गुरु ग्रंथ साहिब 169 · Raag Gauree · Guru Raam Daas Ji
1अनन्त, सर्वशक्तिमान एवं अतुलनीय प्रभु-परमेश्वर सारे जगत् के निकट ही रहता है।
2उस ईश्वर को पूर्ण गुरु ने मेरे हृदय में ही प्रकट किया है, (इसलिए) मैंने अपना सिर गुरु के पास बेच दिया है॥ ३॥
3हे पूज्य परमेश्वर ! तू जीवों के अन्दर एवं बाहर सर्वत्र विद्यमान है और अन्दर एवं बाहर मैं तेरी शरण में हूँ, (मेरे लिए) तुम दुनिया के सबसे बड़े महापुरुष हो।
4जन नानक मध्यस्थ-सतिगुरु से मिलकर रात-दिन प्रभु की महिमा-स्तुति करता रहता है ॥ ४॥ १॥ १५॥ ५३॥
5गउड़ी पूरबी महला ४ ॥
6हे प्रभु ! तू जगत् का जीवन, अपरम्पार एवं हम सबका स्वामी है। हे जगदीश्वर ! तुम सर्वशक्तिमान एवं भाग्यविधाता हो।
7हे मेरे स्वामी ! हम प्राणियों को तुम जिस मार्ग की भी प्रेरणा करते हो, उसी मार्ग में हम चलते हैं।॥१॥
8हे मेरे राम ! मेरा मन प्रभु के प्रेम में मग्न हो गया है।
9सत्संग में मिलकर मैंने राम रस प्राप्त किया है और अब मेरा मन हरि-राम के नाम में लीन रहता है।॥ १॥ रहाउ ॥
10हरि-परमेश्वर का नाम जगत् में समस्त रोगों की औषधि है। हरि-परमेश्वर का नाम सदैव सत्य है।
11जो व्यक्ति गुरु के उपदेश से राम रस को चखते हैं, उनके तमाम पाप एवं दोष नाश हो जाते हैं।॥ २॥
12जिनके मस्तक पर विधाता ने प्रारम्भ से ही ऐसा भाग्य लिख दिया है, वह गुरु रूपी संतोष सरोवर में स्नान करते हैं।
13जो राम-नाम के प्रेम में मग्न रहते हैं, उनकी मंदबुद्धि में से पापों की तमाम मैल दूर हो जाती है॥ ३॥
14हे मेरे राम ! तुम स्वयं ही सबकुछ हो। तुम स्वयं ही समस्त जीवों के ठाकुर हो और तेरे जैसा महान दाता दूसरा कोई नहीं।
15नानक केवल ईश्वर का नाम लेने से ही जीता है। प्रभु की दया से ही प्रभु का जाप होता है॥ ४॥ २॥ १६॥ ५४॥
16गउड़ी पूरबी महला ४ ॥
17हे जगजीवन ! हे दाता ! मुझ पर अपनी ऐसी कृपा करो कि मेरा मन प्रभु की स्मृति में लीन रहे।
18सतिगुरु ने मुझे अत्यन्त निर्मल वचन किया है और हरि-परमेश्वर के नाम का जाप करने से मेरा मन प्रसन्न हो गया है॥ १॥
19हे मेरे राम ! मेरा मन एवं तन सच्चे परमेश्वर ने बाँध लिया है।
20हे हरि-परमेश्वर ! गुरु-सतिगुरु के उपदेश से मैं उस काल (मृत्यु) से बच गया हूँ, जिसके मुख (पंजे) में सारा जगत् फँसा हुआ है॥ १॥ रहाउ॥
21जिनकी प्रीति परमेश्वर से नहीं, वह अधर्मी, मूर्ख एवं झूठे पुरुष हैं।
22वह जन्म एवं मृत्यु का अत्यंत भारी दुख उठाते हैं और बार-बार जन्मते-मरते और विष्टा में सड़ते रहते हैं।॥ २॥
23हे प्रभु! तुम दया के घर एवं शरणार्थियों के पालनहार हो। हे ठाकुर ! मैं याचना करता हूँ कि मुझे अपने प्रेम का दान प्रदान करो।
24मुझे प्रभु के सेवकों का सेवक बना दे, चूंकि मेरा मन प्रेम धारण करके नृत्य करे॥ ३॥
25हे मेरे स्वामी प्रभु ! तू स्वयं ही बड़ा साहूकार है और मैं तेरा व्यापारी हूँ।
26मेरा मन, तन एवं जीवन सब कुछ तेरी ही पूंजी है। हे सच्चे प्रभु ! तुम नानक के साहूकार हो॥ ४॥ ३॥ १७॥ ५५॥
27गउड़ी पूरबी महला ४ ॥
28हे प्रभु ! तुम बड़े दयालु एवं सर्व दुःखों का नाश करने वाले हो। अतः मेरी एक प्रार्थना ध्यानपूर्वक सुनो ।
29हे मेरे स्वामी हरि ! मुझ उस सतगुरु से मिला दो जिसकी कृपा से तुझे जाना जाता है और जो मेरे प्राण हैं।॥ १॥
30हे मेरे राम ! मैं सतिगुरु को पारब्रह्म कह कर मानता हूँ।
31मैं मूर्ख, मक्कार और खोटी बुद्धि वाला हूँ। हे ईश्वर ! मैंने तुझे सतिगुरु की वाणी से जान लिया है॥ १॥ रहाउ ॥
32संसार के जितने भी विभिन्न रस हैं, मैंने देख लिए हैं परन्तु ये सभी बिल्कुल फीके हैं।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं