गुरु ग्रंथ साहिब 150 · Raag Maajh · Guru Nanak Dev Ji
1प्रभु द्वारा कुमार्गगामी किए हुए वह अपमानित हुए फिरते हैं और उनका समूह समुदाय भ्रष्ट हो जाता है।
2वह यह भी नहीं समझते कि प्राणियों को केवल वही परमात्मा मारता और पुनर्जीवित करता है। दूसरा कोई भी उनको बचा नहीं सकता।
3वह पुण्य करने एवं स्नान करने से वंचित रह जाते हैं। उनके उखड़े हुए सिरों पर राख पड़ती है।
4वह इस बात को भी नहीं समझते कि जब देवताओं एवं दैत्यों ने मिलकर क्षीर सागर को सुमेर पर्वत की मथनी बनाकर मंथन किया था तो जल में से १४ रत्न निकले थे।
5देवताओं ने अठसठ तीर्थ-स्थलों को नियुक्त किया है। जहाँ पर्व त्यौहार मनाए जाते हैं और भजन गाए जाते हैं। अर्थात् वहाँ वाणी द्वारा हरि की कथा होती है।
6स्नान उपरांत मुसलमान नमाजें पढ़ते हैं और स्नान करके हिन्दु पूजा-अर्चना करते हैं और सभी बुद्धिमान सदैव नहाते हैं।
7जब मनुष्य जम्मते-मरते हैं, तब उनके सिर पर जल डाला जाता है ताकि उनकी गति हो जाए।
8हे नानक ! सिर उखड़ाने वाले शैतान हैं और स्नान की बात उन्हें अच्छी नहीं लगती।
9जब जल बरसता है, हर तरफ प्रसन्नता होती है। प्राणियों के जीवन की युक्ति जल में विद्यमान है।
10जब जल बरसता है, अनाज, गन्ना, कपास इत्यादि जो सबके पोषक हैं उत्पन्न होते हैं। कपास, जो सबको ढांपने वाली चादर बनती है।
11जब मेघ बरसते हैं, गाएँ सदा घास चरती हैं और उनके दूध से दहीं होता है।
12तब स्त्रियां मंथन करती हैं। उसमें से जो घी निकलता है, उससे होम, यज्ञ, पवित्र भण्डारे और नित्य पूजा सदा ही सम्पन्न होते हैं और घी से अन्य संस्कार सुशोभित होते हैं।
13गुरु सागर है, गुरु-वाणी सभी नदियां (उनकी सेविकाएँ) हैं, जिनमें स्नान करने से महानता प्राप्त होती है।
14हे नानक ! यदि सिर मुंडाने वाले मुनि स्नान नहीं करते हैं तो उनके सिर पर सौ अंजुलि भस्म ही पड़ती है॥ १॥
15महला २॥
16सर्दी अग्नि का क्या बिगाड़ सकती है ? रात्रि सूर्य का क्या बिगाड़ सकती है ?
17अंधेरा चाँद का क्या बिगाड़ सकता है ? कोई जाति पवन एवं जल का क्या बिगाड़ सकती है ?
18धरती का वस्तुएँ क्या बिगाड़ सकती हैं, जिसके भीतर सब वस्तुएँ उत्पन्न होती हैं।
19हे नानक ! प्राणी केवल तभी प्रतिष्ठित समझा जाता है, जब प्रभु उसका मान-सम्मान बरकरार रखे ॥ २॥
20पउड़ी॥
21हे मेरे आश्चर्यजनक परमेश्वर ! मैं सदैव तेरी महिमा-स्तुति करता हूँ।
22तू सदैव स्थिर है और तेरा दरबार सत्य है तथा अन्य सभी जीव जन्मते-मरते रहते हैं।
23हे प्रभु! जो तुझसे सत्यनाम का दान मॉग लेता है, वह तेरा नाम जप-जप कर तेरे जैसा ही बन जाता है।
24तेरा हुक्म सत्य है और मनुष्य तेरे नाम से शोभा पाते हैं।
25हे प्रभु ! तेरा हुक्म मानने से ही मनुष्य को तुझसे ज्ञान-ध्यान की सूझ मिलती है।
26तेरे दरबार में जाने हेतु नाम रूपी परवाना तेरी कृपा से ही मिलता है तथा वहाँ अन्य कोई परवाना चलाया नहीं चलता।
27हे प्रभु ! तू ही सच्चा दाता हैं और सदैव ही जीवों को देते रहते हो ! तेरे भण्डार कभी भी समाप्त नहीं होते अपितु अधिकतर होते जाते हैं।
28हे प्रभु ! नानक तुझसे वहीं दान माँगता है, जो तुझे अच्छा लगता है॥ २६॥
29श्लोक महला २॥
30जिन्हें गुरु ने शिक्षा अथवा उपदेश देकर समझा दिया है, वे सत्यनाम की महिमा करके सत्य में ही समा गए हैं।
31अब उनको उपदेश देने का क्या अभिप्राय है ? जिनका गुरु नानक देव है॥ १ ॥
32महला १॥
33जिसको प्रभु स्वयं समझा देता है, वही उसको समझता है।
34जिसे ईश्वर स्वयं ज्ञान प्रदान करता है, वह सर्वज्ञ जान लेता है।
35जो व्यक्ति कह-कह कर कथन ही करता रहता है, वह माया के झंझटों में फंसा रहता है।
36प्रभु ने अपने हुक्म से ही सूर्य, चन्द्रमा एवं पृथ्वी इत्यादि की रचना की है।
37वह स्वयं ही सबके विचारों को समझता है।
38हे नानक ! प्रभु ने स्वयं ही वाणी का उच्चारण किया है।
39जिसको यह देन मिल जाती है, उसका अज्ञानता का अँधेरा दूर हो जाता है॥ २॥
40पउड़ी ॥
41मुझ बेकार ढाढी को प्रभु ने अपनी भक्ति कार्य में लगा लिया है।
42आदिकाल से प्रभु ने मुझे रात-दिन अपना यशोगान करने का हुक्म दिया है।
43स्वामी ने ढाढी को अपने सत्य दरबार में निमंत्रण दिया है।
44परमात्मा ने अपनी सच्ची महिमा-स्तुति की पोशाक मुझे पहना दी है।
45तब से सत्यनाम मेरा अमृत स्वरूप आहार बन गया है।
46जो गुरु के उपदेश से इस आहार को पेट भर कर सेवन करते हैं, वे सदा सुख पाते हैं।
47गुरु-वाणी गायन करने से मैं चारण परमेश्वर की महानता का प्रसार करता हूँ।
48हे नानक ! सत्यनाम की स्तुति करके मैंने परमात्मा को प्राप्त कर लिया है॥ २७॥सुधु
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं