गुरु ग्रंथ साहिब 167 · Raag Gauree · Guru Raam Daas Ji
1मनुष्य को जितनी ज्यादा भूख दूसरे रसों एवं आस्वादनों के लिए है उतनी अधिक भूख (लालसा) उसे बार-बार लगती है।
2जिस पर परमात्मा कृपा-दृष्टि करता है, वह अपना शीश गुरु के समक्ष बेच देता है।
3हे नानक ! जो व्यक्ति हरि-रस से तृप्त हो जाता है, उसे दोबारा भूख नहीं लगती ॥ ४॥ ४॥ १०॥ ४८ ॥
4गउड़ी बैरागणि महला ४ ॥
5हे भगवान ! मेरे मन एवं चित्त में सदैव ही यह उम्मीद बनी रहती है। मैं कैसे हरि-दर्शन करूं ?
6जो प्रभु से प्रेम करता है वही इसको समझता है। मेरे मन एवं चित्त को ईश्वर अत्यन्त ही प्यारा लगता है।
7मैं अपने उस गुरु पर कुर्बान जाता हूँ, जिसने मुझे मेरे सृजनहार प्रभु से मिला दिया है, जिससे मैं जुदा हुआ था ॥ १॥
8हे मेरे राम ! मैं पापी हूँ। मैंने तेरी शरण ली है और मैं तेरे द्वार पर आ पड़ा हूँ
9चूंकि तुम अपनी कृपा करके मुझ अल्पबुद्धि, गुणहीन एवं मलिन को कभी अपने साथ मिला लो॥ १॥ रहाउ॥
10मुझ में अत्यंत अवगुण हैं और मेरे अवगुण गिने नहीं जा सकते और मैं बार-बार अवगुण करता जाता हूँ।
11हे प्रभु-परमेश्वर ! तुम गुणवान एवं दयालु हो। हे प्रभु ! जब तुझे भला लगता है, तुम स्वयं ही क्षमा कर देते हो।
12मुझ अपराधी को गुरु की संगति ने बचा लिया है। गुरु जी ने मुझे उपदेश दिया है कि ईश्वर का नाम जीवन से मुक्ति दिलवा देता है॥ २॥
13हे मेरे सतिगुरु ! मैं तेरे गुण कैसे बताऊं? जब गुरु जी मधुर वचन करते हैं तो मैं आश्चर्य से सुप्रसन्न हो जाता हूँ।
14क्या कोई दूसरा मुझ जैसे अपराधी को बचा सकता है जैसे सतिगुरु ने मुझे बचाकर भवसागर से मुक्त कर दिया है।
15हे मेरे गुरु ! तुम मेरे पिता हो। तुम ही मेरी माता हो और तुम ही मेरे भाई-बन्धु, साथी एवं सहायक हो।॥ ३॥
16हे मेरे सतिगुरु जी ! जो अवस्था मेरी थी उस अवस्था को तुम हे हरि रूप गुरु जी स्वयं ही जानते हो।
17हे प्रभु ! मैं मिट्टी में ठोकरें खा रहा था और कोई भी मेरी बात नहीं पूछता था अर्थात् कोई भी चिन्ता नहीं करता था। सतिगुरु ने अपनी संगति देकर मुझ तुच्छ कीड़े को सम्मान प्रदान किया है।
18नानक का गुरु धन्य-धन्य है। जिसको मिलने से मेरे सारे दुख एवं संताप मिट गए हैं। ४ II ५ II ११II ४९ ॥
19गउड़ी बैरागणि महला ४ ॥
20मेरा मन सुन्दर नारी के मोह में फँसा हुआ है एवं माया का मोह मुझे बड़ा मीठा लगता है।
21मुझे घर, मन्दिर, घोड़े देख-देखकर बड़ी खुशी होती है और दूसरे रसों के आनन्द में मेरा मन चाव से लगा हुआ है।
22प्रभु-परमेश्वर को मैं स्मरण नहीं करता। हे मेरे प्रभु ! फिर मुझे कैसे मोक्ष मिलेगा ॥ १॥
23हे मेरे राम ! ऐसे मेरे नीच कर्म हैं।
24हे मेरे गुणनिधि एवं दयालु प्रभु-परमेश्वर ! मुझ पर कृपा-दृष्टि करके मेरे समस्त अवगुण क्षमा कर दीजिए॥ १॥ रहाउ॥
25हे ईश्वर ! न मेरा (सुन्दर) रूप है, न मेरी उच्च जाति है, न ही मेरा जीवन आचरण अच्छा है।
26मुझ गुणहीन ने तेरा नाम भी नहीं जपा, अतः मैं कौन-सा मुँह लेकर बोलू?
27सतिगुरु ने मुझ पर बड़ा उपकार किया है। मैं अपराधी गुरु की संगति से (मोह-माया से) बच गया हूँ॥ २॥
28परमात्मा ने समस्त प्राणियों को आत्मा, देह, मुख, नाक और प्रयोग करने के लिए जल दिया है।
29प्रभु ने उनको खाने के लिए भोजन, पहनने के लिए वस्त्र एवं अनेक रस ऐश्वर्य भोग करने के लिए दिए हैं।
30जिस प्रभु ने प्राणियों की रचना करके यह कुछ दिया है, मनुष्य को वह (प्रभु) स्मरण नहीं होता। यह मनुष्य पशु के समान है जो यह समझता है कि यह सब कुछ मैंने स्वयं प्राप्त किया है। ३॥
31हे ईश्वर ! दुनिया में सब कुछ तेरा किया हो रहा है, तुम अंतर्यामी हो।
32हे परमात्मा ! हम जीव बेचारे क्या कर सकते हैं ? अर्थात् हमारे वश में कुछ भी नहीं। हे मेरे स्वामी ! यह सारी दुनिया तेरी एक लीला है।
33(जिस तरह कोई गुलाम मण्डी से खरीदा जाता है वैसे ही) मण्डी में से मूल्य लिया हुआ सेवक नानक प्रभु के सेवकों का सेवक है॥ ४॥ ६॥ १२॥ ५०॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं