गुरु ग्रंथ साहिब 164 · Raag Gauree · Guru Raam Daas Ji
1संन्यासी विभूति लगाकर अपने शरीर का श्रृंगार करता है।
2वह पराई नारी को त्याग कर ब्रह्मचारी बनता है।
3हे हरि ! मुझ मूर्ख को तुझ पर ही भरोसा है॥ २॥
4क्षत्रिय शूरवीरता के कर्म करता है और वीरता पाता है।
5शूद्र एवं वैश्य दूसरों की सेवा का कर्म करते हैं।
6मुझ मूर्ख को भगवान का नाम ही मुक्त करवाएगा ॥ ३॥
7हे प्रभु ! यह सारी सृष्टि तेरी ही रचना है और तू स्वयं ही समस्त जीवों में समाया हुआ है।
8हे नानक ! गुरमुख को प्रभु महानता प्रदान करता है।
9मुझ ज्ञानहीन ने भगवान का ही सहारा लिया है॥ ४ ॥ ४ ॥ १८ ॥ ३८ ॥
10गउड़ी गुआरेरी महला ४ ॥
11हरि की कथा माया के तीनों गुणों से परे है।
12संतजनों की संगति में मिलकर भगवान का भजन करो और
13हरि की अकथनीय कथा को सुनकर भवसागर से पार हो जाओ॥ १॥
14हे गोविन्द ! मुझे संतों की संगति में मिला दो
15चूंकि मेरी रसना राम के गुण गा-गाकर हरि-रस का पान करती रहे॥ १॥ रहाउ॥
16जो हरि-परमेश्वर के नाम का ध्यान करते रहते हैं।
17हे मेरे राम ! मुझे उन पुरुषों के दासों का दास बना दो,
18तेरे सेवक की सेवा एक उत्तम कार्य है॥ २॥
19जो व्यक्ति मुझे हरि की हरि कथा सुनाता है,
20वह मेरे मन एवं चित्त को बहुत अच्छा लगता है।
21ईश्वर के सेवकों की चरण-धूली भाग्यवान ही प्राप्त करते हैं।॥ ३ ॥
22संतजनों से उनकी प्रीति होती है, जिनके मस्तक पर विधाता ने ऐसा भाग्य लिख दिया है।
23हे नानक ! ऐसे व्यक्ति प्रभु के नाम में समा जाते हैं। ४॥ २ ॥ ४०॥
24गउड़ी गुआरेरी महला ४ ॥
25जब पुत्र कोई स्वादिष्ट पदार्थ खाता है तो माता बड़ी प्रसन्न होकर प्रेम करती है।
26जब मछली जल में स्नान करती है तो उसका जल से प्रेम हो जाता है।
27सतिगुरु का प्रेम गुरसिक्ख के मुख में नाम रूपी भोजन डालने से है॥ १॥
28हे प्रिय प्रभु ! मुझे ऐसे हरि के भक्तों से मिला,
29जिनको मिलने से मेरे दुःख दूर हो जाएँ॥ १॥ रहाउ ॥
30जिस तरह अपने गुम हुए बछड़े से मिलकर गाय प्रेम करती है,
31जैसे कामिनी (पत्नी) अपने पति से मिलकर प्रेम करती है, जब वह घर लौट कर आता है,
32वैसे ही जब प्रभु का भक्त प्रभु का यशोगान करता है तो उसका मन प्रभु के प्रेम में लीन हो जाता है॥ २॥
33पपीहा मूसलाधार वर्षा के जल से प्रेम करता है।
34नरपति (सम्राट) को धन-दौलत का आडम्बर (विस्तार) देखने का चाव है।
35हरि का सेवक निरंकार की आराधना करने से प्रेम करता है॥ ३॥
36मनुष्य को धन-दौलत एवं सम्पत्ति कमाने से अति प्रेम है।
37गुरु के सिक्ख को गुरु से प्रेम होता है, जब गुरु उसे गले लगकर मिलता है।
38नानक तो संतों के चरण चूमने से ही प्रेम करता है॥ ४ ॥ ३ ॥ ४१ ॥
39गउड़ी गुआरेरी महला ४ ॥
40भिखारी को भिक्षा से प्रेम है, जो वह किसी दानी से प्राप्त करता है।
41भूखे का प्रेम भोजन खाने से है।
42गुरु के सिक्ख की प्रीति गुरु से भेंट करके तृप्त होने से है॥ १॥
43हे प्रभु ! मुझे अपने हरि दर्शन दीजिए। मुझे एक तेरी ही आशा है।
44हे प्रभु ! मुझ पर कृपा करके मेरी कामना पूरी करो ॥ १॥ रहाउ॥
45चकवी को प्रसन्नता तब होती है, जब उसे सूर्य के दर्शन होते हैं।
46अपने प्रियतम से मिलकर उसके सारे दुःख दूर हो जाते हैं।
47गुरु का सिक्ख तब प्रसन्न होता है जब उसे गुरु के दर्शन होते हैं।॥ २॥
48बछड़ा (अपनी माता का) अपने मुख से दूध चूषन करके प्रसन्न होता है।
49अपनी माता को देखकर उसका हृदय प्रफुल्लित हो जाता है।
50(इसी तरह) गुरु का सिक्ख गुरु के दर्शन करके बड़ा हर्षित होता है॥ ३॥
51(गुरु-परमात्मा के अलावा) दूसरा मोह झूठा है, चूंकि माया की प्रीति क्षणभंगुर है।
52यह झूठी प्रीति कांच की तरह टूट कर नाश हो जाती है।
53जन नानक सच्चे गुरु से ही प्रेम करता और उसके दर्शन करके तृप्त हो जाता है॥ ४॥ ४॥ ४२ ॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं