सिख धर्म
वापस

गुरु ग्रंथ साहिब 15 · Siree Raag · Guru Nanak Dev Ji

1सतगुरु जी कथन करते हैं कि लाखों मन कागज़ पढ़-पढ़ कर, अर्थात् अनेकानेक शास्त्रों व धर्म ग्रंथों का अध्ययन करके, ईश्वर से प्रेम किया जाए।

2उसकी स्तुति लिखने हेतु स्याही का भी अभाव न हो और कलम पवन की भाँति चलती रहे।

3तो भी मैं तेरा मूल्यांकन नहीं कर सकता, तेरे नाम को मैं कितना महान् कथन करूँ, अर्थात् तेरे नाम की महिमा का व्याख्यान करना कठिन है ॥४॥२॥

4श्रीरागु महला १ ॥

5हे मानव ! शब्दों का बोलना सीमित है। खाना-पीना भी सीमित है।

6मार्ग पर चलने की सीमा बंधी हुई है, देखने व श्रवण करने की सीमा निश्चित है।

7यहाँ तक की स्रष्टा (प्रभु) ने जो तुझे श्वास प्रदान किए हैं उनके लेने की भी सीमा है, (इसकी पुष्टि हेतु) किसी विद्वान से पूछने की क्या आवश्यकता है ॥ १॥

8इसलिए हे जीव ! यह सांसारिक माया सब-कुछ कपट है।

9जिस अज्ञानी ने परमात्मा का नाम अपने ह्रदय से विस्मृत कर दिया, उसके हाथ न तो यह माया आई और न उसे परमात्मा की प्राप्ति हुई है ॥ १॥ रहाउ॥

10जन्म से लेकर मृत्यु काल तक मानव इस संसार में अपने सम्बन्धियों के संग सांसारिक पदार्थों का भोग करता रहता है।

11किन्तु जिस धर्मराज की सभा में बिठा कर जीव को उसके कर्मो का लेखा बताया जाता है, वहाँ तक जाने के लिए अथवा वहाँ उसकी सहायता करने हेतु कोई साथ नहीं चलता।

12मृत्यु के पश्चात् जो रोते हैं वे सभी व्यर्थ का भार बांधते हैं:, अर्थात् वे रोने का व्यर्थ-कर्म करते हैं। ॥ २ ॥

13परमात्मा को प्रत्येक अधिक ही अधिक ही कहता है, अल्प कोई नहीं कहता।

14किन्तु उसका मूल्यांकन कोई नहीं कर सकता, कहने मात्र से वह बड़ा अथवा महान् नहीं होता है।

15सत्य स्वरूप निरंकार तू सिर्फ एक ही हैं, तथा अन्य प्राणियों के हृदय में ज्ञान का प्रकाश करने वाला हैं ॥३॥

16निम्न में जो निम्न जाति के लोग हैं और फिर उनमें भी जो अति निम्न प्रभु भक्त हैं।सतिगुरु जी कहते हैं कि हे निरंकार ! उनके साथ मेरा मिलाप करो, माया व ज्ञानाभिमान के कारण जो बड़े हैं उनसे मेरी क्या समानता है।

17जिस स्थान पर उन निम्न व्यक्तियों की सम्भाल की जाती है, वहाँ पर ही हे कृपासागर ! मेरे प्रति तेरी कृपा होगी ॥ ४॥ ३॥

18श्रीरागु महला १ ॥

19लोभ करने वाला कुते के समान, मिथ्या बोलने वाला भंगी, छल-कपट से दूसरे को खाने वाला शव-भक्षक होता है।

20दूसरे की निंदा करने से मुँह में सर्वथा पराई मैल पड़ती है, क्रोधाग्नि से मनुष्य चाण्डाल का रूप धारण कर लेता है।

21आत्म-प्रशंसा खट्टे-मीठे रसों का पदार्थ है, हे करतार ! यही तुम से विमुख करने वाले अस्मदादिक जीवों के कर्म हैं। ॥ १॥

22हे मानव ! ऐसे वचन करो जिनसे प्रतिष्ठित हुआ जाए।

23क्योंकि जो जीव इस लोक में श्रेष्ठ हैं वही परमात्मा के द्वार पर भी उत्तम कहे जाते हैं और मंद कर्मी जीवों को नरकों के कष्ट भोग कर रोना पड़ता है। ॥१॥ रहाउ ॥

24(मानव मन में) सोने के आभूषणों का प्रेम है, चांदी के प्रति स्नेह है, सुंदर स्त्री के भोग का रस है, सुगन्धि का प्यार है,

25घुड़सवारी की प्रीत है, आकर्षक सेज पर सोने व भव्य महलों में रहने का चाव है, मीठे पदार्थों के खाने तथा मॉस-मदिरा सेवन करने की लगन है।

26ये जो कथन किए हैं, ये सभी रसानंद शरीर में विद्यमान हो रहे हैं तो परमात्मा का नाम-रस अंत : करण के किस स्थान पर निवास करे ॥२॥

27जो वचन बोलने से प्रतिष्ठा प्राप्त होती है वही कथन परमात्मा के दरबार में स्वीकृत होता है।

28हे अज्ञानी मन ! सुन, नीरस वचन बोलने वाला व्यक्ति दुखी होता है।

29जो परमेश्वर को भले लगते हैं वही वचन श्रेष्ठ हैं, और क्या कथन व बखान किया जाए ॥ ३॥

30उन व्यक्तियों की बुद्धि, प्रतिष्ठा व दैवी सम्पदा रूपी धन श्रेष्ठ है, जिनके हृदय में परमेश्वर का समावेश है।

31उनकी प्रशंसा क्या की जाए, अन्य कौन प्रशंसनीय हो सकते हैं।

32सतिगुरु जी कहते हैं कि जो लोग निरंकार की कृपा-दृष्टि से परे हैं, वे परमात्मा द्वारा प्रदत्त विभूतियों में ही खचित रहते हैं, नाम में नहीं ॥ ४॥ ४॥

33श्रीरागु महला १ ॥

34प्रदाता निरंकार ने जीव को जो नश्वर शरीर रूपी नशे की गोली प्रदान की है। अर्थात् मानव को जो परमात्मा ने देह प्रदान की है, उसके अभिमान रूपी नशे में जीव अचेत हो रहा है।

35उसके अभिमान में मस्त बुद्धि ने मृत्यु को भुला रखा है और अल्पकालिक खुशी में परमेश्वर से विमुख हो रहा हैं

36जिन को यह नशा नहीं हुआ उन सूफियों को सत्य स्वरूप अकाल पुरुष प्राप्त हुआ है ताकि उन्हें बैकुण्ठ में स्थान मिले ॥ १॥

37इसलिए नानक जी का कथन है कि हे मानव ! सत्यस्वरूप अकाल पुरुष को ही निश्चित व सत्य जान।

38जिसका सिमरन करने से आत्मिक सुखों की प्राप्ति होती है और निरंकार के दरबार में सम्मान प्राप्त होता है ॥ १॥ रहाउ॥

39वास्तव में मदिरा गुड़ के बिना नहीं बनती, इसलिए निरंकार के नाम की खुमारी हेतु सत्यता रूपी मदिरा में ज्ञान रूपी गुड़ का सम्मिलित होना आवश्यक है, जिसमें प्रभु-नाम मिला हुआ हो।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं