गुरु ग्रंथ साहिब 160 · Raag Gauree · Guru Amar Daas Ji
1तू उन्हें ही विस्मृत होता है जो माया के मोह में लीन रहते हैं।
2तू ज्ञानहीन स्वेच्छाचारी जीवों को योनियों में डालकर रखता है॥ २॥
3जिन प्राणियों पर परमात्मा प्रसन्न होता है, उनको वह सतिगुरु की सेवा में लगा देता है। जिन प्राणियों पर भगवान बड़ा प्रसन्न होता है, भगवान स्वयं को उनके मन में बसा देता है।
4गुरु के उपदेश से वह हरि के नाम में लीन हो जाते हैं।॥ ३ ॥
5जिन्होंने पुण्य-कर्म किए हुए हैं, वे ज्ञान का चिंतन करते रहते हैं
6और अपने अहंकार को नष्ट कर देते हैं।
7हे नानक ! जो ईश्वर के नाम में मग्न रहते हैं, मैं उन पर बलिहारी जाता हूँ॥ ४॥ ७॥ २७॥
8गउड़ी गुआरेरी महला ३ ॥
9हे भगवान ! तू अकथनीय है। फिर तुझे किस तरह कथन किया जा सकता है?
10जो व्यक्ति गुरु के शब्द से अपने मन को वश में कर लेते हैं, भगवान उसके मन में आ बसता है।
11हे ईश्वर ! तेरे गुण अनेक हैं और उनका मूल्यांकन नहीं किया जा सकता ॥ १॥
12यह गुरुवाणी जिस (परमेश्वर) की है, उस (प्रभु) में ही लीन रहती है।
13हे प्रभु ! तेरी अकथनीय कथा को गुरु के शब्द द्वारा ही वर्णन किया गया है॥ १॥ रहाउ ॥
14जहाँ सतिगुरु जी होते हैं, वहाँ सत्संगति हो जाती है।
15सतिगुरु सत्संगति में सहज ही भगवान की गुणस्तुति करते हैं।
16जहाँ सतिगुरु जी होते हैं, वहाँ नाम द्वारा प्राणियों का अहंकार जल जाता है। २॥
17गुरमुख ईश्वर की सेवा-भक्ति करके उसके आत्म-स्वरूप में स्थान प्राप्त कर लेता है।
18गुरमुख ही अपने हृदय में भगवान के नाम को बसा लेता है।
19गुरमुख भक्ति द्वारा भगवान के नाम में ही समा जाता है॥ ३॥
20दाता प्रभु जिस व्यक्ति को नाम की देन प्रदान करता है,
21उस व्यक्ति का पूर्ण सतिगुरु से प्रेम हो जाता है।
22हे नानक ! जो व्यक्ति नाम में मग्न रहते हैं, उनकी लोक-परलोक में जय-जयकार होती है ॥ ४ ॥ ८ ॥ २८ ॥
23गउड़ी गुआरेरी महला ३ ॥
24एक ईश्वर से ही समस्त रूप एवं रंग उत्पन्न हुए हैं।
25पवन, जल एवं अग्नि सब में मिले हुए हैं।
26हरि-प्रभु इन भिन्न-भिन्न रंगों वाले जीवों एवं पदार्थों को देखकर प्रसन्न होता है॥ १॥
27यह एक अदभुत कौतुक है कि यह सारा जगत-प्रसार एक ईश्वर का ही है और वह स्वयं इसमें विद्यमान है।
28कोई विरला पुरुष ही गुरु के माध्यम से इस कौतुक पर विचार करता है॥ १॥ रहाउ ॥
29परमेश्वर सहज ही सर्वव्यापक हो रहा है।
30परमेश्वर ने ऐसी सृष्टि रचना की है कि किसी स्थान पर वह लुप्त है और कहीं प्रत्यक्ष है।
31भगवान स्वयं ही अज्ञानता की निद्रा में सोए हुए जीवों को ज्ञान देकर जगा देता है॥ २॥
32उसका मूल्यांकन कोई नहीं कर सका
33चाहे सभी लोग उसके गुणों को कह-कहकर कथन कर रहे हैं।
34जो प्राणी गुरु के शब्द में लीन होता है, वह भगवान को समझ लेता है॥ ३॥
35भगवान जीवों की प्रार्थना सुन-सुनकर उनकी जरुरतों को देखता और उन्हें नाम द्वारा अपने साथ मिला लेता है।
36गुरु की सेवा करने से मनुष्य को बड़ी शोभा प्राप्त होती है।
37हे नानक ! जो व्यक्ति नाम में मग्न रहते हैं, वह भगवान के नाम में ही समा जाते हैं॥ ४॥ ६ ॥ २९ ॥
38गउड़ी गुआरेरी महला ३ ॥
39स्वेच्छाचारी जीव माया के मोह एवं प्रेम में फंस कर अज्ञानता की निदा में सोया रहता है
40परन्तु गुरमुख भगवान के गुणों का चिंतन करके ज्ञान द्वारा जागता रहता है।
41जो व्यक्ति प्रभु के नाम से प्रेम करते हैं, वहीं जागते रहते हैं।॥ १॥
42जो व्यक्ति सहज ही जागता रहता है, वह अज्ञानता की निद्रा में नहीं सोता।
43इस तथ्य को कोई पुरुष पूर्ण गुरु द्वारा समझता है॥ १॥ रहाउ॥
44दुष्ट एवं अनाड़ी व्यक्ति समझाने से कभी भी नहीं समझता।
45वह बातें तो बहुत करता रहता है परन्तु माया से ही उलझा रहता है।
46मोह-माया में अन्धा हुआ ज्ञानहीन व्यक्ति कभी भी अपने जीवन-मनोरथ में सफल नहीं होता ॥ २॥
47इस युग में राम के नाम द्वारा ही मोक्ष संभव है।
48कोई विरला पुरुष ही गुरु के शब्द द्वारा इस तथ्य को समझता है।
49वह स्वयं तो भवसागर से पार होता है और अपने समूचे वंश को भी बचा लेता है॥ ३॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं