गुरु ग्रंथ साहिब 17 · Siree Raag · Guru Nanak Dev Ji
1हे अनंत परमेश्वर ! तुम्हारी रज़ा से सांसारिक क्रिया हेतु आदेश होता है, अन्य निरर्थक बातों का करना निष्फल है।
2सतिगुरु जी का फुरमान है कि यह सत्य स्यरूप अकाल पुरुष किसी अन्य से पूछ कर विचार नहीं करता अर्थात् वह स्वतंत्र शक्ति है ॥ ॥४॥
3हे पिता जी ! अन्य भोग-विलास की निद्रा से मानव ख्वार होता है।
4जिस सोने से तन को पीड़ा हो और मन में विकारों की उत्पत्ति हो, ऐसी निद्रा लेना व्यर्थ है ॥१॥ रहाउ ॥४॥७॥
5श्रीरागु महला १ ॥
6शुभ कर्म करने से शरीर केसर के समान पवित्र है, वैरागमयी वचन बोलने से जिव्हा रत्न समान है तथा निरंकार का यशोगान करने से शरीर में विद्यमान श्वास चंदन की सुगन्ध के समान हैं।
7अठसठ तीर्थों के स्नान-फल का तिलक मस्तिष्क पर शोभायमान होता है, ऐसे संतों की बुद्धि में प्रकाश होता है।
8फिर तो उस प्रकाशमान बुद्धि द्वारा परमेश्वर के गुणों की प्रशंसा की जाए॥ १॥
9हे मानव जीव ! परमेश्वर के ज्ञान के बिना अन्य सांसारिक विकारों में लिप्त बुद्धि व्यर्थ है।
10यदि सौ बार लुभावने पदार्थों को अर्जित किया जाए, तो वे मिथ्या पदार्थ व उनका बल मिथ्या है ॥१॥ रहाउ ॥
11अन्य ज्ञान-बल से पूजा होने लगे, लोग पीर-पीर कहने लगें तथा सम्पूर्ण सृष्टि मिलकर उसके सम्मुख हो जाए।
12अपना नाम भी कहलाए तथा पुनः सिद्धों में भी गिना जाए।
13किन्तु यदि अकाल पुरुष के दरबार में उसकी प्रतिष्ठा स्वीकृत न हो तो उसकी यह सब पूजादि उसे ख्वार करती है ॥ २॥
14जिनको सतिगुरु ने उच्च पद पर आसीन किया है, उन्हें कोई भी नष्ट नहीं कर सकता।
15क्योंकि उनके अंतर्मन में वाहिगुरु नाम का खजाना है और नाम के कारण ही संसार में उनका अस्तित्व है।
16जो सत्य स्वरूप, त्रैकालाबाध, भेद रहित निरंकार है उसके नाम के कारण ही (परमात्मा द्वारा प्रतिष्ठित व्यक्ति) वे पूजनीय व मानने योग्य होते हैं। ॥ ३॥
17जब मानव शरीर (मृत्यु के पश्चात्) धूल में मिल जाता है तब जीवात्मा की दशा कैसी होगी।
18फिर उसकी सभी चतुराइयां जल जाती हैं और वह विलाप करता हुआ यमदूतों के साथ उठ कर चला जाता है।
19सतिगुरु जी कथन करते हैं कि वाहिगुरु का नाम विस्मृत करके यमों के द्वार पर जाने से क्या होता है ॥४॥८॥
20श्रीरागु महला १ ॥
21हे मानव ! जो शुभ गुणों से युक्त संत रूप गुणवती (जीवात्मा) है, वह अकाल पुरुष के गुणों का विस्तार करती है और जो अवगुणों से युक्त मनमुख रूप गुणहीन है. वह पश्चाताप करती है।
22इसलिए यदि जीव रूपी स्त्री पति-परमेश्वर को मिलना चाहती हो तो उसे हृदय में सत्य को धारण करना होगा, क्योंकि झूठ के आश्रय से पति-परमेश्वर प्राप्त नहीं होता।
23उस जीव-स्त्री के पास तृष्णा रूपी नदी पार करने हेतु न तो भक्ति-भाव की नाव है और न ही प्रेम-भाव का तुल्हा (रस्सों से बांध कर | काष्ठ का बनाया हुआ तख्ता) है, इन साधनों के बिना तो वह परमात्मा इतना दूर है कि उसकी प्राप्ति सम्भव नहीं ॥१॥
24मेरा निरंकार सर्व-सम्पन्न है और अचल सिंहासन पर विराजमान है।
25यदि कोई गुरु के उन्मुख होने वाला सद्पुरुष कृपा करे तो अपरिमेय व सत्य स्वरूप परमेश्वर किसी साधक को प्राप्त हो सकता है ॥ १॥ रहाउ॥
26मानव शरीर रूपी परमेश्वर का मंदिर अत्यंत सुंदर है, उसमें चिन्तन रूपी माणिक्य व प्रेम रूपी लाल विद्यमान हैं। वैराग रूपी मोती है, ज्ञान रूपी निर्मल हीरा है तथा धातुओं में श्रेष्ठ स्वर्ण की भाँति यह मानव देह भी एक श्रेष्ठ मनोहर दुर्ग है।
27(यहाँ प्रश्न उत्पन्न होता है कि) इस दुर्ग पर बिना सीढ़ी के कैसे चढ़ा जाए, (सतिगुरु जी उत्तर देते हैं) इस मानव देह रूपी दुर्ग पर चढ़ने हेतु, अर्थात इस मानव शरीर मुक्ति हेतु गुरु द्वारा निरंकार का चिंतन करके प्रसनचित यानि गुरु उपदेश से परमात्मा का नाम सिमरन करके मुक्ति प्राप्त कर ॥२॥
28हे मानव ! (इस दुर्ग पर चढ़ने हेतु) गुरु रूप सीढ़ी, (तृष्णा रूपी नदी पार करने हेतु) गुरु रूप नाव व गुरु रूप तुल्हा और (आवागमन से मुक्ति प्राति हेतु) गुरु द्वारा हरिनाम रूपी जहाज का सहारा लिया जा सकता है, अथवा निरंकार के नाम-सिमरन की प्राप्ति के लिए गुरु-उपदेश रूपी सीढ़ी, नाव व तुल्हा को अपना आश्रय बनाओ।
29गुरु के पास भवसागर पार करने हेतु ज्ञान रूपी जहाज़ है, और गुरु ही पाप कर्मों की निवृति हेतु तीर्थ स्थान व तन शुद्धि हेतु पवित्र दरिया है।
30यदि निरंकार को उस जीव-स्त्री का आचरण भला लगता है तो उसकी बुद्धि निर्मल होती है और वह सत्संगति रूपी सरोवर में स्नान करने जाती है। ॥ ३॥
31वह जो परिपूर्ण निरंकार है उसकी पूर्ण श्रद्धा से उपासना करें तो उस अधिष्ठान स्वरूप अकाल पुरुष में स्थिर हुआ जा सकता है।
32परिपूर्ण परमेश्वर को प्राप्त हुआ मानव जीव शोभायमान होकर निराश व्यक्तियों की आशाएँ पूर्ण करने के समर्थ हो जाता है।
33सतिगुरु जी कथन करते हैं कि वह परिपूर्ण अकाल पुरुष जिसको प्राप्त हो जाए तो उसके शुभ गुणों में कमी कैसे आ सकती है ॥४॥९ ॥
34श्रीरागु महला १ ॥
35हे सत्संगेिनी बहन ! आओ, मेरे गले मिलो, क्योंकि हम एक ही पति-परमेश्वर की सखियाँ हैं।
36हम दोनों मिलकर उस सर्वशक्तिमान निरंकार पति की कीर्ति की बातें करें,
37उस सत्य स्वरूप वाहिगुरु में सर्वज्ञानादि के सभी गुण हैं और हम में सभी अवगुण ही हैं।॥ १॥
38हे कर्ता पुरुष ! सृष्टि तेरी शक्ति के कारण ही है।
39जब एकमेव अद्वितीय ब्रह्म का विचार करें तो तू ही तू व्यापक हैं फिर अन्य किसी की क्या आवश्यकता है ॥ १॥ रहाउ ॥
40हे सखियों ! जिन्हें पति-परमेश्वर की प्राप्ति हुई है, सौभाग्यवती स्त्रियों से जाकर पूछो कि तुम ने कौन से गुणों के कारण पति-परमेश्वर को प्राप्त है, अर्थात् ब्रह्मानंद का उपभोग किया है।
41(प्रत्युत्तर में कहा है कि) संतोष धारण करने व मधुर-वाणी के कारण स्वाभाविक ही श्रृंगारित हुई हैं।
42जिज्ञासु रूपी स्त्री जब गुरु का उपदेश श्रवण-करे तब उसे सुन्दर स्वरूप अकाल पुरुष रूपी पति मिलता है।॥ २॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं