गुरु ग्रंथ साहिब 176 · Raag Gauree · Guru Arjan Dev Ji
1मनुष्य अपने हाथी और घोड़े देखकर बड़ा प्रसन्न होता है।
2वह भारी भरकम फौज इकट्ठी करता है और मंत्री तथा शाही नौकर रखता है
3लेकिन यह सबकुछ अहंकार की फाँसी रूपी रस्सी है जो उसके गले में पड़ जाती है॥ २॥
4दसों दिशाओं में शासन करना,
5अनेक भोगों में आनंद प्राप्त करना अधिकतर नारियों से भोग विलास करना
6एक भिखारी के स्वप्न में राजा बनने के सामान है। ॥३॥
7सतिगुरु ने मुझे सुखी होने की एक विधि बताई है।
8वह विधि यह है कि जो कुछ भी ईश्वर करता है, वह प्रभु के भक्तों को अच्छा लगता है।
9हे नानक ! गुरमुख अपने अहंकार को मिटा कर प्रभु में समा जाता है। ॥४ ॥
10हे मेरे भाई! इस विधि से सुखी हुआ जाता है
11और इस तरह सहायक प्रभु पाया जाता है॥ १॥ रहाउ दूजा ॥
12गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥
13हम क्यों भ्रम करें ? किस बात का भ्रम करना है?
14जब वह प्रभु जल, थल, धरती और आकाश में विद्यमान हो रहा है।
15गुरमुख भवसागर से बच जाते हैं परन्तु स्वेच्छाचारी अपनी प्रतिष्ठा गंवा लेते हैं। ॥१॥
16जिसकी दया का घर राम स्वयं रक्षा करता है,
17उसकी समानता कोई दूसरा नहीं कर सकता १॥ रहाउ ॥
18समस्त जीवों में एक अनन्त परमेश्वर व्यापक हो रहा है।
19इसलिए तू निश्चिंत होकर सुख से सो जा।
20संसार में जो कुछ हो रहा है प्रभु सब कुछ जानता है। ॥२॥
21जिन स्वेच्छाचारी जीवों को माया की तृष्णा लग जाती है, वे माया के मोह में फंसकर मरते हैं।
22वह अनेक योनियों में भटकते रहते हैं। उनकी केिरमत में प्रारम्भ से ही ऐसा कर्म-लेख लिखा होता है।
23जैसा वह बोते हैं (कर्म करते हैं), वैसा ही वह खाते हैं। ॥३ ॥
24प्रभु के दर्शन प्राप्त करके मेरा हृदय प्रसन्न हो गया है।
25अब में सर्वत्र परमेश्वर का प्रकाश देखता हूँ।
26नानक की प्रभु ने अभिलाषा पूर्ण कर दी है। ॥४॥२॥७१॥
27गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥
28हे प्राणी ! तू अनेकों जन्मों में कीड़ा और पतंगा बना हुआ था।
29अनेकों जन्मों में तू हाथी, मछली एवं मृग था।
30अनेक योनियों में तू पक्षी एवं सर्प बना था।
31अनेक योनियों में तू घोड़ा और बैल बनकर जोता गया था। १ ॥
32अब तुझे मानव-जन्म में जगत् के ईश्वर को मिलने का समय मिला है,
33अतः तू उसे मिल, चिरकाल पश्चात् यह मानव-जन्म तुझे प्राप्त हुआ है। १॥ रहाउ॥
34अनेक योनियों में तू चट्टान एवं पहाड़ों में उत्पन्न किया गया था।
35अनेक जन्मों में तेरी माँ का गर्भ ही गिर गया था।
36अनेक योनियों में तू वनस्पति बन कर उत्पन्न किया गया था।
37इस तरह तू चौरासी लाख योनियों में भटकाया गया था। २॥
38अब तुझे अमूल्य मानव जीवन मिला है। अतः तू संतों की संगति किया कर।
39तू संतों की निष्काम सेवा किया कर और गुरु की मति द्वारा हरि-परमेश्वर का भजन कर।
40तू अपना अहंकार, झूठ एवं अभिमान त्याग दे।
41यदि तू अपने अहंकार को नष्ट कर देगा तो ही प्रभु के दरबार में स्वीकृत होगा। ॥३ ॥
42हे परमात्मा ! जो कुछ भी हुआ है अथवा होगा, वह तुझ पर निर्भर है।
43दूसरा कोई उसको करने में समर्थ नहीं।
44हे प्रभु! यदि तू मिलाए तो केवल तभी मनुष्य तुझे मिलता है।
45हे नानक ! हे प्राणी ! तू हरि-परमेश्वर का यश-गायन कर ॥ ४॥ ३॥ ७२॥
46गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥
47हे प्राणी ! शरीर रूपी कर्म-भूमि में तू नाम का बीज बो।
48तेरा कर्म सफल हो जाएगा।
49तुम फल (मोक्ष) प्राप्त कर लोगे और तेरा मृत्यु का भय दूर हो जाएगा।
50इसलिए हमेशा प्रभु-परमेश्वर के गुण एवं उपमा गायन कर।
51हरि-परमेश्वर के नाम को तू अपने हृदय एवं मन से लगाकर रख और
52शीघ्र ही अपने कार्य संवार लो। ॥१॥रहाउ ॥
53अपने प्रभु की सेवा के लिए सदा सावधान रह।
54तब तुझे उसके दरबार में प्रतिष्ठा प्राप्त होगी।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं