गुरु ग्रंथ साहिब 173 · Raag Gauree · Guru Raam Daas Ji
1हे सौभाग्यशाली ! राम से मिल॥ १॥
2मैं, योगी गुरु परमेश्वर से मिल गया हूँ और उसके रंग में आनंद प्राप्त करता हूँ।
3गुरु परमेश्वर के प्रेम में मग्न रहता है और सदैव पावन-पवित्र है।
4सौभाग्य से मैं चतुर एवं सर्वज्ञ प्रभु से मिल गया हूँ।
5मेरा मन एवं तन परमेश्वर के रंग में मग्न है। ॥२॥
6हे संतजनों! आओ हम मिलकर प्रभु के नाम का जाप करें।
7हम सत्संगति में मिलकर सदैव नाम रूपी लाभ प्राप्त करें।
8संतों की सेवा करके हम अपने मुख में नाम रूपी अमृत डालें।
9प्रारम्भ से किस्मत में पूर्व कर्मों के लिखे लेखों अनुसार प्रभु से जा मिलो। ॥३॥
10श्रावण के महीने में नाम अमृत वाला बादल जगत् पर छाया हुआ है।
11नाम अमृत को चखकर मेरे मन का मोर प्रसन्न होकर चहचहाने लग गया।
12जब हरि-नाम रूपी अमृत मेरे हृदय में आ बसा तो मुझे प्रभु-परमेश्वर मिल गया।
13हे नानक ! मैं प्रभु की प्रीति में मग्न हो गया हूँ। ४ ॥ १ ॥ २७॥ ६५॥
14गउड़ी माझ महला ४ ॥
15हे मेरी सत्संगी सखियों ! आओ, हम प्रभु को वश में करने के लिए शुभ गुणों के जादू-टोने तैयार करें और
16संतजनों से मिलकर हम प्रभु-प्रेम का सुख एवं आनंद भोगें।
17मेरे हृदय में गुरु के ज्ञान का दीपक सदैव प्रज्वलित रहता है।
18अति प्रसन्न एवं दया से कोमल होकर प्रभु मुझे मिल गया है॥ १॥
19मेरे मन एवं तन में प्रियतम प्रभु का प्रेम लगा हुआ है।
20मेरी यही कामना है कि मध्यस्थ सतिगुरु मुझे मेरे प्रिय मित्र प्रभु से मिला दे।
21मैं अपना मन उन संतो को अर्पण कर दूँगा जो मुझे मेरे प्रभु से मिला देंगे।
22प्रभु पर मैं सदैव कुर्बान जाताहूँ ॥ २॥
23हे मेरे प्रिय गोविन्द! मेरे मन में आकर निवास करो। हे प्रभु! कृपा करके मेरे मन में आकर निवास करो।
24हे मेरे गोविन्द! मुझे मनोवांछित फल मिल गया है। पूर्ण गुरु के दर्शन करके मैं अत्यंत प्रसन्न हो गई हूँ।
25हे मेरे गोविन्द! मुझे गुरु से हरि-नाम मिल गया है और मैं सुहागिन बन गई हूँ। अब मेरे मन में दिन-रात प्रसन्नता एवं आनंद बना रहता है।
26हे मेरे गोविन्द! बड़े भाग्य से मैंने प्रभु को पाया है और मैं नित्य ही नाम रूपी लाभ प्राप्त करके अपने मन में मुस्कराती रहती हूँ॥ ३ ॥
27भगवान ने स्वयं ही जीवों को उत्पन्न किया है और वह स्वयं ही उनकी देखभाल करता है। भगवान ने स्वयं ही जीवों को कामकाज में लगाया है।
28कई प्रभु की नियामतें सेवन करते हैं, जिनमें कभी कमी नहीं आती और कइयों को केवल मुट्ठी भर दानों की मिलती है।
29भगवान ने कई जीवों को राजा बनाया है, वे राजसिंघासन पर विराजमान होते हैं और सदा ही सुखी रहते हैं और भगवान कई जीवों को भिखारी बनाकर उनसे दर-दर से भीख मंगवाता है।
30हे मेरे गोविन्द ! सर्वत्र एक तेरा ही नाम विद्यमान है। हे नानक ! प्रभु का सेवक प्रभु नाम का ही ध्यान करता है ॥४॥२॥२८॥६६॥
31गउड़ी माझ महला ४ ॥
32हे मेरे गोविन्द! मैं अपने मन में ही हरि-रंग में मग्न हो गया हूँ।
33हरि रंग प्रत्येक जीव के भीतर उसके साथ ही रहता है परन्तु उसे देखा नहीं जा सकता। हे मेरे गोविन्द! पूर्ण गुरु ने मुझे अदृश्य प्रभु के दर्शन करा दिए हैं।
34हे मेरे गोविन्द! जब गुरु ने मेरे हृदय में हरि-परमेश्वर के नाम का प्रकाश कर दिया तो मेरी दरिद्रता के तमाम दुख निवृत्त हो गए।
35हे मेरे गोविन्द! मैंने हरि-मिलन की उच्च पदवी प्राप्त कर ली है और बड़े भाग्य से मैं हरि के नाम में लीन हो गया हूँ। ॥१॥
36हे मेरे प्रिय गोविन्द! हरि-प्रभु को किसी विरले पुरुष ने ही अपने नेत्रों से देखा है।
37हे मेरे गोविन्द! मेरा मन एवं तन तेरे विरह में वैराग्यवान हो गया है। मालिक-प्रभु के बिना मैं जीव-स्त्री बहुत उदास हो गई हूँ।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं