सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 152 · Raag Gauree · Guru Nanak Dev Ji

1लज्जा एवं सुरति दोनों मेरे सास-ससुर बन गए हैं।

2सदाचरण को मैंने अपनी पत्नी बना लिया है॥ २॥

3सत्संग मेरे विवाह का समय है और संसार से टूट जाना मेरा विवाह है।

4हे नानक ! ऐसे प्रभु मिलन से मेरे यहाँ सत्य की संतान उत्पन्न हुई है॥ ३॥ ३॥

5गउड़ी महला १ ॥

6मानव-शरीर की रचना पवन, जल एवं अग्नि के मिलन से हुई है।

7यह शरीर चंचल मन एवं चतुर बुद्धि का बनाया हुआ एक खिलौना है।

8इस शरीर को दो नेत्र, दो कान, दो नासिका, मुँह, गुदा एवं इन्दी रूपी नौ द्वार लगे हुए हैं और दसम द्वार गुप्त है।

9हे ज्ञानी ! इस विचार को समझो ॥ १॥

10भगवान स्वयं ही कथा करने वाला, बोलने वाला एवं सुनने वाला है।

11वहीं व्यक्ति ज्ञानी होता है जो अपने आत्मिक जीवन को सोचता-समझता है॥ १॥ रहाउ ॥

12यह शरीर मिट्टी है और पवन उसमें बोलती है।

13हे ज्ञानी ! इस तथ्य को समझो कि वह कोन हैं? जो प्राण त्याग गया है?

14यह शरीर एवं विवाद पैदा करने वाला अहंकार मरे हैं।

15भगवान का अंश आत्मा नहीं मरी जो दुनिया रूपी खेल देखने वाली है॥ २॥

16जिस नाम रूपी रत्न-पदार्थ के लिए तुम तीर्थों के तट पर जाते हो,

17वह नाम रूपी अमूल्य रत्न तेरे हृदय में ही विद्यमान है।

18पण्डित ग्रंथ पढ़-पढ़ कर परस्पर विवाद करते हैं

19परन्तु वह उस नाम रूपी अमूल्य वस्तु को नहीं जानते जो उनके हृदय में ही है॥३॥

20मैं नहीं मरा, अपितु मेरी विपदा लाने वाली अज्ञानता रूपी बला मरी है।

21वह आत्मा नहीं मरी, जो सब में समाई हुई है।

22हे नानक ! गुरु ने मुझे ब्रह्म के दर्शन करवा दिए हैं

23और अब मुझे कोई भी मरता एवं जन्म लेता दिखाई नहीं देता॥ ४॥ ४॥

24गउड़ी महला १ दखणी ॥

25जो प्रभु-नाम को निरन्तर सुनकर उसे समझने का प्रयास करता, एवं उस पर आस्था रखता है। मैं हमेशा ही उस पर कुर्बान जाता हूँ,

26हे प्रभु ! जिसे तू स्वयं विस्मृत कर देता है, उसे कहीं भी स्थान नहीं मिलता।

27तू ही जीव को ज्ञान देता है और फिर उसे गुरु से साक्षात्कार करवा कर अपने साथ मिला लेता है॥ १॥

28मेरी यही कामना है कि मुझे नाम प्राप्त हो, जो मेरे साथ परलोक में जाएगा।

29प्रभु के नाम के अलावा सारी दुनिया काल ने बंधन में डाली हुई है॥ १॥ रहाउ ॥

30मेरी कृषि एवं व्यापार प्रभु के नाम के आश्रय में ही है।

31मनुष्य ने अपने सिर पर पाप एवं पुण्य रूपी कर्मों के बीज की पोटली उठाई हुई है।

32काम, क्रोध प्राणी के अन्तर्मन में घाव हैं।

33खोटे मन वाले प्रभु नाम को विस्मृत करके संसार से चले जाते हैं।॥ २॥

34सच्चे गुरु की शिक्षा सत्य है।

35सत्य नाम का सही मूल्यांकन जानने से तन एवं मन शीतल हो जाते हैं। सतिगुरु की यही परख है कि

36वह विकारों रूपी स्वादों से यूं निर्लिप्त रहता है जैसे कमल का फूल कीचड़ से निर्लिप्त रहता है।

37प्रभु के नाम में मग्न हुआ वह गन्ने के रस की भाँति मीठा है॥ ३॥

38यह दस द्वारों वाला शरीर रूपी किला परमात्मा के हुक्म में बनाया गया है।

39इसमें अपार प्रभु की ज्योति के साथ मिलकर पाँच ज्ञान-इन्द्रियाँ रहती हैं।

40परमात्मा स्वयं ही व्यापारी है और स्वयं ही तुलने वाला सौदा है।

41हे नानक ! परमात्मा का नाम ही जीव का जीवन सुन्दर बनाने वाला है॥४ ॥५ ॥

42गउड़ी महला १ ॥

43क्या यह जाना जा सकता है कि आत्मा कहाँ से आई है?

44वह कहाँ से उत्पन्न हुई है और वह कहाँ जाकर समा जाती है ?

45वह किस तरह मोह-माया के बंधनों में फंस जाती है और कैसे संधनों से मुक्ति प्राप्त करती है ?

46वह किस तरह सहज ही अविनाशी प्रभु में समा जाती है॥ १॥

47जिसके हृदय में परमात्मा का नाम निवास करता है और मुँह से भी अमृत-नाम उच्चरित होता है।

48वह प्रभुः का अमृत नाम निष्काम होकर जपता रहता है और इच्छा रहित हो जाता है॥ १॥ रहाउ॥

49मनुष्य सहज ही इस दुनिया में आता है और सहज ही दुनिया से चला जाता है अर्थात् वह सहज ही जन्मता-मरता रहता है।

50मन (की तृष्णाओं) से वह उत्पन्न हुआ है और मन (की तृष्णाओं) में ही वह समा जाता है।

51गुरमुख मोह-माया के बंधनों से मोक्ष प्राप्त कर लेता है और वह सांसारिक बंधनों में नहीं पड़ता।

52वह शब्द का चिन्तन करता है और प्रभु-नाम द्वारा मुक्त हो जाता है॥ २॥

53बहुत सारे पक्षी रात्रिकाल को पेड़ पर आकर निवास करते हैं।

54कई सुखी हैं और कई दुखी हैं। मन के मोह कारण वह सारे नाश हो जाते हैं।

55जब रात्रेि बीतती है और सूर्योदय होता है, वह आकाश की ओर देखते हैं।

56विधाता की विधि अनुसार कर्मो के कारण वे दस दिशाओं में उड़ जाते हैं।॥ ३॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं