गुरु ग्रंथ साहिब 158 · Raag Gauree · Guru Amar Daas Ji
1इस तरह मन निर्मल हो जाता है और सत्यस्वरूप परमेश्वर उसमें निवास कर लेता है।
2यदि मनुष्य सत्य में निवास कर ले तो उसके कर्म सच्चे (श्रेष्ठ) हो जाते हैं।
3ईश्वर का नाम-सिमरन ही शुभ कर्म है॥ ३॥
4गुरु के द्वारा सत्यस्वरूप प्रभु की सेवा-भक्ति की जाती है।
5गुरु की दया से कोई विरला पुरुष ही हरिनाम को पहचानता है।
6समस्त जीवों को देने वाला दाता सदैव ही जीवित रहता है।
7हे नानक ! मनुष्य का हरि-नाम से ही प्रेम हो जाता है॥ ४ ॥ १ ॥ २१ ॥
8गउड़ी गुआरेरी महला ३ ॥
9कोई विरला पुरुष ही गुरु से ज्ञान प्राप्त करता है।
10जो व्यक्ति गुरु से ईश्वर बारे ज्ञान प्राप्त कर लेता है, उसका जीवन-मनोरथ सफल हो जाता है।
11गुरु से ही सत्यस्वरूप परमात्मा का नाम-स्मरण प्राप्त होता है।
12गुरु द्वारा ही मोक्ष का द्वार पाया जाता है। १॥
13गुरु उसे ही आकर मिलता है, जिसके पूर्ण भाग्य होते हैं।
14वह परमात्मा का सिमरन करके सहज ही सत्य में समा जाता है।॥ १॥ रहाउ ॥
15गुरु को मिलने से तृष्णा की अग्नि बुझ जाती है।
16गुरु के द्वारा सुख-शांति आकर मन में निवास करती है।
17गुरु के द्वारा मनुष्य पवित्र पावन एवं निर्मल हो जाता है।
18गुरु द्वारा ही प्रभु से मिलन होता है। २॥
19गुरु के बिना सारी दुनिया भ्रम में भटकती रहती है।
20नाम के बिना प्राणी बहुत कष्ट सहन करता है।
21जो प्राणी गुरमुख बन जाता है, वहीं व्यक्ति ईश्वर के नाम का ध्यान करता है।
22सद्पुरुष के दर्शनों से मनुष्य को सच्ची शोभा प्राप्त होती है॥ ३॥
23केवल एक वही दाता है, दूसरा किसी का क्यों जिक्र किया जाए ?
24जिस व्यक्ति पर प्रभु कृपा कर देता है, उसका शब्द द्वारा उससे मिलाप हो जाता है।
25मैं अपने प्रियतम गुरु से मिलकर सत्यस्वरूप परमात्मा की गुणस्तुति करता रहता हूँ।
26हे नानक ! मैं सच्चे गुरु की कृपा से सत्यस्वरूप परमात्मा में समाया रहता हूँ॥ ४॥ २॥ २२॥
27गउड़ी गुआरेरी महला ३ ॥
28वह (सत्संग का) स्थान सत्य का पावन स्थल है, जहाँ मन निर्मल हो जाता है।
29वह निवास भी सत्य है, जहाँ सत्यस्वरूप परमात्मा निवास करता है।
30सच्ची वाणी चारों ही युगों में प्रसिद्ध है।
31सत्य स्वरूप परमात्मा स्वयं ही सब कुछ है॥ १॥
32यदि परमात्मा की कृपा हो जाए तो मनुष्य को संतों की संगति मिल जाती है।
33फिर वह उस श्रेष्ठ स्थान पर विराजमान होकर भगवान की महिमा-स्तुति करता रहता है॥ १॥ रहाउ॥
34यह जिव्हा जल जाए, जो दूसरे स्वादों में लगी रहती है अर्थात् दूसरों की प्रीति की चाहवान है।
35यह हरि-रस का आस्वादन नहीं करती और मन्दे वचन बोलती रहती है।
36ईश्वर को समझे बिना तन एवं मन फीके हो जाते हैं।
37स्वामी के नाम के बिना दुःखी होकर मनुष्य विलाप करता हुआ दुनिया से चला जाता है। २॥
38जिनकी जिव्हा सहज ही हरि-रस का पान करती है, वह गुरु की कृपा से सत्य में ही समा जाती है।
39वह गुरु के शब्द का चिंतन करती रहती है और सत्य में ही मग्न रहती है।
40फिर वह अमृत रस की निर्मल धारा का पान करती रहती है॥ ३॥
41भगवान का नाम उस व्यक्ति के ह्रदय रूपी बर्तन में तभी समाता है, यदि वह शुद्ध हो तथा
42अशुद्ध हृदय रूपी बर्तन में कुछ भी नहीं ठहरता।
43गुरु के शब्द द्वारा मन में भगवान के नाम का निवास हो जाता है।
44हे नानक ! जिस व्यक्ति के हृदय में प्रभु-नाम को पान करने की तीव्र लालसा होती है, उसका ही हृदय-रूपी बर्तन शुद्ध होता है॥ ४ ॥ ३ ॥ २३ ॥
45गउड़ी गुआरेरी महला ३ ॥
46कई व्यक्ति प्रभु-यश गाते रहते हैं परन्तु उनके हृदय को आनंद नहीं आता।
47जो व्यक्ति अहंकार में गाते हैं उनका सब कुछ व्यर्थ ही जाता है। अर्थात् उन्हें उसका कोई फल नहीं मिलता।
48जो व्यक्ति ईश्वर के नाम से प्रेम करते हैं, वही असल में प्रभु के गीत गाते हैं।
49वह सच्ची वाणी एवं शब्द का चिंतन करते हैं॥ १॥
50यदि सतिगुरु को अच्छा लगे तो मनुष्य प्रभु का यशोगान करता रहता है।
51उसका मन एवं तन नाम में मग्न हो जाता है और नाम से उसका जीवन सुन्दर बन जाता है॥ १॥ रहाउ॥
52कई प्राणी प्रभु के गुणों के गीत गाते हैं और कई भक्ति करते हैं।
53परन्तु मन में प्रेम न होने के कारण उन्हें नाम प्राप्त नहीं होता।
54जो व्यक्ति गुरु के शब्द से प्रेम करता है उसकी ही भक्ति सच्ची है।
55ऐसा व्यक्ति सदैव ही अपने प्रियतम प्रभु को अपने हृदय में बसाकर रखता है॥ २॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं