सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 189 · Raag Gauree · Guru Arjan Dev Ji

1संतों की कृपा से जन्म-मरण से मुक्ति हो जाती है॥ १॥

2संतों के दर्शन ही पूर्ण तीर्थ स्नान है।

3संतों की कृपा से हरिनाम का जाप किया जाता है॥ १॥ रहाउ॥

4संतों की संगति से मनुष्य का अहंत्व मिट जाता है

5और फिर सर्वत्र एक ईश्वर ही दृष्टिगोचर होता है॥ २॥

6संतों की सुप्रसन्नता से पाँच विकार-(काम, क्रोध, लोभ, मोह-अहंकार) वश में आ जाते हैं।

7मनुष्य अपने हृदय को अमृत नाम से संचित कर लेता है॥ ३॥

8हे नानक ! जिसकी किस्मत पूर्ण है,

9वही संतों के चरण स्पर्श करता है ॥ ४॥ ४६ ॥ ११५ ॥

10गउड़ी महला ५ ॥

11भगवान की महिमा-स्तुति करने से हृदय-कमल प्रफुल्लित हो जाता है।

12भगवान का सिमरन करने से समस्त भय नाश हो जाते हैं।॥ १॥

13वही मति पूर्ण है, जिससे भगवान का यश गायन किया जाता है।

14संतों की संगति किस्मत से ही मिलती है॥ १ ॥ रहाउ ॥

15संतों की संगति करने से नाम-निधि प्राप्त हो जाती है।

16संतों की संगति करने से समस्त कार्य सफल हो जाते हैं॥ २ ॥

17भगवान की भक्ति करने से मनुष्य का जन्म सफल हो जाता है।

18गुरु की कृपा से प्रभु का नाम सिमरन होता है॥ ३॥

19हे नानक ! वह सत्य के दरबार में स्वीकार हो जाता है,

20जिस मनुष्य के हृदय में भगवान का निवास हो जाता है॥ ४ ॥ ४७ ॥ ११६ ॥

21गउड़ी महला ५ ॥

22जिस व्यक्ति का मन एक ईश्वर के प्रेम में मग्न हो जाता है,

23वह दूसरों से इर्षा-द्वेष करना भूल जाता है॥ १ ॥

24उसे गोविन्द के अलावा दूसरा कोई नहीं दिखाई देता।

25उसे ज्ञान हो जाता है कि जगत् का कर्ता स्वयं ही सबकुछ करने वाला एवं जीवों से कराने वाला है॥ १॥ रहाउ॥

26जो व्यक्ति एकाग्रचित होकर नाम-सिमरन की साधना करता है , और अपने मुख से हरि-परमेश्वर का नाम बोलता रहता है,

27वह लोक-परलोक में कहीं भी डगमगाता नहीं ॥ २॥

28जिस मनुष्य के पास हरि नाम रूपी धन है, वही सच्चा साहूकार है।

29पूर्ण गुरु ने उसकी प्रतिष्ठा बना दी है॥ ३॥

30उसे जीवन पुरुष हरि-परमेश्वर मिल जाता है।

31हे नानक ! इस तरह वह परम पद प्राप्त कर लेता है॥ ४ ॥ ४८॥ ११७ ॥

32गउड़ी महला ५ ॥

33प्रभु का नाम ही उसके भक्त के प्राणों का आधार है।

34नाम ही उसका धन है, नाम ही उसका व्यापार है॥ १॥

35नाम द्वारा भक्त प्रशंसा एवं शोभा प्राप्त करता है।

36लेकिन यह नाम उसे ही प्राप्त होता है, जिसको प्रभु स्वयं कृपा करके दिलवाता है॥ १॥ रहाउ॥

37नाम भक्त की सुख-शांति का निवास है।

38जो भक्त नाम में मग्न रहता है, वह स्वीकार हो जाता है॥ २ ॥

39हरि का नाम उसके सेवक को आधार प्रदान करता है।

40श्वास-श्वास से ईश्वर का सेवक नाम-सिमरन करता रहता है॥ ३॥

41हे नानक ! जिस व्यक्ति की किस्मत अच्छी होती है,

42उसका ही मन नाम से लगा रहता है ॥ ४ ॥ ४९ ॥ ११८ ॥

43गउड़ी महला ५ ॥

44संत की कृपा से जब से मैंने भगवान के नाम का ध्यान किया है,

45तब से मेरा विकारों की ओर भटकता हुआ मन तृप्त हो गया है॥ १॥

46प्रभु की गुणस्तुति करने से मुझे सुख का विश्राम प्राप्त हो गया है।

47मेरी पीड़ा दूर हो गई है और मेरे कुकर्मों का दैत्य नष्ट हो गया है॥ १॥ रहाउ ॥

48हे भाई ! भगवान के चरण-कमलों का चिन्तन कर।

49हरि का सिमरन करने से मेरी चिन्ता मिट गई है ॥ २ ॥

50मैं अनाथ सब सहारों को त्याग चुका हूँ और एक ईश्वर की शरणागत हूँ।

51तब से मैंने सर्वोच्च स्थान को सहज ही प्राप्त कर लिया है॥ ३॥

52मेरे दुःख-दर्द, भ्रम-भय नाश हो गए हैं।

53हे नानक ! सृजनहार प्रभु ने हृदय में निवास कर लिया है॥ ४॥ ५० ॥ ११९॥

54गउड़ी महला ५ ॥

55मैं अपने हाथों से प्रभु की सेवा करता हूँ और मुख से उसकी गुणस्तुति करता हूँ।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं