गुरु ग्रंथ साहिब 168 · Raag Gauree
1गउड़ी बैरागणि महला ४ ॥
2जैसे माता पुत्र को जन्म देकर उसकी परवरिश करती है और उसको अपनी दृष्टि में रखती है। |
3घर के भीतर एवं बाहर वह उसके मुख में ग्रास देती है और क्षण-क्षण उसको दुलारती है।
4वैसे ही सतिगुरु अपने सिक्खों को भगवान का प्रेम-प्यार देकर रखते हैं।॥ १॥
5हे मेरे राम ! हम हरि-प्रभु के नादान बच्चे हैं।
6गुरु-सतिगुरु उपदेश-दाता धन्य-धन्य है, जिसने हमें हरि-नाम का उपदेश देकर बुद्धिमान बना दिया है॥ १॥ रहाउ॥
7जैसे श्वेत पंखों वाली (चिड़िया) गगन में उड़ती फिरती है,
8परन्तु उसका मन अपने पीछे छोड़े बच्चों में अटका रहता है और अपने मन में सदा उन्हें स्मरण करती है,
9वैसे ही सतिगुरु गुरु के सिक्ख में हरि-प्रभु का प्रेम दे कर गुरु सिक्ख को अपने हृदय से लगाकर रखते हैं।॥ २॥
10जैसे परमेश्वर माँस एवं रुधिर की बनी हुई जिव्हा को तीस अथवा बत्तीस दांतों की कैंची में से रक्षा करता है।
11कोई यह न समझे कि इस तरह करना जिव्हा अथवा कैंची के कुछ वश में है। प्रत्येक वस्तु परमेश्वर के वश में है।
12इसी तरह ही मनुष्य संतजनों की आलोचना-निन्दा करता है तो परमेश्वर अपने सेवक की प्रतिष्ठा को बचाता है॥ ३ ॥
13मेरे भाइओ ! कोई यह न समझे कि किसी के कुछ वश में है। सभी लोग वहीं कर्म करते है, जो परमेश्वर उनसे करवाता है।
14बुढ़ापा, मृत्यु, बुखार, सिर-दर्द एवं ताप सभी रोग परमेश्वर के वश में हैं। परमेश्वर के हुक्म के बिना कोई रोग प्राणी को स्पर्श नहीं कर सकता।
15हे दास नानक ! अपने चित्त एवं मन में ऐसे परमात्मा के नाम का नित्य ध्यान करो जो अन्तिमं समय (यम इत्यादि से) मुक्ति करवाता हे॥ ४॥ ७॥ १३॥ ५१ ॥
16गउड़ी बैरागणि महला ४ ॥
17जिसको मिलने से मन को खुशी मिलती है, उसे ही सतिगुरु कहा जाता है।
18मन की दुविधा दूर हो जाती है और हरि के परमपद की प्राप्ति हो जाती है। १॥
19मेरा प्रिय सतिगुरु मुझे किस विधि से मिल सकता है?
20मैं उस गुरु को क्षण-क्षण प्रणाम करता रहता हूँ। मुझे मेरा पूर्ण गुरु कैसे मिल सकता हैं?॥ १॥ रहाउ॥
21अपनी कृपा करके ईश्वर ने मुझे मेरे पूर्ण सतिगुरु से मिला दिया है।
22सतिगुरु की चरण-धूलि प्राप्त करने से उसके सेवक की कामना पूर्ण हो गई है॥ २ ॥
23मनुष्य को उस सतिगुरु से मिलना चाहिए, जिससे वह भगवान की भक्ति के बारे में सुने एवं उसे भगवान की भक्ति हृदय में दृढ़ करवा दे।
24उससे मिलकर मनुष्य हमेशा ही भगवान का नाम रूपी लाभ प्राप्त करता रहता है और उसे बिल्कुल ही कोई कमी नहीं आती॥ ३॥
25जिसके हृदय में प्रसन्नता विद्यमान है और परमात्मा के सिवाय कोई मोह नहीं,
26हे नानक ! उस गुरु से मिलकर मनुष्य भवसागर से पार हो जाता है, जो ईश्वर का यशोगान करवाता है॥ ४ ॥ ८ ॥ १४ ॥ ५२ ॥
27महला ४ गउड़ी पूरबी ॥
28दयालु हरि-परमेश्वर ने मुझ पर अपनी दया की है और उसने मेरे मन, तन एवं मुँह में हरि की वाणी डाल दी है।
29मेरी हृदय रूपी चोली हरि-रंग में भीग गई है। गुरु का आश्रय लेकर वह रंग बहुत गहरा हो गया है॥ १॥
30मैं अपने प्रभु-परमेश्वर की दासी हूँ।
31जब प्रभु के साथ मेरा मन प्रसन्न हो गया तो उसने सारे जगत् को मेरा बिना मूल्य दास बना दिया।॥ १॥ रहाउ॥
32हे सन्तजनो, भाइओ ! विचार करो ! अपने ह्रदय में ही खोज-तलाश करके ईश्वर को देख लो।
33यह सारी दुनिया भगवान का रूप है और समस्त जीवों में उसकी ही ज्योति विद्यमान है। भगवान प्रत्येक जीव के निकट एवं पास ही निवास करता है ॥ २॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं