गुरु ग्रंथ साहिब 174 · Raag Gauree · Guru Raam Daas Ji
1हे मेरे गोविन्द ! संतजनों से मिलकर मैंने अपने मित्र एवं सज्जन हरि-प्रभु को पा लिया है।
2हे मेरे गोविन्द! जगजीवन हरि आकर मुझे मिल गया है और अब मेरी जीवन रूपी रात्रि सुख से बीत रही है। ॥२॥
3हे संतजनो ! मुझे मेरे सज्जन हरि-प्रभु से मिलाओ। मेरे मन एवं तन को उसके मिलन की भूख लगी हुई है।
4मैं अपने प्रियतम के दर्शनों के बिना जीवित नहीं रह सकती। मेरे मन में प्रभु की जुदाई की पीड़ा विद्यमान है।
5सम्राट प्रभु मेरा सर्वप्रिय मित्र है। गुरदेव ने मुझे उनसे मिला दिया है और मेरा मन पुनः जीवित होकर ईश्वर-परायण हो गया है।
6मेरे मन एवं तन की आशाएँ पूर्ण हो गई हैं। हे मेरे गोविन्द! ईश्वर को मिलने से मेरे मन को शुभकामनाएँ मिल रही हैं। ॥३॥
7हे मेरे प्रिय गोविन्द! मैं तुझ पर तन एवं मन से कुर्बान हूँ।
8हे मेरे गोविन्द! मेरे मन एवं तन में मेरे प्रियतम-पति की प्रीति है। हे प्रभु! मेरी प्रेम रूपी पूँजी की रक्षा कीजिए।
9हे मेरे गोविन्द! मुझे मेरे मध्यस्थ सतिगुरु से मिला दो, जो अपने मार्गदर्शन से मुझे परमेश्वर से मिला देगा।
10हे मेरे गोविन्द ! तेरी दया से मैंने हरि का नाम प्राप्त किया है। नानक ने तेरी ही शरण ली है॥४॥३॥२९॥६७॥
11गउड़ी माझ महला ४ ॥
12हे मेरे प्रिय गोविन्द! तू बड़ा विनोदी है, मेरा प्रभु-परमेश्वर विनोदी है।
13परमेश्वर ने स्वयं ही कृष्ण को उत्पन्न किया है। हरि स्वयं ही कृष्ण को खोजने वाली गोपी है।
14हे मेरे गोविन्द ! ईश्वर स्वयं ही समस्त शरीरो में पदार्थो को भोगता है वह स्वयं ही रस भोगने वाला भोगी है,
15हे मेरे गोविन्द ! हरि स्वयं ही चतुर एवं अचूक है। वह स्वयं ही भोगों से निर्लिप्त सतिगुरु है। १॥
16हे मेरे गोविन्द ! ईश्वर स्वयं सृष्टि की रचना करता है और स्वयं ही अनेकों विधियों से खेलता है।
17हे मेरे गोविन्द! कई प्राणियों को वह नियामतें प्रदान करता है, जिससे वे आनंद प्राप्त करते हैं और कई प्राणी नग्न होकर (जिनके तन पर वस्त्र नहीं) नंगे भटकते फिरते हैं।
18हे मेरे गोविन्द! ईश्वर स्वयं सृष्टि की रचना करता है और माँगने वाले समस्त प्राणियों को दान प्रदान करता है,
19हे मेरे गोविन्द! भक्तों को प्रभु-नाम का ही आधार है और वे श्रेष्ठ हरि कथा की माँग करते रहते हैं॥ २॥
20हे मेरे गोविन्द ! ईश्वर स्वयं ही भक्तों से अपनी भक्ति करवाता है और अपने भक्तों की मनोकामनाएँ पूरी करता है।
21हे मेरे गोविन्द ! हरि जल-थल सर्वत्र विद्यमान है। वह सर्वव्यापक है और कहीं दूर नहीं रहता।
22हे मेरे गोविन्द ! भीतर एवं बाहर प्रभु स्वयं ही विद्यमान है। ईश्वर स्वयं ही समस्त स्थानों को परिपूर्ण कर रहा है।
23हे मेरे गोविन्द ! राम स्वयं ही इस जगत्-प्रसार को प्रसारित कर रहा है। प्रभु स्वयं निकट से सभी को देखता है॥ ३॥
24हे मेरे गोविन्द! प्राणियों के भीतर पवन का नाद (बज रहा) है। जैसे ईश्वर स्वयं इसको बजाता है, वैसे ही यह गूंजता है।
25हे मेरे गोविन्द! हम जीवों के अन्तर्मन में नाम रूपी खजाना है। गुरु के उपदेश से हरि-प्रभु प्रकट हो जाता है।
26हे मेरे गोविन्द! ईश्वर स्वयं ही मनुष्य को अपनी शरणागत में प्रवेश करवाता है और भक्तजनों की लाज रखता है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं