सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 163 · Raag Gauree · Guru Amar Daas Ji

1परमेश्वर स्वयं ही सुमति प्रदान करता है और मनुष्य हरि के नाम का ध्यान करता है।

2बड़े सौभाग्य से सतिगुरु जी मिलते हैं, जो उसके मुख (हरिनाम का) अमृत डालते हैं।

3जब अहंकार एवं दुविधा नष्ट हो जाते हैं, वह सहज ही सुख में लीन हो जाता है।

4प्रभु स्वयं ही सर्वव्यापक हो रहा है और स्वयं ही मनुष्य को अपने नाम-सिमरन में लगाता है॥ २॥

5स्वेच्छाचारी अहंकारवश ईश्वर को प्राप्त नहीं कर सकते, वे मूर्ख एवं ज्ञानहीन हैं।

6वे सतिगुरु की सेवा-भक्ति नहीं करते और पुनः पुनः पश्चाताप करते हैं।

7गर्भयोनि में उनको निवास मिलता है और गर्भ में ही गल-सड़ जाते हैं।

8मेरे सृजनहार प्रभु को यहीं भला लगता है कि स्वेच्छाचारी भटकते रहें॥ ३॥

9मेरे हरि-प्रभु ने आदि से ही प्राणी के मस्तक पर उसका भाग्य लिख दिया था।

10जब मनुष्य शूरवीर गुरु से मिलता है, वह हरि-परमेश्वर के नाम की आराधना करता है।

11हरि का नाम मेरा पिता एवं मेरी माता है। भगवान ही मेरा संबंधी और भ्राता है।

12हे प्रभु ! कृमि सेवक नानक को क्षमादान करके अपने साथ मिला लो॥ ४ ॥ ३ ॥ १७ ॥ ३७ ॥

13गउड़ी बैरागणि महला ३ ॥

14सतिगुरु से ज्ञान प्राप्त करके मैंने परम तत्व ईश्वर के मूल का चिन्तन किया है।

15मुरारि प्रभु के नाम का जाप करने से मेरी मलिन बुद्धि निर्मल हो गई है।

16ईश्वर ने माया का नाश कर दिया है और मेरा अज्ञानता का अंधकार दूर हो गया है।

17जिनके मस्तक पर आदि से ही भाग्य-रेखाएँ विद्यमान हों, उनको हरि का नाम प्रिय लगता है॥ १ ॥

18हे सन्तजनो ! कौन-से साधनों द्वारा परमात्मा को पाया जा सकता है? जिसके दर्शन करके मैं जीवित रहती हूँ।

19परमात्मा के बिना मैं निमेष मात्र भी जीवित नहीं रह सकती। मुझे गुरु के साथ मिला दीजिए चूंकि जो मैं हरि-रस का पान करूँ॥ १॥ रहाउ॥

20मैं नित्य ईश्वर की गुणस्तुति करती हूँ और प्रतिदिन परमेश्वर की महिमा ही सुनती हूँ। मुझे हरि-प्रभु ने (संसार से) मुक्त कर दिया है।

21हरि-रस मैंने गुरु से प्राप्त किया है। मेरा मन एवं तन उसमें लीन हो गए हैं।

22वह सत्यपुरुष गुरु धन्य-धन्य है, जिन्होंने मुझे भगवान की भक्ति प्रदान की है।

23मैंने उसे ही अपना गुरु धारण किया है, जिस गुरु के द्वारा मैंने परमात्मा को पाया है॥ २॥

24विश्व का मालिक प्रभु गुणों का दाता है परन्तु हम जीवों में अनेक अवगुण विद्यमान हैं।

25पानी में डूबते पत्थरों की तरह भवसागर में डूबते पापी जीवों को भगवान ने गुरु की मति देकर पार कर दिया है।

26हे गुणों के दाता ! तू बड़ा निर्मल है लेकिन हम जीवों में अनेक अवगुण भरे हुए हैं।

27हे भगवान ! तू महांमूर्खों को भी भवसागर से पार कर देता है, अतः मैं तेरी ही शरण में आया हूँ और मुझे भी भवसागर से पार कर दो॥ ३॥

28जो व्यक्ति गुरु की मति द्वारा अपने मन में हरि-परमेश्वर का ध्यान करते हैं, उन्हें हमेशा ही सहज सुख एवं आनंद प्राप्त होता है।

29वे अपने सज्जन प्रभु को पाकर अपने हृदय-घर में उसकी महिमा-स्तुति के गीत गाते रहते हैं।

30हे हरि ! मुझ पर दया करो। हे प्रभु ! मेरी यही विनती है कि मैं सर्वदा ही हरि-परमेश्वर का नाम याद करता रहूँ।

31जन नानक उन महापुरुषों की चरण-धूलि की ही कामना करता है, जिन्होंने सतिगुरु को पाया है॥ ४॥ ४॥ १८ ॥ ३८ ॥

32गउड़ी गुआरेरी महला ४ चउथा चउपदे

33ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।

34पण्डित शास्त्रों एवं स्मृतियों का अध्ययन करता है।

35योगी अपने गुरु का नाम 'गोरख गोरख' पुकारता है।

36लेकिन मैं मूर्ख हरि-परमेश्वर के नाम का ही जाप करता हूँ॥ १॥

37हे मेरे राम ! मैं नहीं जानता कि मेरी क्या हालत होगी।

38हे मेरे मन ! तू भगवान का भजन करके भवसागर से पार हो जा॥ १ ॥ रहाउ ॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं