गुरु ग्रंथ साहिब 153 · Raag Gauree · Guru Nanak Dev Ji
1जो नाम संजोगी हैं, वह संसार को चरागाह में एक अस्थिर स्थान समझते हैं।
2भोग-विलास एवं अहंकार की विषैली गागर अन्त में फूट जाती है।
3नाम के सौदे सूत के बिना देहि रूपी घर एवं मन की दुकान शून्य है।
4गुरु के मिलन से व्रज कपाट खुल जाते हैं।॥ ४॥
5किस्मत से ही संत मिलते हैं।
6परमात्मा के भक्त सत्य में हर्षित होते हैं।
7हे नानक ! जो अपना मन एवं तन समर्पित करने से सहज ही अपने प्रभु को पा लेते हैं,
8मैं उनके चरणों पर नतमस्तक हूँ ॥ ५॥ ६॥
9गउड़ी महला १ ॥
10तेरा मन काम, क्रोध एवं माया के मोह में लीन है।
11उनके मोह के कारण तेरे मन में झूठ एवं पाप उदय हो गए हैं।
12तुमने पाप एवं लोभ की पूंजी संग्रह की हुई है।
13अतः तू शुद्ध हृदय से मन द्वारा पावन नाम का जाप करके भवसागर से पार हो जा॥ १॥
14हे मेरे सच्चे प्रभु ! तू धन्य-धन्य है। मुझे केवल तेरा ही सहारा है।
15हे प्रभु! मैं पापी हूँ, एक तू ही पावन हैं॥ १॥ रहाउ॥
16अग्नि व जल इत्यादि पंच तत्वों से बने शरीर में श्वास ऊँची-ऊँची गूंजते हैं।
17जिव्हा व इन्द्रिय अपना-अपना स्वाद प्राप्त करते हैं।
18तेरी दृष्टि विकारों में लीन है और तुझे प्रभु का भय एवं प्रेम नहीं।
19यदि प्राणी अपना अहंकार नष्ट कर दे तो वह नाम को प्राप्त कर लेता है॥ २॥
20जो व्यक्ति शब्द द्वारा अहंकार को समाप्त कर देता है, उसे दोबारा मरना नहीं पड़ता।
21अहंकार को समाप्त किए बिना वह पूरा कैसे हो सकता है?
22मन दुनिया के प्रपंचों एवं द्वैतभाव में लीन हो रहा है।
23एक नारायण ही स्थिर है और दुनिया में वही होता है जो वह करता है॥३ ॥
24जब मेरी बारी आएगी तो मैं भवसागर से पार होने के लिए नाम रूपी जहाज पर सवार हो जाऊँगा।
25जो जहाज पर सवार होने से वर्जित हो जाते हैं, उनकी प्रभु के दरबार में खूब पिटाई होती है।
26गुरु का दरबार धन्य है, जहाँ सत्यस्वरूप परमात्मा का यशोगान किया जाता है।
27हे नानक ! अद्वितीय एक ईश्वर प्रत्येक हृदय-घर में व्यापक हो रहा है॥ ४॥ ७ ॥
28गउड़ी महला १ ॥
29ब्रह्म का चिंतन करने से मोह-माया में उल्टा पड़ा हृदय-कमल बदल कर सीधा हो जाता है।
30दसम द्वार रूपी गगन से अमृत रस की धारा बहने लग जाती है।
31मुरारि-प्रभु तीनों लोकों में स्वयं ही व्यापक हो रहा है॥ १॥
32हे मेरे मन ! किसी दुविधा में मत पड़।
33यदि मन विश्वस्त हो जाए तो वह नाम रूपी अमृत रस का पान करने लगता है॥ १॥ रहाउ ॥
34जब मन अपने अहंत्व को नाश करना स्वीकृत कर लेता है तो यह जीवन की बाजी को विजय कर लेता है।
35जब मन का अहंत्च नाश हो जाता है तो उसे हृदय में ही परमात्मा बारे ज्ञान हो जाता है।
36जब परमात्मा की कृपा होती है तो हृदय-घर में उसे आत्म-स्वरूप की पहचान हो जाती है॥ २ ॥
37ईश्वर का नाम ही सच्या ब्रह्मचार्य, सत्य तीर्थ एवं स्नान है।
38यदि मैं नाम को छोड़ कर अन्य अधिकतर आडम्बर करूँ तो वह सब व्यर्थ हैं।
39चूंकि नारायण बड़ा अन्तर्यामी है॥३॥
40यदि भगवान के सिवाय मैं किसी दूसरे पर श्रद्धा धारण करूं, तो ही मैं पराए घर जाऊँ।
41मैं नाम की देन किससे मॉगूं? भगवान के सिवाय मेरे लिए कोई स्थान नहीं है।
42हे नानक ! गुरु के उपदेश से मैं सहज ही सत्य में समा जाऊँगा॥ ४॥८॥
43गउड़ी महला १ ॥
44यदि सतिगुरु मिल जाए तो वह जीवित ही मृत्यु का मार्ग दिखा देता है।
45इस तरह की मृत्यु उपरांत जीवित रहने की प्रसन्नता मन को लुभाती है।
46अहंकार को मिटाकर ही दसम द्वार पाया जाता है॥ १॥
47मानव जीव अपनी मृत्यु का समय लिखवा कर ही दुनेिया में आते हैं और वे दुनिया में अधिक समय निवास नहीं कर सकते।
48इसलिए मनुष्य को दुनिया में आकर हरि का जाप करते रहना और हरि की शरणागत वास करना चाहिए॥ १॥ रहाउ॥
49यदि सतिगुरु मिल जाए तो समस्त दुविधा भाग जाती है।
50ह्रदय कमल प्रफुल्लित हो जाता है और मन हरि-प्रभु के साथ जुड़ जाता है।
51जो व्यक्ति अहंकार का नाश करके जीता है, वह परलोक में नाम रूपी महारस का पान करता है॥ २॥
52सतिगुरु के मिलन से मनुष्य सत्यवादी, त्यागी एवं पावन हो जाता है।
53गुरु का मार्ग धर्म की सीढ़ी है और उस सीढ़ी द्वारा मनुष्य सर्वोच्च आत्मिक अवस्था वाला हो जाता है।
54सतिगुरु भगवान की कृपा से ही मिलता है और मृत्यु का भय नाश हो जाता है॥ ३॥
55गुरु को मिलने से मनुष्य प्रभु से मिल जाता है और उसकी गोद में समा जाता है।
56अपनी कृपा-दृष्टि करके गुरु जी प्राणी को उसके अपने हृदय-घर में प्रभु के आत्म-स्वरूप के दर्शन करवा देते हैं।
57हे नानक ! गुरु प्राणी के अहंकार को नाश करके परमेश्वर के साथ मिला देते हैं॥ ४ ॥ ९॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं