सिख धर्म
वापस

गुरु ग्रंथ साहिब 159 · Raag Gauree · Guru Amar Daas Ji

1कई मूर्ख व्यक्ति रास प्रदर्शन करके भक्ति करते हैं और स्वयं को भक्त होने का दिखावा ही करते हैं।

2वे निरन्तर नृत्य करते और कूदते हैं और बहुत दुख सहन करते हैं।

3नृत्य करने एवं कूदने से प्रभु की भक्ति नहीं होती।

4प्रभु की भक्ति वही व्यक्ति प्राप्त करता है, जो गुरु के शब्द द्वारा अपने अहंकार को नष्ट कर देता है॥ ३॥

5भक्तवत्सल प्रभु स्वयं ही भक्तों से अपनी भक्ति करवाता है।

6अपने अन्तर्मन में से अहंकार को नाश करना ही सच्ची भक्ति है।

7मेरा सत्यस्वरूप प्रभु जीवों से भक्ति करवाने की समस्त विधियों को जानता है।

8हे नानक ! भगवान उन्हें ही क्षमा कर देता है, जो उसके नाम को पहचान लेता है॥ ४ ॥ ४ ॥ २४ ॥

9गउड़ी गुआरेरी महला ३ ॥

10जब मनुष्य अपने मन को नियंत्रण में कर लेता है तो उसकी समस्त दुविघा समाप्त हो जाती है।

11मन को नियंत्रण में किए बिना भगवान की प्राप्ति कैसे हो सकती है?

12कोई विरला पुरुष ही मन को नियंत्रण में करने की औषधि को जानता है।

13मन भगवान के नाम द्वारा ही नियंत्रण में आता है परन्तु इस भेद को वही जानता है जो नाम-सिमरन करता है॥ १॥

14ईश्वर जिसे क्षमा कर देता है, उसे ही वह शोभा प्रदान करता है।

15गुरु की कृपा से ईश्वर आकर उसके हृदय में निवास करता है॥ १॥ रहाउ॥

16जो व्यक्ति गुरमुख बनकर शुभ कर्मों के आचरण की कमाई करता है,

17उसे ही मन के स्वभाव की सूझ होती है।

18मनुष्य का मन मदिरा में मस्त हुए हाथी की भाँति है।

19गुरु ही आत्मिक रूप से मृत इस मन को अपनी वाणी द्वारा अंकुश लगाकर आत्मिक जीवन प्रदान करने में समर्थ है॥ २॥

20यह मन सहज रूप में नियंत्रण में आने वाला नहीं। कोई विरला पुरुष ही इसे नियंत्रण में करता है।

21यदि मनुष्य मन के स्वेच्छाचरण को नष्ट कर दे, केवल तभी यह मन पवित्र होता है।

22गुरमुख ने यह मन सुन्दर बना लिया है।

23वह अपने भीतर से अहंकार रूपी विकार को बाहर निकाल देता है॥ ३॥

24जिन लोगों को परमात्मा ने आदि से ही साधुओं के मिलाप में मिला रखा है,

25वह कदाचित अलग नहीं होते और ईश्वर में ही लीन रहते हैं।

26सर्वकला सम्पूर्ण परमात्मा अपनी कला (शक्ति) स्वयं ही जानता है।

27हे नानक ! गुरमुख ही नाम को पहचानता है॥ ४॥ ५॥ २५ ॥

28गउड़ी गुआरेरी महला ३ ॥

29सारी दुनिया अहंकार में फँसकर पागल हो रही है

30तथा द्वैत-भाव के कारण भ्रम में पड़कर कुमार्गगामी हो रही है।

31चिंता में पड़कर लोग बहुत सोचते रहते हैं परन्तु अपने स्वरूप की पहचान नहीं करते।

32अपने कर्म (धंधा) करते हुए उनके रात-दिन बीत जाते हैं।॥ १॥

33हे मेरे भाई ! अपने हृदय में राम का सिमरन करते रहो।

34गुरमुख की जिव्हा हरि-रस का आनंद प्राप्त करती रहती है॥ १॥ रहाउ॥

35जो गुरमुख अपने ह्रदय में राम को पहचान लेते हैं,

36वह जगजीवन प्रभु की सेवा करके चारों युगों में प्रसिद्ध हो जाते हैं।

37वह अपना अहंकार नष्ट कर के गुरु के शब्द द्वारा प्रभु को समझ लेते हैं।

38कर्मविधाता प्रभु उन पर अपनी कृपा करता है॥ २॥

39जिन लोगों को गुरु के शब्द द्वारा भगवान अपने साथ मिला लेता है, वहीं व्यक्ति सत्यवादी हैं।

40वह अपने मन को विकारों की ओर दौड़ने से वर्जित करते हैं और उस पर विराम लगाते हैं।

41नवनिधियाँ प्रदान करने वाले नाम को वह गुरु से प्राप्त करते हैं।

42भगवान अपनी कृपा करके उनके मन में आकर निवास कर लेता है॥ ३॥

43राम-राम' नाम का सिमरन करने से शरीर को बड़ा सुख एवं शांति प्राप्त होती है।

44जिस प्राणी के हृदय में प्रभु-नाम आ बसता है, उसको मृत्यु की पीड़ा स्पर्श नहीं करती।

45ईश्वर स्वयं ही जगत् का स्वामी है और स्वयं ही मंत्री है।

46हे नानक ! सदैव ही गुणों के भण्डार भगवान की सेवा करते रहो॥ ४॥ ६॥ २६॥

47गउड़ी गुआरेरी महला ३ ॥

48उस भगवान को हम क्यों विस्मृत करें ? जिसके हमें ये आत्मा और प्राण दिए हुए हैं।

49उसे हम क्यों विस्मृत करें ? जो समस्त जीवों में समाया हुआ है।

50जिसकी सेवा-भक्ति करने से जीव उसके दरबार में स्वीकार हो जाता है तथा वहाँ उसे बड़ा आदर-सत्कार मिलता है ॥ १॥

51मैं हरि के नाम पर बलिहारी जाता हूँ।

52हे मेरे प्रभु! जब मैं तुझे विस्मृत करूँ, मैं उसी क्षण ही प्राण त्याग देता हूँ॥ १॥ रहाउ॥

53हे परमात्मा ! तू उन्हें ही विस्मृत हो जाता है, जिन्हें तूने स्वयं ही कुमार्गगामी बनाया है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं