गुरु ग्रंथ साहिब 182 · Raag Gauree · Guru Arjan Dev Ji
1माया का सुख-दुख में प्रसार है।
2वह स्वर्ग में जन्म लेने वाले जीवों को सुख रूप में तथा नरक के जीवों को दुख रूप में प्रभावित करती है।
3यह धनवानों, कगालों एवं शोभावानों पर प्रभाव करती देखी जाती है।
4यह लोभ रूप में जीवों में फैली हुई है और तमाम रोगों की जड़ है। ॥१॥
5माया अनेक विधियों से प्रभाव करती है।
6हे प्रभु! तेरी शरण में साधु-संत इसके प्रभाव के बिना ही अपना जीवन व्यतीत करते हैं। १॥ रहाउ॥
7माया उससे लिपटी हुई है जो अहंबुद्धि से मदहोश हुआ है।
8जो अपने पुत्रों एवं भार्या के प्रेम में अनुरक्त हुआ है, माया उससे भी लिपटी हुई है।
9मोहिनी उससे लिपटी हुई है जो हाथियों, घोड़ों एवं सुन्दर वस्त्रों में लीन है।
10यह (मोहिनी) उस पुरुष से लिपटी हुई है जो सुन्दरता एवं यौवन के नशे में मस्त हुआ है। ॥२॥
11माया धरती के स्वामियों, निर्धनों एवं भोग-विलासियों से लिपटी हुई है।
12यह सभाओं में गीत एवं राग श्रवण करने वालों से लिपटी हुई है।
13यह सेज, हार-श्रृंगार, महलों में व्याप्त हुई है।
14यह मोह के अन्धेरे में कामादिक पांचों दूत बनकर प्रभाव डाल रही है॥ ३॥
15यह मोहिनी उसके भीतर व्याप्त हुई है जो अहंकार में फंसकर अपना कर्म करता है।
16गृहस्थ में भी यह हम पर प्रभाव डालती है और त्याग में भी प्रभावित करती है।
17हमारे चरित्र, कामकाज और जाति द्वारा मोहिनी हम पर आक्रमण करती हैं।
18सिवाय उनके जो परमेश्वर के प्रेम में अनुरक्त है, यह प्रत्येक पदार्थ को चिपकती है। ॥४॥
19संतों के बन्धन प्रभु ने काट दिए हैं।
20मोहिनी उनको किस तरह चिपक सकती है ?
21हे नानक ! जिसको संतों की चरण-धूलि प्राप्त हुई है मोहिनी उनके निकट नहीं आती ।॥५॥१९॥८८॥
22गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥
23पराई नारी के सौन्दर्य को कामवासना रूपी विकृत दृष्टि से देखने से नेत्र निद्रा में सोए हुए हैं।
24परनिन्दा के विचारों को सुनकर कान सोए हुए हैं।
25मीठे पदार्थों के स्वाद की तृष्णा-लालसा में जिह्म सोई हुई है।
26मन माया की आश्चर्यजनक लीला को देखकर सोया हुआ है। ॥१॥
27शरीर रूपी घर में कोई विरला पुरुष ही जागता रहता है
28और वह अपनी पूँजी सुरक्षित पा लेता है। १ ॥ रहाउ॥
29मन की सखियां पाँच ज्ञानेन्द्रियां अपने स्वाद में मस्त हैं।
30वह अपने घर की रक्षा करनी नहीं जानती।
31पांचों दुष्ट विकार अपहरणकर्ता एवं लुटेरे हैं।
32लुटेरे सुनसान नगर में आ जाते हैं। ॥२॥
33उनसे माता-पिता बचा नहीं सकते।
34मित्र एवं भाई भी उनसे रक्षा नहीं कर सकते।
35दौलत एवं चतुरता से वे नहीं रुकते।
36लेकिन सत्संग में वे दुष्ट वश में आ जाते हैं। ॥३॥
37हे सारिंगपाणि प्रभु! मुझ पर कृपा कीजिए।
38मुझे संतों की चरण-धूलि प्रदान कीजिए चूंकि मेरे लिए यह चरण-धूलि ही सर्वनिधि है।
39सतिगुरु की संगति में नाम रूपी पूँजी सुरक्षित रहती है।
40नानक पारब्रह्म प्रभु के प्रेम में जागता है॥ ४॥
41केवल वही जागता है जिस पर प्रभु दयालु है।
42ये पूँजी, पदार्थ और सम्पति फिर बचे रहते हैं। १॥ रहाउ दूजा ॥२०॥८९॥
43गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥
44हे प्राणी ! जिस प्रभु के वश में सरदार और सुल्तान हैं।
45जिसके अधीन सारा संसार है।
46जिसके करने से सब कुछ हो रहा है,
47उससे बाहर कुछ भी नहीं ॥ १ ॥
48हे प्राणी ! अपने सतिगुरु के पास विनती कर।
49वह तेरे समस्त कार्य सम्पूर्ण कर देगा। १॥ रहाउ ॥
50उस प्रभु का दरबार सबसे ऊँचा है।
51उसका नाम उसके समस्त भक्तों का आधार है।
52जगत् का स्वामी प्रभु सबमें विद्यमान है।
53उसकी शोभा समस्त जीवों के हृदय में प्रकट है। ॥२॥
54जिस प्रभु का सिमरन करने से दुखों का पहाड़ नष्ट हो जाता है।
55जिसका सिमरन करने से यमदूत तुझे दुख नहीं देता।
56जिसकी आराधना करने से नीरस मन प्रफुल्लित हो जाता है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं