गुरु ग्रंथ साहिब 156 · Raag Gauree · Guru Nanak Dev Ji
1यदि तुम अपना मन एक प्रभु के चरणों से लगा लो तो झूठ, लोभ के कारण बनी तेरी दुविधा दूर हो जाए॥ ३॥
2हे योगी ! निरंजन प्रभु की आराधना करने से तेरा मन उस में लीन हो जाएगा।
3हे योगी ! तुम इतना बड़ा छल-कपट क्यों बोलते हो ॥ १॥ रहाउ ॥
4तेरी काया बावली है और मन मूर्ख है। तेरी समस्त अवस्था माया के मोह में बीतती जा रही है।
5नानक विनती करता है कि नग्न देहि जब जल जाती है तो समय समाप्त हुआ जानकर आत्मा पश्चाताप करती है॥ ४ ॥ ३॥ १५॥
6गउड़ी चेती महला १ ॥
7हे मेरे मन ! यदि तू समस्त रोगों की औषधि रूपी मूल मन्त्र (प्रभु-नाम) को अपने हृदय में बसा ले,
8तो तू जन्म-जन्मांतरों में किए पापों का नाश करने वाले परमेश्वर को प्राप्त कर लेगा।॥ १॥
9हे मेरे भाई ! मेरे मन को एक ईश्वर ही अच्छा लगता है।
10हे परमेश्वर ! तेरी तीन विशेषताओं में जगत् समाया हुआ है अर्थात् त्रिगुणी इन्द्रियां संसार के मोह में लगी हुई हैं और उस अलक्ष्य परमेश्वर को समझा नहीं जा सकता॥१॥ रहाउ॥
11यह माया शक्कर व चीनी की भाँति शरीर को मधुर लगती है। हम प्राणियों ने माया का बोझ उठाया हुआ है।
12ज्ञानहीन रूपी अंधेरी रात में कुछ दिखाई नहीं देता और मृत्यु का चूहा (यमराज) जीवन की रस्सी काटता जा रहा है॥ २॥
13स्वेच्छाचारी जीव जितना अधिक धर्म कर्म करता है, उतना अधिक वह दुखी होता है। लेकिन गुरमुख को यश प्राप्त होता है।
14जो कुछ परमात्मा करता है, वही होता है, जीव की किस्मत मिटाई नहीं जा सकती॥ ३॥
15जो प्राणी परमात्मा के चरणों में प्रीति लगाते और मग्न रहते हैं, वे प्रेम-रस से परिपूर्ण रहते हैं और प्रेम से शून्य नहीं होते।
16यदि नानक उनके चरणों की धूलि बन जाए तो उस विमूढ़ (मन) को भी कुछ प्राप्त हो जाए॥ ४॥ ४॥ १६॥
17गउड़ी चेती महला १ ॥
18[हम जीवों को पापों के कारण अनेक योनियों में भटकना पड़ता है, फिर हम क्या व्यक्त करें कि] हमारी माता कौन है, हमारा पिता कौन है, किस स्थान से हम आए हैं ?
19पिता के जल रूपी वीर्य के बुलबुले से माता की गर्भ-अग्नि में पड़कर हम उत्पन्न हुए हैं लेकिन पता नहीं भगवान ने किस मकसद से हमारी रचना की है॥ १॥
20हे मेरे भगवान ! तेरे गुणों को कौन जान सकता है?
21मुझ में इतने अवगुण हैं कि उनका वर्णन नहीं किया जा सकता ॥ १॥ रहाउ॥
22हमने अनेक वृक्षों की योनियां देखीं। अनेक बार पशु-योनियों में उत्पन्न हुए।
23अनेक बार हम सांपो के वंशों में उत्पन्न हुए और अनेक बार पक्षी बन-बनकर उड़ते रहे॥ २॥
24मनुष्य नगरों कोठी दुकानों एयं मजबूत महलों को सेंध लगाता है और वहाँ चोरी करके घर आ जाता है।
25वह मूर्ख अपने आगे देखता है और अपने पीछे भी देखता है किन्तु मूर्ख मनुष्य ईश्वर से अपने आपको कहाँ छिपा सकता है? ॥ ३॥
26मैंने पावन तीर्थ-स्थलों के तट, नवखण्ड, नगर की दुकानें एवं व्यापार के केन्द्र देखे हैं।
27जीव रूपी व्यापारी अपने हृदय में तराजू लेकर अपने कमाए नाम रूपी धन को तोलता है॥ ४॥
28हे प्रभु ! जितना सागर में जल भरा हुआ है, हमारे अवगुण उतने ही हैं।
29हे ईश्वर ! मुझ पर अपनी दया एवं कुछ कृपादृष्टि करो और मुझ डूबते पत्थर को भवसागर में से पार कर दो॥ ५॥
30मेरा हृदय अग्नि की भाँति दीप्यमान हो रहा है और उसके भीतर तृष्णा रूपी कैंची चल रही है।
31नानक प्रार्थना करता है कि हे मेरे प्रभु! यदि मैं तेरे हुक्म को पहचान लूं तो मुझे दिन-रात सुख मिलता रहेगा ॥ ६॥ ५॥ १७॥
32गउड़ी बैरागणि महला १ ॥
33मनुष्य अपनी रात्रि सोकर और दिन खा-पीकर व्यर्थ ही गंवा देता है।
34उसका हीरे समान अनमोल जीवन (भक्ति के बिना) कौड़ी के भाव व्यर्थ चला जाता है॥ १॥
35हे मूर्ख ! तूने राम के नाम को नहीं जाना।
36तुम फिर मरणोपरांत पश्चाताप करोगे॥ १॥ रहाउ॥
37तूने नाशवान धन संग्रह करके धरती में दबाकर रखा हुआ है। इस धन के कारण ही तेरे मन में अनन्त परमेश्वर के स्मरण की इच्छा उत्पन्न नहीं होती।
38जो भी नाशवान धन पदार्थ की ओर दौड़ते फिरते हैं, वे अनन्त प्रभु के नाम-धन को गंवा कर आए हैं।॥ २॥
39यदि केवल चाहने से धन मिलता हो तो सभी मनुष्य धनवान बन जाएँ।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं