं है।

14उस प्रदाता अकाल पुरुष से माँगने वाले तो अनेकानेक जीव हैं और देने वाला वह मात्र एक ही है।

15जिस के आसरे जीव और प्राण हैं उस निरंकार को मन में बसा लेने से ही आत्मिक सुखों की प्राप्ति हो सकती है॥ २॥

16उसके अतिरिक्त अन्य जो जगत् की रचना है वह एक स्वप्न व तमाशा ही है, क्षण मात्र में यह खेल की भाँति समाप्त हो जाएगा; अर्थात् परमात्मा के बिना यह संसार व अन्य पदार्थ सब नश्वर हैं।

17जीव संयोगी कर्मो के कारण संसार में एकत्र होते हैं और वियोर्गीकर्मो से यहाँ से प्रस्थान कर जाते हैं।

18जो निरंकार को भला लगता है वही होता है, अपनी समर्था से अन्य कोई भी कुछ नहीं कर सकता ॥ ३॥

19जिनके पास श्रद्धा रूपी पूँजी है उन गुरु के उन्मुख सौदागरों ने ही वाहिगुरु-नाम रूपी सौदा क्रय किया है और वे नामी पुरुष ही आत्म-वस्तु को खरीदते हैं।

20जिन्होंने गुरु द्वारा सत्य नाम रूपी सौदा खरीदा है, वे परलोक में भी दृढ़ होते हैं।

21सतिगुरु जी कथन करते हैं कि जिसके पास नाम रूपी सच्चा सौदा है, वही लोक-परलोक में आत्म-वस्तु को पहचान सकेगा ॥ ४॥ ११॥

22श्रीरागु महलु १ ॥

23{यहाँ पर सतिगुरु मनमुख व गुरमुख में अंतर कथन करते हैं) जो माया से प्रीत करने वाला प्राणी है वह पुन: माया में ही लिप्त होता है, अर्थात् आवागमन के चक्र में भ्रमण करता है, पर गुरु से मिल कर जो अकाल पुरुष का स्तुति गान करता है वह उस परमेश्वर में ही अभेद हो जाता है।

24(स्तुति करने वालों को) उन्हें आनंददायक (लाल) अति आनंददायक (गुलाल) व अत्यंतानंददायक (गहबरा) सत्य रंग चढ़ जाता है।

25यह सत्य रंग संतोषी पुरुषों को मिलता है और जो श्रद्धापूर्वक एकाग्रचित होकर वाहिगुरु-नाम का सिमरन करते हैं॥१॥

26हे भाई ! संत जनों की चरण-धूलि होकर रहो।

27क्योंकि इन संतों की सभा रूपी सत्संगति के कारण ही गुरु की प्राप्ति होती है और वे गुरु मुक्ति जैसा दुर्लभ पदार्थ देने हेतु कामधेनु गाय के समान है॥१॥रहाउ ॥

28सर्वोच्च व शोभनीय स्थान मानव जन्म है, उसे सर्वश्रेष्ठ मानकर ही निरंकार ने अपना निवास स्थान बनाया है।

29नाम-सिमरन व जप-तपादि सत्कर्मो के करने से ही मानव देह में जो निरंकार का स्वरूप है, उसके साथ प्रेम प्राप्त होता है।

30गुरु के मुख से हुए उपदेश द्वारा मन को समझाने से ही जीवात्मा और परमेश्वर दोनों की अभेदता का विचार प्रकट होता है।॥ २॥

31(नित्य, नैमितिक व काम्य अथवा सत्व, रजस्व तमस्) त्रिविध कर्म करने से प्रथम तो स्वर्ग प्राप्ति की आशा होती है, फिर इसके छूट जाने की चिन्ता सताने लगती है।

32इस तीन गुणों की पेचीदगी गुरु के बिना कैसे छूट सकती है जिससे ज्ञान प्राप्ति होकर आत्मिक सुख उपलब्ध हों।

33जब निरंकार कृपालु होकर पापों की मैल को धो देता है तभी इस मानव शरीर में विद्यमान अकाल पुरुष का स्वरूप पहचाना जा सकता है॥ ३॥

34इसलिए यही निश्चय कर कि गुरु के बिना पापों की यह मैल हृदय से नहीं उतर सकती और (जब तक इस मैल की निवृति नहीं हो जाती तब तक) हरि-परमेश्वर की कृपा नहीं हो सकती तथा आत्मस्वरूप में निवास असम्भव है॥३ll

35इसलिए समस्त आशाओं का त्याग करके जिज्ञासु को एक ही गुरु का उपदेश मनन करना चाहिए।

36सतिगुरु जी कहते हैं कि जो सद्पुरुष (नश्वर पदार्थों का त्याग करके) स्वयं निरंकार को देखते हैं फिर अन्य जिज्ञासुओं को दिखाते हैं, उन पर मैं सदैव कुर्बान जाता हूँ॥४॥१२॥

37श्रीरागु महला १ ॥

38जो अभागिन जीव-स्त्री द्वैत-भाव के कारण ठगी गई है उसके जीवन को धिक्कार है।

39एक के अतिरिक्त किसी अन्य से अनुरक्त होने के कारण अभागिन जीव स्त्री का जीवन कल्लर की दीवार की भाँति है, जो निशदिन किर-किर कर अंत में गिर पड़ती है; अर्थात् मनमुख जीव आवागमन के चक्र में ही फंसा रहता है।

40गुरु उपदेश के बिना जीव-स्त्री को पति-परमेश्वर के मिलाप का आत्मिक आनंद प्राप्त नहीं होता तथा आत्मानंद के बिना दैहिक एवं दैविक कष्टों की निवृति नहीं होती।॥१॥

41हे मुग्ध जीव-स्त्री ! परमात्मा पति के बिना श्रृंगार का क्या लाभ है, अर्थात् निरंकार में श्रद्धा-भाव के बिना जप-तपादि का किया हुआ श्रृंगार क्या सुख देगा?

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं