सिख धर्म
वापस

गुरु ग्रंथ साहिब 157 · Raag Gauree · Guru Nanak Dev Ji

1चाहे सभी मनुष्य धन की तृष्णा में रहते हैं परन्तु उनकी किस्मत का उनके कर्मो अनुसार ही फैसला होता है॥ ३॥

2हे नानक ! जिसने सृष्टि की रचना की है, वही सबका पालन-पोषण करता है।

3मालिक-प्रभु का हुक्म जाना नहीं जा सकता कि वह किसे महानता प्रदान करता है॥ ४॥ १॥ १८ ॥

4गउड़ी बैरागणि महला १ ॥

5यदि मुझे मृगिनी बनकर वन में निवास करना पड़े तो मैं वहाँ कन्दमूल चुन-चुनकर खा लिया करूँगी।

6यदि गुरु की कृपा से मुझे मेरा पति-प्रभु मिल जाए तो मैं बार-बार उस पर कुर्बान जाऊँ॥ १॥

7मैं राम की वनजारिन (व्यापारी) हूँ।

8हे प्रभु ! तेरा नाम ही व्यापार करने के लिए मेरा सौदा है॥ १॥ रहाउ॥

9यदि मुझे कोयल बन कर आम के पौधे पर रहना पड़े तो भी मैं सहज ही नाम की आराधना करूँगी।

10यदि मुझे सहज-स्वभाव मेरा पति-प्रभु मिल जाए तो उसके अपार रूप के दर्शन करूँगी॥ २॥

11यदि मुझे मछली बनकर जल में निवास करना पड़े तो भी मैं उसकी आराधना करूँगी, जो समरत जीव-जन्तुओं की देखभाल करता है।

12प्रियतम प्रभु (इस संसार-सागर के अथाह जल के) दोनों ओर निवास करता है। अपनी भुजाएँ फैलाकर मैं उससे मिलूगी ॥ ३॥

13यदि मुझे नागिन बनकर पृथ्वी में निवास करना पड़े तो भी मैं अपने प्रभु के नाम में ही निवास करूँगी और मेरा भय निवृत्त हो जाएगा।

14हे नानक ! वह जीव-स्त्री सदा सुहागिन है, जिसकी ज्योति प्रभु-ज्योति में समाई रहती है॥ ४॥ २॥ १९॥

15गउड़ी पूरबी दीपकी महला १

16ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।

17जिस सत्संगति में परमात्मा की कीर्ति का गान होता है और सृष्टिकर्ता की महिमा का चिंतन किया जाता है,

18उस सत्संगति रूपी घर में जाकर यश के गीत गायन करो और उस करतार की ही आराधना करो।॥ १॥

19हे मन ! तू सत्संगियों के साथ मिलकर निडर प्रभु की स्तुति के गीत गायन कर।

20मैं उस स्तुति के गीत पर कुर्बान जाता हूँ, जिस द्वारा सदैव सुख प्राप्त होता है॥ १॥ रहाउ ॥

21हे मानव ! जो पालनहार ईश्वर नित्यप्रति अनेकानेक जीवों का पोषण कर रहा है, वह तुझ पर भी कृपा-दृष्टि करेगा।

22उस ईश्वर द्वारा प्रदत्त पदार्थों का कोई मूल्यांकन नहीं है, क्योंकि वे तो अनन्त हैं।॥ २॥

23इस मृत्युलोक से जाने का समय निश्चित किया हुआ है अर्थात् इहलोक से जाने हेतु साहे-पत्र रूपी संदेश संवत-दिन इत्यादि लिखकर तय किया हुआ है, इसलिए भगवान से मिलाप हेतु सत्संगियों के साथ मिलकर तेल डालने का शगुन कर लो अर्थात् मृत्यु रूपी विवाह होने से पूर्व शुभ कर्म कर लो ।

24हे सज्जनो ! मुझे अपना आशीर्वाद दो कि मेरा प्रभु-पति से मिलन हो जाए॥ ३॥

25प्रत्येक घर में इस साहे-पत्र को भेजा जा रहा है, नित्य ही यह सन्देश किसी न किसी घर पहुँच रहा है अर्थात् नित्य ही कोई न कोई मृत्यु को प्राप्त हो रहा है।

26नानक कथन करते हैं कि हे जीव ! मृत्यु का निमंत्रण भेजने वाले को स्मरण कर, चूंकि वह दिन निकट आ रहे हैं।॥ ४॥ १॥ २०॥

27रागु गउड़ी गुआरेरी ॥

28महला ३ चउपदे ॥

29ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।

30यदि गुरु मिल जाए तो ईश्वर से मिलन हो जाता है।

31वह ईश्वर स्वयं ही गुरु से मिलाकर अपने साथ मिला लेता है।

32मेरा प्रभु जीवों को अपने साथ मिलाने की समस्त युक्तियां जानता है।

33अपने हुक्म द्वारा वह उनको अपने साथ मिला लेता है, जो उसके नाम को पहचानते हैं।॥ १॥

34सतिगुरु के भय-आदर में रहने से संशय एवं दूसरे खौफ लुप्त हो जाते हैं।

35जो गुरु के भय में हर्षित रहता है, वह सत्य के प्रेम में लीन रहता है।॥ १॥ रहाउ॥

36यदि गुरु मिल जाए तो ईश्वर सहज ही मनुष्य के हृदय में निवास कर जाता है।

37मेरा प्रभु महान है, उसका मूल्यांकन नहीं पाया जा सकता।

38गुरु के उपदेश से मैं प्रभु की सराहना करता हूँ, जिसका कोई अन्त नहीं, उसके अस्तित्व का ओर-छोर नहीं मिल सकता।

39मेरा परमेश्वर क्षमाशील है। वह दोषी जीवों को भी क्षमा कर देता है॥ २॥

40गुरु के मिलन से समस्त चतुराइयां एवं सद्बुद्धि प्राप्त हो जाती है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं