गुरु ग्रंथ साहिब 180 · Raag Gauree · Guru Arjan Dev Ji
1प्राणी विचार करता है कि यह शरीर उसका अपना है।
2वह बार-बार उस शरीर से ही लिपटता है।
3जितनी देर तक पुत्र, स्त्री एवं गृहस्थ के मोह का फंदा उसके गले में पड़ा रहता है,
4तब तक वह राम का दास नहीं बनता ॥ १ ॥
5वह कौन-सी विधि है, जिससे राम का यश गायन किया जाए?
6हे माता! वह कौन-सी बुद्धि है, जिससे यह प्राणी माया से पार हो जाए। १॥ रहाउ॥
7जो कार्य मानव की भलाई का है, उसको वह बुरा समझता है।
8यदि कोई उसको सत्य कहे, तो वह उसको विष के समान कड़वा लगता है।
9वह नहीं जानता कि जीत क्या है और हार क्या है ?
10इस दुनिया में शाक्त व्यक्ति का यही जीवन-आचरण है। २॥
11जो विष है, पागल पुरुष उसको पान करता है।
12प्रभु के अमृत नाम को वह कड़वा समझता है।
13वह साधु-संतों की संगति के निकट नहीं आता,
14जिससे वह चौरासी लाख योनियों में भटकता फिरता है |
15समस्त जीव पक्षी माया ने अपने मोह रूपी जाल में फंसाए हुए हैं।
16मनुष्य स्वाद लेकर अनेक प्रकार के भोग भोगता है।
17हे नानक ! कहो- जिस व्यक्ति पर प्रभु कृपालु हो गया है, पूर्ण गुरु ने उसके मोह-माया के बंधन काट दिए हैं। ४॥ १३ ॥ ८२॥
18गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥
19हे प्रभु! तेरी कृपा से जीवन-मार्ग मिलता है।
20प्रभु की कृपा से नाम का ध्यान किया जाता है।
21प्रभु की कृपा से प्राणी बन्धनों से मुक्ति प्राप्त कर लेता है।
22हे प्रभु! तेरी कृपा से अहंकार दूर हो जाता है। १॥
23हे ईश्वर ! यदि तू मुझे अपनी सेवा में लगाए, तो ही मैं तेरी सेवा-भक्ति में लगता हूँ।
24हे देव ! अपने आप में कुछ भी नहीं कर सकता। १॥ रहाउ ।
25हे ईश्वर ! यदि तुझे अच्छा लगे तो मैं तेरी वाणी गा सकता हूँ।
26हे प्रभु! यदि तुझे अच्छा लगे तो मैं सत्य बोलता हूँ।
27यदि तुझे अच्छा लगे तो ही सतिगुरु की दया जीव पर होती है।
28हे मेरे ठाकुर ! तेरी दया से ही जीव को सर्व सुख प्राप्त होते हैं। ॥२॥
29हे प्रभु! जो तुझे उपयुक्त लगता है, वही पवित्र कर्म है।
30हे नाथ ! जो तुझे लुभाता है, वही सत्य धर्म है।
31सर्वगुणों का खजाना तेरे पास है।
32हे प्रभु! तू मेरा स्वामी है और तेरा सेवक तेरे समक्ष यही प्रार्थना करता है |
33ईश्वर के प्रेम में मन एवं तन पवित्र हो जाते है |
34सत्संग में जाने से सर्व सुख प्राप्त हो जाते हैं।
35हे प्रभु! मेरा मन तेरे नाम में ही मग्न रहे।
36हे नानक ! मैं उसे ही कल्यांण समझता हूँ |॥४॥१४॥८३॥
37गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥
38हे मेरी जिव्हा ! हरि-रस के सिवाय अन्य जितने भी रस तू चखती है,
39उनसे तेरी तृष्णा एक क्षण-मात्र के लिए भी दूर नहीं होती।
40यदि तू हरि-रस की मिठास चख ले तो
41तू इसको चखकर चकित हो जाएगी। ॥ १ ॥
42हे मेरी प्रिय जिव्हा! तू हरि-रस रूपी अमृत का पान कर।
43इस हरि-रस के स्वाद में अनुरक्त हुई तू तृप्त हो जाएगी। ॥ १॥ रहाउ ॥
44हे जिव्हा ! तू राम का यशोगान कर।
45क्षण-क्षण तू हरि-परमेश्वर के नाम का ध्यान कर।
46हरि-परमेश्वर के नाम के अलावा कुछ भी सुनना नहीं चाहिए और सत्संगति के अलावा कहीं ओर नहीं जाना चाहिए।
47सत्संग बड़े सौभाग्य से मिलती है ॥ २ ॥
48हे जिव्हा ! आठ प्रहर ही तू अगाध एवं जगत् के ठाकुर पारब्रह्म की आराधना कर।
49यहाँ (इहलोक) और वहाँ (परलोक) तू सदैव सुप्रसन्न रहेगी।
50हे जिव्हा ! प्रभु का यशोगान करने से तू अमूल्य गुणों वाली हो जाएगी। ॥ ३ ॥
51चाहे वनस्पति खिली रहती है और पेड़ों को फल एवं फूल लगे होते हैं
52परन्तु हरि-रस में मग्न हुई जिव्हा इस हरि-रस को नहीं छोड़ती
53चूंकि कोई दूसरे मीठे व नमकीन स्वाद इसके तुल्य नहीं।
54हे नानक ! गुरु मेरे सहायक हो गए हैं। ॥४॥१५॥८४॥
55गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥
56मन एक मन्दिर है और तन को इसके पास मेड़ बनाया गया है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं