सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 184 · Raag Gauree · Guru Arjan Dev Ji

1उस सेवक का सहारा एक गोपाल ही है।

2वह सेवक एक परमेश्वर में ही अपनी सुरति लगाता है और उसके मन में एक प्रभु का ही प्रेम होता है।

3सेवक के लिए हरि का नाम ही तमाम भण्डार है। ॥३॥

4जो पारब्रह्म से प्रेम करता है,

5उसके कर्म पवित्र और जीवन-आचरण सत्य है।

6पूर्ण गुरु ने अज्ञानता का अंधकार मिटा दिया है।

7नानक का प्रभु असीम एवं अनन्त है। ॥४ ॥ २४॥ ६३॥

8गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥

9जिस व्यक्ति के हृदय में ईश्वर निवास करता है, वह संसार सागर से पार हो जाता है।

10जिसकी किस्मत में लिखा होता है, वह ईश्वर को प्राप्त कर लेता है।

11दुख, रोग एवं भय उसको तनिक मात्र भी प्रभावित नहीं करते,

12जो अपने हृदय में ईश्वर के अमृत नाम का सिमरन करते रहते हैं। ॥१॥

13हमें पारब्रह्म-परमेश्वर का ही ध्यान करना चाहिए।

14पूर्ण गुरु से यह सूझ प्राप्त होती है॥ १॥ रहाउ॥

15दयावान प्रभु स्वयं ही सब कुछ करने वाला एवं जीवों से कराने वाला है।

16वह सृष्टि के समस्त जीव-जन्तुओं की पालना करता है।

17प्रभु सदैव ही अगम्य, अगोचर एवं अनन्त है।

18हे मेरे मन ! पूर्ण गुरु के उपदेश से प्रभु का सिमरन कर ॥ २ ॥

19प्रभु की सेवा करने से तमाम भण्डार प्राप्त हो जाते हैं।

20प्रभु की पूजा करने से मान-सम्मान प्राप्त होता है।

21प्रभु की सेवा व्यर्थ नहीं जाती,

22अतः नित्य ही उसका गुणानुवाद करते रहो ॥ ३॥

23अन्तर्यामी प्रभु मुझ पर कृपा कीजिए।

24जगत् का स्वामी, अलक्ष्य परमेश्वर सुखों का खजाना है।

25समस्त जीव-जन्तु तेरी शरण में हैं।

26हे नानक ! मुझे प्रभु का नाम मिल जाए चूंकि उसका नाम ही मेरे लिए बड़ाई है। ॥४॥२५॥९४॥

27गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥

28जिस भगवान के वश में जीवों की जीवन-युक्ति है,

29उसका ही सिमरन करो, वह अनाथों का नाथ है।

30यदि मनुष्य भगवान को स्मरण करता रहे तो उसके समस्त दुख नष्ट हो जाते हैं।

31हरि के नाम सिमरन से समस्त भय नाश हो जाते हैं।॥ १॥

32हे प्राणी ! तू ईश्वर के अलावा किसी दूसरे का भय क्यों अनुभव करता है ?

33यदि तू प्रभु को विस्मृत कर देता है तो फिर तू अपने आप को सुख में क्यों समझते हो॥ १ ॥ रहाउ ॥

34जिसने अनेकों धरती-आकाश कायम किए हैं,

35जिसकी ज्योति का समस्त जीवों में प्रकाश है,

36जिसकी दया को कोई भी मिटा नहीं सकता।

37उस प्रभु का सिमरन करने से मनुष्य निर्भीक हो जाता है॥ २॥

38दिन के आठ प्रहर प्रभु के नाम का सिमरन करते रहो।

39चूंकि प्रभु का नाम-सिमरन ही अनेकों तीर्थों का स्नान है।

40पारब्रह्म की शरण में आने से

41मनुष्य के करोड़ों ही कलंक एक क्षण में मिट जाते हैं।॥ ३॥

42वह बेपरवाह पूर्ण बादशाह है।

43ईश्वर के सेवक की उसमें सच्ची आस्था है।

44अपना हाथ देकर पूर्ण गुरु जी उसकी रक्षा करते हैं।

45हे नानक ! पारब्रह्म प्रभु सब कुछ करने में समर्थ है ॥४॥२६॥९५॥

46गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥

47गुरु की कृपा से मेरा मन प्रभु के नाम में लग गया है।

48यह मन जन्म-जन्मांतरों से अज्ञानता की निद्रा में सोया हुआ था परन्तु अब यह जाग गया है अर्थात् इसे ज्ञान हो गया है।

49वही प्राणी प्रभु की वाणी द्वारा उसके अमृतमयी गुणों का उच्चारण करता है,

50जिसे पूर्ण गुरु की सुमति प्राप्त हो जाती है॥ १॥

51प्रभु का सिमरन करने से मुझे सर्वसुख प्राप्त हो गए हैं।

52घर के भीतर एवं बाहर मुझे सहज ही सर्वसुख प्राप्त हो गया है॥ १॥ रहाउ॥

53मैंने उस प्रभु को पहचान लिया है, जिसने मुझे उत्पन्न किया है।

54प्रभु ने कृपा करके मुझे अपने साथ मिला लिया है।

55भुजा से पकड़कर प्रभु ने मुझे अपना बना लिया है।

56हरि की सुन्दर हरि-कथा एवं नाम का मैं हमेशा जाप जपता हूँ॥ २॥

57मन्त्र-तन्त्र, औषधि, प्रायश्चित कर्म समूह

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं