सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 161 · Raag Gauree · Guru Amar Daas Ji

1इस कलियुग में कोई भी व्यक्ति धर्म-कर्म करने में सफल नहीं होता।

2कलियुग का जन्म चंडाल के घर में हुआ है।

3हे नानक ! परमात्मा के नाम बिना कोई भी मोक्ष नहीं पा सकता ॥ ४ ॥ १० ॥ ३० ॥

4गउड़ी महला ३ गुआरेरी ॥

5भगवान विश्व का सच्चा बादशाह है और उसका हुक्म भी सत्य अर्थात् अटल है।

6जो व्यक्ति अपने मन से सत्यस्वरूप एवं बेपरवाह भगवान के प्रेम में मग्न रहते हैं। वे उसके सच्चे महल में निवास प्राप्त कर लेते है और उसके सत्य-नाम में ही समा जाते हैं।॥ १॥

7हे मेरे मन ! सुनो, प्रभु का चिन्तन करो।

8राम का भजन करो और भवसागर से पार हो जाओ ॥ १॥ रहाउ ॥

9जीव मोह-माया के भ्रम में फँसने के कारण जन्मता एवं मरता रहता है।

10इस जगत् के जीवों ने माया के प्रेम कारण जन्म लिया है।

11स्वेच्छाचारी मनुष्य प्रभु को स्मरण नहीं करता इसलिए वह जन्मता-मरता रहता है।॥ २॥

12क्या प्राणी स्वयं कुमार्गगामी होता है अथवा ईश्वर स्वयं उसको कुमार्गगामी करता है ?

13यह आत्मा माया की सेवा में लिप्त हुई है।

14भगवान ने इस जीव को माया की सेवा में लगाया है, जिसके फलस्वरूप यह भारी दुःख प्राप्त करता है और अपना अनमोल जीवन व्यर्थ ही गंवा देता है॥ ३॥

15प्रभु अपनी कृपा करके मनुष्य का सतिगुरु से मिलन करवाता है।

16वह तब, केवल नाम का ही स्मरण करता है और अपने अन्तर्मन से वह भ्र्म को निकाल देता है।

17हे नानक ! वह नाम का जाप करता है और ईश्वर के नाम की नवनिधि प्राप्त कर लेता है॥ ४ ॥ ११ ॥ ३१ ॥

18गउड़ी गुआरेरी महला ३ ॥

19जिन लोगों ने गुरु की प्रेरणा से भगवान के नाम का ध्यान किया है, मैं उन से जाकर पूछता हूँ।

20गुरु की सेवा करने से मन संतुष्ट हो जाता है।

21वहीं धनवान हैं जो हरि का नाम धन कमाते हैं।

22इस बात का ज्ञान पूर्ण-गुरु से ही प्राप्त होता है॥ १॥

23हे मेरे भाई ! हरि-परमेश्वर के नाम का जाप करते रहो।

24गुरु की प्रेरणा से की हुई सेवा-भक्ति के परिश्रम को भगवान स्वीकार कर लेता है॥ १॥ रहाउ॥

25अपने स्वरूप की पहचान करने से मन निर्मल हो जाता है।

26वह अपने जीवन में माया के बंधनों से मुक्त होकर भगवान को पा लेता है।

27जो व्यक्ति भगवान की गुणस्तुति करता है, उसकी बुद्धि श्रेष्ठ हो जाती है।

28वह सहज ही ईश्वर में लीन हो जाता है।॥ २ ॥

29मोह-माया में फंसने से परमात्मा की सेवा-भक्ति नहीं की जा सकती।

30मनुष्य अहंकारवश माया रूपी महा विष सेवन करता है।

31उसके पुत्र, कुटुंब एवं घर इत्यादि के मोह के कारण माया उसे ठगती रहती है

32और वह ज्ञानहीन स्वेच्छाचारी व्यक्ति जन्मता-मरता रहता है॥ ३॥

33जिस मनुष्य को हरि-प्रभु अपना नाम देता है, वह उसका भक्त बन जाता है। भगवान की भक्ति रात-दिन सदैव ही गुरु के शब्द से होती है।

34परन्तु कोई विरला पुरुष ही गुरु की मति द्वारा इस भेद को समझता है।

35हे नानक ! ऐसा व्यक्ति हमेशा ही ईश्वर के नाम में लीन रहता है॥ ४ ॥ १२ ॥ ३२ ॥

36गउड़ी गुआरेरी महला ३ ॥

37गुरु की सेवा चारों युगों (सतियुग, त्रैता, द्वापर एवं कलियुग) में सफल हुई है।

38कोई पूर्ण मनुष्य ही गुरु अनुसार कार्य करता है।

39सेवा करने वाला मनुष्य अक्षय हरि-नाम रूपी धन संचित कर लेता है और उस नाम-धन में कभी कोई कमी नहीं आती।

40उस मनुष्य को इहलोक में सदैव सुख मिलता है और वह प्रभु के दरबार में भी शोभा प्राप्त करता है॥ १॥

41हे मेरे मन ! इसके बारे कोई शंका मत कर।

42अमृत रस गुरु की सेवा करके ही पान किया जाता है।॥ १॥ रहाउ॥

43जो व्यक्ति सतिगुरु की तन-मन से सेवा करते हैं, वह इस संसार में महापुरुष हैं।

44वह स्वयं भवसागर से पार हो जाते हैं और अपने समूचे वंशों को भी पार कर देते हैं।

45हरि के नाम को वह अपने हृदय में धारण करके रखते हैं।

46हरि के नाम में मग्न हुए वह भवसागर से पार हो जाते हैं। २॥

47जो व्यक्ति मन में विनीत भावना रखकर अपने सतिगुरु की श्रद्धापूर्वक सेवा करते हैं,

48वे अपने अहंत्व को नष्ट कर देते हैं और उनका हृदय कमल प्रफुल्लित हो जाता है।

49उनके मन में अनहद शब्द गूंजने लगता है और वे आत्म-स्वरूप में निवास कर लेते हैं।

50नाम के साथ अनुरक्त हुए वे अपने घर में निर्लिप्त रहते हैं।॥ ३॥

51उनकी वाणी सत्य है जो सतिगुरु की सेवा करते हैं।

52प्रत्येक युग में भगवान के भक्तों ने वाणी की रचना करके उसका बखान किया है।

53वे दिन-रात सारंगपाणि प्रभु का सिमरन करते रहते हैं।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं