सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 187 · Raag Gauree · Guru Arjan Dev Ji

1हे ईश्वर !वह कौन-से गुण है जिनकी मैं स्तुति करू,

2हे पारब्रह्म-प्रभु ! में क्या बोलू जिससे मैं तुझे प्रसन्न कर दूँ॥ १॥ रहाउ॥

3हे नाथ ! वह कौन-सी पूजा-अर्चना है, जो मैं तेरी करूँ।

4हे दीनदयालु! वह कौन-सी विधि है, जिससे मैं भयानक सागर से पार हो जाऊँ ?॥ २॥

5हे प्रभु ! वह कौन-सी तपस्या है, जिससे मैं तपस्वी हो जाऊँ ?

6हे परमात्मा ! यह कौन-सा नाम है, जिस द्वारा अहंकार की मैल दूर हो जाती है॥ ३॥

7हे नानक ! उसकी तमाम साधना, गुणानुवाद, पूजा, ज्ञान एवं ध्यान सफल हो जाते है

8जिसे दयालु सतिगुरु अपनी कृपा करके मिल जाते हैं, ॥ ४॥

9केवल वही गुण-फल प्राप्त करता है और केवल वही प्रभु को समझता है,

10जिसकी भक्ति सुखदाता स्वीकार कर लेता है॥ १॥ रहाउ दूजा॥ ३६॥ १०५॥

11गउड़ी महला ५ ॥

12हे प्राणी ! यह तन जिसका तुझे अभिमान हैं, यह तेरा अपना नहीं है।

13शासन, सम्पति, धन (सदा के लिए) तेरे नहीं है॥ १॥

14हे प्राणी ! जब यह तेरे नहीं, तो फिर उनसे क्यों मोह करते हो ?

15केवल नाम ही तेरा है और वह तुझे सतिगुरु से प्राप्त होगा ॥ १॥ रहाउ॥

16हे प्राणी ! पुत्र, पत्नी एवं भाई तेरे नहीं।

17इष्ट मित्र, पिता एवं माता तेरे अपने नहीं हैं।॥ २॥

18सोना, चांदी एवं धन-दौलत भी तेरे नहीं हैं।

19कुशल घोड़े एवं सुन्दर हाथी तेरे किसी काम नहीं ॥ ३॥

20हे नानक ! जिसको गुरु जी क्षमा कर देते हैं, उसको वह प्रभु से मिला देते हैं।

21जिसका प्रभु-परमेश्वर है उसके पास सब कुछ है॥ ४ ॥ ३७ ॥ १०६ ॥

22गउड़ी महला ५ ॥

23गुरु के चरण मेरे मस्तक पर विद्यमान हैं।

24इससे मेरे समस्त दुःख दूर हो गए हैं।॥ १॥

25मैं अपने सतिगुरु पर कुर्बान जाता हूँ।

26जिनके द्वारा मैंने अपने आत्मिक जीवन को समझ लिया है और सर्वोपरि आनन्द भोगता हूँ॥ १॥ रहाउ॥

27गुरु की चरण-धूलि मेरे चेहरे पर लग गई है

28और उसने मेरी अहंबुद्धि सारी निवृत्त कर दी है॥ २॥

29गुरु का शब्द मेरे मन को मीठा लग रहा है।

30पारब्रह्म प्रभु का इस कारण मैं दर्शन कर रहा हूँ॥ ३॥

31गुरु ही सुखदाता और गुरु ही करतार हैं।

32हे नानक ! गुरु मेरी आत्मा एवं प्राणों का आधार है॥ ४ ॥ ३८ ॥ १०७ ॥

33गउड़ी महला ५ ॥

34हे मेरे मन ! तू उस प्रभु के मिलन की लालसा कर, जिसके घर में किसी पदार्थ की कोई कमी नहीं है॥ १॥

35हे मेरे मन ! तू उस प्रियतम हरि को अपना मित्र बना।

36तू सदैव ही प्रभु को अपने हृदय में बसा कर रख, जो तेरे प्राणों का आधार है॥ १॥ रहाउ ॥

37हे मेरे मन ! तू उसकी सेवा कर,

38जो आदिपुरुष एवं अपरंपार देव है॥ २॥

39हे मेरे मन ! तू उस पर अपनी आशा रख,

40जो आदि एवं युगों के आरम्भ से प्राणियों का सहारा है॥ ३॥

41जिसके प्रेम से हमेशा सुख-शांति प्राप्त होती है,

42हे नानक ! गुरु से मिलकर वह उसकी महिमा ही गायन करता है॥ ४॥ ३९॥ १०८ ॥

43गउड़ी महला ५ ॥

44जो कुछ मेरा मित्र (प्रभु) करता है, उसको मैं सहर्ष स्वीकार करता हूँ।

45मेरे मित्र प्रभु के कार्य मुझे सुख के तुल्य प्रतीत होते हैं।॥ १॥

46मेरे मन एवं चित्त में एक ही प्रभु का सहारा है,

47जिसकी यह सब रचना है, वही मेरा मित्र-प्रभु है॥१॥ रहाउ॥

48मेरा मित्र प्रभु बेपरवाह है।

49गुरु की दया से मेरा उससे प्रेम हो गया है॥ २॥

50मेरा मित्र प्रभु अन्तर्यामी है।

51पारब्रह्म पुरुष रूप एवं सारे जगत् का स्वामी है और सब कुछ करने में समर्थ है॥ ३॥

52हे प्रभु ! मैं तेरा दास हूँ और तू मेरा ठाकुर है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं