सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 179 · Raag Gauree · Guru Arjan Dev Ji

1हे मेरे मन ! ईश्वर के नाम का आश्रय लो।

2तुझे हवा का गर्म झोका भी स्पर्श नहीं करेगा। ॥ १॥ रहाउ ॥

3जैसे भयानक सागर में जहाज सहायक होता है,

4जैसे दीपक अंधेरे में उजाला कर देता है,

5जैसे अग्नि सर्दी की पीड़ा को दूर कर देती है,

6वैसे ही नाम-स्मरण से मन को शांति प्राप्त हो जाती है। २ ॥

7नाम-सिमरन से तेरे मन की तृष्णा बुझ जाएगी,

8समस्त आकांक्षा पूर्ण हो जाएँगी,

9तेरा मन डावांडोल नहीं होगा,

10यदि हे मित्र ! तू गुरु की दया से नाम अमृत का स्मरण करे। ॥३॥

11केवल वही मनुष्य नाम रूपी औषधि प्राप्त करता है,

12जिसे प्रभु स्वयं दया धारण करके गुरु से दिलवाता है।

13हे नानक ! जिसके हृदय में हरि-परमेश्वर का नाम निवास करता है,

14उसके दुःख-दर्द दूर हो जाते हैं ॥ ४॥ १०॥ ७९॥

15गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥

16अधिकतर धन संग्रह करने से भी इन्सान का मन तृप्त नहीं होता।

17अनेक रूपसियों का सौन्दर्य देखकर भी इन्सान संतुष्ट नहीं होता।

18अपने पुत्र एवं पत्नी के मोह में मेरे प्राण उलझे हुए हैं।

19मेरी धन-दौलत सब नाश हो जाएगी और वह संबधी राख का अम्बार हो जायेंगे ॥१॥

20हरि-भजन के बिना में प्राणियों को विलाप करते देखता हूँ।

21जो व्यक्ति माया के मोह में मग्न रहते हैं, उनका तन एवं मन धिक्कार योग्य है ॥१॥ रहाउ॥

22जैसे जैसे धन दौलत की पोटली बेगारी के सिर पर रख दी जाती है,

23वह धन दौलत की पोटली स्वामी के घर पहुँच जाती है परन्तु बेगारी भार उठाने का कष्ट सहन करता है।

24जैसे स्वप्न में साधारण पुरुष राजा बनकर विराजमान हो जाता है

25परन्तु जब वह अपने नेत्र खोलता है, तो उसका सारा कार्य व्यर्थ हो जाता है ॥२॥

26जैसे कोई रखवाला फसल की रक्षा करता है,

27फसल तो स्वामी की बन जाती है और रखवाला उठ कर अपने घर चला जाता है |

28उस फसल के कारन रखवाला अधिक कष्ट सहन करता है,

29परन्तु उसमें आखिर उसे कुछ नहीं मिलता ॥ ३॥

30जिस प्रभु का दिया हुआ शासन मिलता है। उसी का दिया हुआ स्वप्न भी होता है।

31जिसने धन-दौलत प्रदान की है, उसने ही इसलिए तृणा उत्पन्न की है।

32परमेश्वर स्वयं प्राणी का विनाश करता है और स्वयं ही उसका मनोरथ सफल करता है।

33हे नानक ! प्रभु के समक्ष प्रार्थना किया कर॥ ४ ॥ ११॥ ८०॥

34गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥

35बहुरंगी मोहिनी मैंने अनेक विधियों से लुभाती हुई देखी है।

36अनेक विद्वानों ने अपनी कलम से कागज पर प्रवीण बातें लिखी हैं।

37मैंने कुछ लोगों को चौधरी, राजा और सामन्त बनते देखा है।

38परन्तु ऐसा बन जाने पर भी उनका मन तृप्त नहीं हुआ। १॥

39हे सन्तजनो ! मुझे वह सुख बताएँ,

40जिससे तृष्णा मिट जाए और मन तृप्त हो जाए। १॥ रहाउ॥

41चाहे मेरे पास वायुगतिगामी घोड़ों एवं हाथियों की सवारी हो,

42चन्दन का इत्र, सुन्दर नारियों की सेज हो,

43रंगभूमि में नटों के नाटक, मेरे लिए गाने वाले कलाकार हों,

44परन्तु उन में से हृदय को संतोष प्राप्त नहीं होता। २॥

45राजसिंहासन, राजकीय दरबार, आभूषण, गलीचे,

46समूह फल, सुन्दर उद्यान,

47आखेट का शौक और राजाओं की क्रीड़ाएँ-मनोरंजन,

48ऐसे झूठे प्रयासों से हृदय प्रसन्न नहीं होता। ३ ।

49संतों ने कृपा करके यह सत्य ही कहा है

50कि यह आनंद एवं सर्व सुख वही मनुष्य प्राप्त करता है,

51जो संतों की संगति करके भगवान का कीर्तन गायन करता है।

52हे नानक! संतो की संगती सौभाग्यवश ही मिलती है

53जिसके पास हरि नाम रूपी धन है,

54वही सुप्रसन्न है। प्रभु की दया से संतों की संगति प्राप्त होती है। १॥ रहाउ दूजा ॥१२ ॥ ८१॥

55गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं