गुरु ग्रंथ साहिब 175 · Raag Gauree · Guru Raam Daas Ji
1हे मेरे गोविन्द! कोई सौभाग्यशाली मनुष्य ही सत्संग में जुड़ता है। हे नानक ! प्रभु के नाम से उसके जीवन मनोरथ सफल हो जाते हैं।॥४ ॥ ४ ॥ ३० ॥ ६८॥
2गउड़ी माझ महला ४ ॥
3हे भद्रपुरुषो ! हरि ने मुझे हरि-नाम की प्रेम-प्यास लगा दी है।
4यदि मेरा मित्र हरि-प्रभु मुझे मिल जाए तो मुझे बड़ा सुख उपलब्ध होगा।
5हे मेरी माँ! मैं हरि को देख कर ही जीवित रहती हूँ।
6हरि का नाम मेरा सखा एवं भाई है॥ १॥
7हे पूज्य संतो ! मेरे हरि-प्रभु का यश-गायन करो।
8गुरु के माध्यम से प्रभु के नाम का जाप करने से भाग्य उदय हो जाते हैं।
9हरि-परमेश्वर का नाम और हरि मेरे प्राण एवं आत्मा हैं।
10नाम का जाप करने से मुझे दोबारा भवसागर पार नहीं करना पड़ेगा। ॥२॥
11मेरे मन एवं तन में बड़ा चाव बना हुआ है कि मैं कैसे हरि-प्रभु के दर्शन करें?
12हे संतजनो ! मुझे हरि से मिला दीजिए। मेरे मन में हरि के लिए प्रेम उत्पन्न हो गया है।
13गुरु के शब्द से प्रियतम प्रभु प्राप्त होता है।
14हे सौभाग्यशाली प्राणी! तू प्रभु के नाम का जाप कर॥ ३ ॥
15मेरे मन एवं तन में गोविन्द प्रभु के मिलन की बड़ी लालसा बनी हुई है।
16हे संतजनो ! मुझे गोविन्द प्रभु से मिला दीजिए, जो मेरे पास ही रहता है।
17सतिगुरु की शिक्षा द्वारा हमेशा जीव के हृदय में नाम का प्रकाश होता है।
18हे नानक ! मेरे मन की अभिलाषा पूरी हो गई है॥ ४॥ ५ ॥ ३१॥ ६९॥
19गउड़ी माझ महला ४ ॥
20यदि मुझसे जुदा हुआ प्रिय नाम मुझे मिल जाए तो ही में जीवित रह सकता हूँ।
21मेरे मन में नाम रूपी अमृत है। गुरु के उपदेश से मैं हरि से यह नाम लेता हूँ।
22मेरा मन हरि के प्रेम में अनुरक्त है। मैं सदैव हरि-रस का पान करता रहता हूँ।
23मैंने प्रभु को हृदय में पा लिया है, इसलिए मैं जीवित हूँ। १॥
24हरि का प्रेम रूपी तीर मेरे मन एवं तन में लग गया है।
25मेरा प्रिय मित्र हरि पुरुष बहुत चतुर है।
26कोई संत गुरु ही जीव को चतुर एवं दक्ष हरि से मिला सकता है।
27मैं हरि के नाम पर बलिहारी जाता हूँ॥ २ ॥
28मैं अपने सज्जन एवं मित्र हरि-परमेश्वर का पता पूछता हूँ।
29हे संतजनों! हरि के बारे में बताओ, मैं हरि की खोज करता रहता हूँ।
30यदि सतिगुरु प्रसन्न होकर मुझे बता दें तो मैं हरि को पा सकता हूँ
31और हरि के नाम द्वारा हरि-नाम में ही समा सकता हूँ।॥३॥
32हरि ने मेरे अन्तर्मन में प्रेम वेदना लगा दी है।
33गुरु ने मेरी श्रद्धा पूरी कर दी है और मेरे मुँह में नाम रूपी अमृत डाल दिया है।
34हे हरि ! मुझ पर दयालु हो जाओ। चूंकि मैं हरि-नाम का ध्यान करता रहूँ।
35नानक ने तो हरि रस पा लिया है ॥४॥६॥२०॥१८॥३२॥७०॥
36महला ५ रागु गउड़ी गुआरेरी चउपदे
37ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।
38हे मेरे भाई! किस विधि से आत्मिक सुख उपलब्ध हो सकता है।
39उस सहायक हरि को कैसे पाया जा सकता है। १॥ रहाउ॥
40यदि मनुष्य के घर में दुनिया की तमाम दौलत आ जाए और वह यह माने यह सारी दौलत मेरी ही है तो भी उसे सुख उपलब्ध नहीं होता।
41यदि मनुष्य के पास ऊँचे महल और छाया वाले सुन्दर बाग हो तो
42वह इनके झूठे लालच में फँसकर अपना जन्म व्यर्थ ही गंवा देता है। ॥१॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं